नई दिल्ली। केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से कहा है कि ‘तीन तलाक’, ‘निकाह हलाला’ और बहु विवाह मुस्लिम महिलाओं के सामाजिक स्तर और गरिमा को प्रभावित करते हैं और उन्हें संविधान में प्रदत्त मूलभूत अधिकारों से वंचित करते हैं। कोर्ट के समक्ष दायर इस हलफनामे में सरकार ने अपने पिछले रुख को दोहराते हुए कहा है कि ये प्रथाएं मुस्लिम महिलाओं को उनके समुदाय के पुरुषों की तुलना में और अन्य समुदायों की महिलाओं की तुलना में ‘असमान और कमजोर’ बना देती हैं।Also Read - UP News: अब AK-203 असॉल्ट से दुश्मनों के दांत खट्टे करेगा भारत, अमेठी में बनेंगे 500000 से अधिक राइफल

अपने अभिवेदन में केंद्र ने कहा कि चुनौती के दायरे में आई तीन तलाक, निकाह हलाला और बहु विवाह जैसी प्रथाएं मुस्लिम महिलाओं के सामाजिक स्तर और गरिमा को प्रभावित करती हैं और उन्हें अपने समुदाय के पुरषों और दूसरे समुदायों की महिलाओं और भारत से बाहर रहने वाली मुस्लिम महिलाओं की तुलना में असमान और कमजोर बना देती हैं। Also Read - Supreme Court On DMRC: सुप्रीम कोर्ट ने खारिज की DMRC की समीक्षा याचिका, रिलायंस इंफ्रा की याचिका पर 6 दिसंबर को होगी सुनवाई

वहीं इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने 30 मार्च को सुनवाई के दौरान कहा था कि मुस्लिमों में तीन तलाक, निकाह हलाला और बहु विवाह की प्रथाएं ऐसे अहम मुद्दे हैं, जिनके साथ ‘भावनाएं’ जुड़ी हैं। एक संवैधानिक पीठ इन्हें चुनौती देने वाली याचिकाओं की सुनवाई 11 मई को करेगी। यह भी पढ़ें: तीन तलाक मामलें में सुप्रीम कोर्ट ने जवाब के लिये केन्द्र को दिया चार सप्ताह का समय Also Read - Delhi Pollution: दिल्ली में प्रदूषण के बीच खुले स्कूल, सुप्रीम कोर्ट ने AAP सरकार से किया सवाल

मामले में केंद्र ने अपने लिखित हलफनामें में इन प्रथाओं को ‘पितृ सत्तात्मक मूल्य और समाज में महिलाओं की भूमिका के बारे में चली आने वाली पारंपरिक धारणाएं’ बताया है। केंद्र ने कहा कि एक महिला की मानवीय गरिमा, सामाजिक सम्मान एवं आत्म मूल्य के अधिकार अनुच्छेद 21 के तहत उसे मिले जीवन के अधिकार के अहम पहलू हैं।

केंद्र ने कहा कि लैंगिक असमानता का शेष समुदाय पर दूरगामी प्रभाव होता है। यह पूर्ण सहभागिता को रोकती है और आधुनिक संविधान द्वारा दिए गए अधिकारों को भी रोकती है। इन प्रथाओं को असंवैधानिक घोषित करने की मांग करते हुए सरकार ने कहा है कि मुस्लिम पर्सनल लॉ में पिछले छह दशक से अधिक समय से सुधार नहीं हुए हैं और मुस्लिम महिलाएं तत्काल तलाक के डर से ‘बेहद कमजोर’ बनी रही हैं। मुस्लिम महिलाओं की संख्या जनसंख्या का आठ प्रतिशत है। यह भी पढ़ें: मुस्लिम लॉ बोर्ड ने सुप्रीम को कोर्ट में दी दलील, कहा पती के हाथों पत्नी की हत्या होने से बचाता है तलाक

केंद्र ने कहा कि यह कहना सच हो सकता है कि सिर्फ कुछ ही महिलाएं तीन तलाक और बहु विवाह से सीधे तौर पर या वास्तव में प्रभावित होती हैं लेकिन एक सच्चाई यह भी है कि इस कथित कानून के दायरे में आने वाली हर महिला इन प्रथाओं का इस्तेमाल उसके खिलाफ किए जाने को लेकर डर और खतरे में जीती हैं। इसका असर उसके स्तर, उसके द्वारा चुने जाने वाले विकल्पों, उसके आचरण और सम्मान के साथ जीने के उसके अधिकार पर पड़ता है।