नई दिल्ली. तेलंगाना चुनाव में प्रचार अपने अंतिम चरण में है. सभी पार्टियां पूरा जोड़-तोड़ लगा रही हैं. लेकिन इस चुनाव में मुस्लिम वोटर काफी महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं. आंकड़े बता रहे हैं कि राज्य में मौजूद 12.7 फीसदी मुस्लिम वोटर ‘गेम चेंजर’ की भूमिका में रहेंगे. साल 2014 के वोटिंग पैटर्न को देखें तो साफ तौर पर दिखता है कि पूरे उत्तरी तेलंगाना में मुस्लिम वोटर टीआरएस कैंडिडेट के साथ खड़े दिखते हैं, जिसका उन्हें फायदा मिला.Also Read - मंत्री ने ताल ठोककर अपशब्‍द कहते हुए कांग्रेस प्रदेश अध्‍यक्ष को चुनाव लड़ने की दे डाली चुनौती

आंकड़े पर बात करें तो साल 2011 की जनगणना के मुताबिक, राज्य में 12.7 फीसदी मुस्लिम वोटर हैं. हालांकि, ये तेलंगाना लगभग हर जिले में फैले हुए हैं. आदिलाबाद, महबूबनगर, निजामाबाद, नालगोंडा, रांगा रेड्डी, हैदराबाद, मेडक और करीमनगर के जिले ऐसे हैं, जहां मुस्लिम वोट बैंक हार-जीत का बड़े फैक्टर होंगे. इसी को ध्यान में रखते हुए टीआरएस, टीडीपी से लेकर कांग्रेस, बीजेपी और एआईएमएम भी जोड़-तोड़ में लगे हुए हैं. Also Read - पेट्रोल-डीजल पर महंगाई, विरोध में आग के गोले के अंदर खड़े हुए TDP नेता, VIDEO

क्या इस वजह से समय से पहले हो रहा है चुनाव
बता दें कि साल 2014 में तेलंगाना विधानसभा का चुनाव हुआ था. इसका कार्यकाल 2019 के शुरुआती महीने में पूरा हो रहा था. ऐसे में कयास लगाए जा रहे थे कि तेलंगाना का चुनाव साल 2019 के आम चुनाव के साथ होगा. ऐसे में टीआरएस प्रमुख को अंदेशा था कि साल 2019 का चुनाव पूरी तरह से बीजेपी के इर्दगिर्द रहेगा. राज्य में या तो प्रो बीजेपी माहौल रहेगा या फिर एंटी बीजेपी. ऐसी हालत में केसीआर राज्य में जिस समीकरण से सत्ता हासिल करने में सफल हुए थे, उस एजेंडे में फिट नहीं बैठ पा रहे थे. सबसे ज्यादा उन्हें मुस्लिम वोट बैंक के छिटकने का डर था. इसके पीछे का कारण ये माना जा रहा था कि जनता के बीच एक ऐसा मैसेज गया था कि केसीआर का झुकाव नरेंद्र मोदी सरकार की तरफ है. Also Read - Delhi: तेलंगाना में मंत्री पद से हटाए जाने के बाद TRS छोड़कर आए ई. राजेंद्र ने समर्थकों के साथ BJP ज्‍वाइन की

केसीआर दूर की सोचते हैं!
आंध्र प्रदेश की राजनीति के दौर से ही देखा जाता है कि केसीआर दूर की सोच के राजनीति करते हैं. अपने कार्यकाल के दौरान एनडीए की तरफ उनका झुकाव उन्हें 12.7 फीसदी मुस्लिम वोटर से दूर कर सकता था. इतना ही नहीं उत्तरी तेलंगाना में वह हाशिए पर आ जाते. ऐसे में केसीआर मोदी सेंटीमेंट का ध्यान रखते हुए चुनाव में कूदे. साल 2014 के चुनाव की बात करें तो राज्य में कांग्रेस और ऑल इंडिया मजलिस ए इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) अलग-अलग चुनाव लड़ी थीं. हालांकि, चुनाव के दिनों में AIMIM को टीआरएस के नजदीक माना जाने लगा था. इसका फायदा AIMIM और टीआरएस दोनों को मिला. हैदराबाद क्षेत्र में AIMIM में का 7 सीटों पर मजबूत आधार है.

क्या बीजेपी-टीआरएस में समझौता है?
राज्य में इस तरह का माहौल है कि टीआरएस और बीजेपी के बीच एक आंतरिक समझौता है. इसके पीछे का तर्क है कि टीआरएस अपने मुस्लिम वोटर को साधने में सफल रहे और बीजेपी अपने हिंदुत्व के एजेंडे पर कायम रहे और राज्य के लगभग 85 फीसदी वोटर्स पर अपना होल्ड बना सके. हालांकि, दोनों पार्टियां एक दूसरे पर हमलावर हैं और एक दूसरे पर आरोप लगा रही हैं. बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने एक रैली में यहां तक कहा था कि केसीआर पहले एक देश एक चुनाव के पक्ष में थे, लेकिन अचानक से सत्ता के लालच की वजह से वह समय से पहले चुनाव में उतर गए.

कांग्रेस में असमंजस
दूसरी तरफ कांग्रेस की स्थिति इस बार भी स्पष्ट नहीं हो पा रही है. टीडीपी सुप्रीमो एन चंद्रबाबू नायडू ने कांग्रेस के साथ गठबंधन किया है. लेकिन ये गठबंधन कितना असर डालेगा, ये तो रिजल्ट ही बताएंगे. हालांकि, अभी हाल के डेवलपमेंट ये बता रहे हैं कि टीडीपी और कांग्रेस में सबकुछ सही नहीं चल रहा है. इसके पीछे की वजह ये है कि राज्य के कांग्रेस इंचार्ज आरसी खुंतिया ने कहा है कि 23 नवंबर को राज्य में होने वाली सोनिया गांधी की रैली में चंद्रबाबू नायडू उस मंच पर नहीं मौजूद होंगे.