नई दिल्ली: उच्चतम न्यायालय ने राष्ट्रीय राजधानी में अवैध इमारतों की सीलिंग पर उसके निर्देशों का कथित रूप से उल्लंघन करने के मामले में मंगलवार को भाजपा की दिल्ली इकाई के अध्यक्ष एवं पार्टी सांसद मनोज तिवारी से नाराजगी जताई. शीर्ष अदालत ने कहा कि सांसद होने से उन्हें कानून अपने हाथ में लेने की आजादी नहीं मिल जाती.Also Read - सुप्रीम कोर्ट में केंद्र का हलफनामा- कोरोना से हुई मौत पर परिजनों को मिलेगा 50 हजार रुपये का मुआवजा

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दिल्ली के मास्टर प्लान का उल्लंघन करते हुए चल रहे एक परिसर की सील कथित तौर पर हटाने के मामले में तिवारी को अवमानना नोटिस जारी किया गया था. नोटिस के अनुरूप वह अदालत में पेश हुए. शीर्ष अदालत ने तिवारी के उस बयान पर नाराजगी प्रकट की जिसमें उन्होंने कहा था कि निगरानी समिति एक हजार अवैध भवनों को सील नहीं कर रही है. न्यायमूर्ति मदन बी लोकुर की अध्यक्षता वाली पीठ ने तिवारी को दिल्ली में सीलिंग के मामले में एक समाचार चैनल से बातचीत में किये गये इस दावे पर स्पष्टीकरण देने को कहा और मामले में एक सप्ताह के अंदर हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया.

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सुप्रीम कोर्ट ने कहा- एक हजार जगह कहां हैं जिन्‍हें सील करने की जरूरत है

पीठ में न्यायमूर्ति एस अब्दुल नजीर और न्यायमूर्ति दीपक गुप्ता भी शामिल हैं. पीठ ने कहा कि मिस्टर तिवारी, आप अपनी सीडी में कह रहे हैं कि एक हजार जगह ऐसी हैं जिन्हें सील किये जाने की जरूरत है. हमें इन जगहों की सूची दें. हम आपको सीलिंग अधिकारी बनाएंगे. उत्तर पूर्व दिल्ली से लोकसभा सदस्य तिवारी के खिलाफ पूर्वी दिल्ली नगर निगम ने गोकलपुरी इलाके में एक परिसर की कथित तौर पर सील हटाने के मामले में प्राथमिकी दर्ज कराई थी.

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मनोज तिवारी को तीन अक्तूबर को पेश होने का निर्देश

तिवारी की ओर से वरिष्ठ वकील विकास सिंह ने कहा कि भाजपा नेता ने कोई सील नहीं हटाई और सांसद होते हुए उन्होंने कभी सीलिंग प्रक्रिया को बाधित नहीं किया. वकील ने कहा कि उन्हें विस्तृत जवाब देने के लिए समय चाहिए होगा. अदालत ने कहा कि हम आपसे पूछ रहे हैं, क्या आपने सीडी देखी है? सीडी में वह कह रहे हैं कि एक हजार जगहें ऐसी हैं जहां सीलिंग की जरूरत है. वह संसद सदस्य हैं. इससे उन्हें कानून हाथ में लेने की आजादी नहीं मिल जाती. अदालत ने तिवारी को तीन अक्तूबर को पेश होने का निर्देश दिया जब मामले में अगली सुनवाई होगी.