तेलंगाना चुनाव में प्रचार जोर पकड़ चुका है. एक तरफ सत्ताधारी टीआरएस है तो दूसरी तरफ पीपुल्स एलायंस. पीपुल्स अलायंस में कांग्रेस, टीडीपी, सीपीआई और तेलंगाना जन समिति जैसी पार्टियां हैं. तेलंगाना के सीएम और टीआरएस नेता केसीआर ने जिस समय विधानसभा भंग की थी और समय से पहले चुनाव में कूदे थे तो माहौल एक तरफा था. राजनीति के विशेषज्ञों का कहना था कि टीआरएस एक बार फिर सरकार बनाने में सफल होगी और चंद्रशेखर राव एक बार सीएम बनेंगे. लेकिन कांग्रेस ने चंद्रबाबू नायडू के साथ मिलकर जिस तरह का गठबंधन तैयार किया है, उससे मुकाबले में रोमांच आ गया है और राज्य में टीआरएस के माथे पर चिंता की लकीरें साफ तौर पर देखी जा सकती हैं.

चंद्रशेखर के वादे में फंस गई थी
रिपोर्ट्स में कहा जाता है कि साल 2013 के समय आंध्र प्रदेश के प्रभारी दिग्विजय सिंह थे. उस समय केंद्र में यूपीए सरकार थी. कहा जाता है कि केसीआर ने वादा किया था कि तेलंगाना के अलग राज्य बनने की स्थिति में वह टीआरएस का कांग्रेस में विलय करा लेंगे. लेकिन राज्य बन जाने के बाद चंद्रेशखर राव मुकर गए. आंध्र में जगन मोहन रेड्डी पहले से कांग्रेस को चोट पहुंचा चुके थे. ऐसे में एक साथ आंध्र और तेलंगाना दोनों राज्यों में कांग्रेस कमजोर हो गई. यह वह दौर था जब कांग्रेस के कई शीर्ष नेता पार्टी छोड़कर चले गए थे.

सोनिया गांधी ने रैली की
कांग्रेस ने तेलंगाना की स्थिति को देखते हुए यूपीए चेयरपर्सन सोनिया गांधी को पहली बार चुनाव प्रचार में उतारा. अपनी रैली में सोनिया ने कहा कि किस तरह से राजनैतिक नफा-नुकसान की चिंता के बगैर लोगों को नया राज्य दिया. उन्होंने यहां तक कह दिया कि वह ऐसी मां हैं जो कई साल बाद अपने बच्चों से मिल रही हैं. सोनिया ने अपनी रैली में कहा था कि राज्य के गठन के समय वह चाहती थीं कि राज्य फले-फूल, लेकिन चंद्रशेखर की सरकार में ऐसा नहीं हो पाया. उन्होंने चंद्रशेखर पर परोक्ष रूप से हमला करते हुए कहा था कि हमारा क्रेडिट वह ले रहे हैं. दूसरी तरफ तेलंगाना में एकतरफ चंद्रशेखर राव प्रचार कर रहे हैं कि उनके 13 साल के संघर्ष का नतीजा है कि तेलंगाना को अलग राज्य का दर्जा मिला.

अहमद पटेल की निगरानी में चुनाव
कर्नाटक के चुनाव में कांग्रेस की तरफ से अहमद पटेल और डी के शिवकुमार मोर्चा संभाले हुए हैं. शिवकुमार को कर्नाटक चुनाव में सफलता मिल चुकी है. ऐसे में वह उसी पैटर्न पर बागियों को मनाने की कोशिश कर रहे हैं. वह असम और त्रिपुरा से सबक लेकर बागियों को पर नजर बनाए हुए हैं.

किस ओर अल्पसंख्यक
तेलंगाना में लगभग 12.7 फीसदी मुस्लिम वोटर हैं. पिछले चुनाव में उत्तरी तेलंगाना में मुस्लिम वोटर टीआरएस के साथ खड़े थे. लेकिन इस बीच टीआरएस ने बीजेपी के साथ नजदीकी दिखाई, जिससे उसका समीकरण बिगड़ गया है. हालांकि. चंद्रशेखर ने डिप्टी सीएम के तौर पर एक मुस्लिम नेता को जगह दी थी, जिससे अभी भी उनका समीकरण नहीं बिगड़ा है. वहीं, कांग्रेस के नेता आबिद रसूल खान के टीआरएस में शामिल होने से वह बेहतर स्थिति बना सकती है.