नई दिल्ली: चंबल सभ्य समाज के लिए बहिष्कृत बाग़ियों की धरती रही है. बागी यानी बहिष्कृत नायक… बहुत कुछ रॉबिनहुड की भाँति… दसवीं शताब्दी में ‘चण्ड’ नामक बाग़ी का नाम इतिहास में पहले आता है. अंग्रेजों से बग़ावत करने वाले पिंडारी, तात्या टोपे और रानी लक्ष्मीबाई चंबल के बीहड़ों में आकर शरण और सहायता प्राप्त की. तत्कालीन सत्ता के लिए यह सब विद्रोही, बाग़ी और डाकू थे तो जन सामान्य के लिए जन नायक. 20वीं शताब्दी के प्रारम्भ में अंग्रेजों के विरुद्ध उठ खड़े सशस्त्र आंदोलन में गेंदालाल दीक्षित, राम प्रसाद बिस्मिल और मुकुन्दीलाल ने जहाँ मैनपुरी षड्यन्त्र से लेकर काकोरी एक्शन कर अंग्रेजों से सीधे टक्कर ली, तो डोगर-बटरी, लाखन, पुतलीबाई-सुल्ताना और मानसिंह ने अंग्रेज और उनके दलाल ज़मींदारों और जागीरदारों से टक्कर लेकर अपने और चंबल की अवाम के हितों की रक्षा की. देश आजाद होने के बाद भी चम्बल में जातीय कुचक्र और सवर्णीय उत्पीड़न के चलते जहाँ अमृतलाल किरार, विक्रम मल्लाह, फूलन देवी, मलखान सिंह, निर्भय गुर्जर, सीमा परिहार इत्यादि ने भी विभिन्न कारणों से बन्दूक उठाकर बीहड़ का रास्ता पकड़ा.

वहीं, फिल्मकार भी इसके मोह से नहीं बच सके. पारसी थियेटर से उपजी नाटक का ही संगीतमय रूप ‘नौटंकी’ में बागियों और डाकुओं के रॉबिन हुड टाइप किस्सों को बड़े स्तर पर लोकप्रिय बनाया. इनमें सुल्ताना डाकू, पुतलीबाई, बाग़ी मानसिंह की नौटंकियाँ चम्बल ही नहीं चम्बल के बाहर भी बड़ी लोकप्रिय हुई थी.

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अब उसी चंबल की धरती पर 12 अक्टूबर से तीन दिवसीय चंबल इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल आयोजित किया जा रहा है. आयोजक शाह आलम बताते हैं कि फिल्म फेस्टिवल पचनदा के पास जगम्मनपुर में हो रहा है. इस फिल्म फेस्टिवल में राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय फ़िल्में दिखाई जाएंगी. विविध सांस्कृतिक कार्यक्रम किये जाएंगे. इसके साथ ही फिल्म जगत की कई हस्तियां भी इसमें शामिल हो रही हैं. फिल्म फेस्टिवल का उद्धाटन दिन में 12 बजे से होगा. फेस्टिवल की तैयारी को लेकर इटावा, औरैया, जालौन के बीहड़ी गांवो में सघन जनसंपर्क किया जा रहा है.

दुनिया की 150 भाषाओं में गजल गाकर तीन बार गिनिज बुक में अपना नाम दर्ज कराने वाले डॉ. गजल श्रीनिवास चंबल गीत का वीडियो वर्जन ला रहे हैं. चंबल गीत की वीडियो उद्घाटन समारोह में दर्शको को दिखाई जाएगी. डॉ. श्रीनिवास पांच नदियों के संगम पचनदा पर 12 अक्टूबर की शाम को 5:30 पर चंबल गीत का लाईव कंसर्ट करेंगे. चंबल गीत अपनी बानगी में सुघड़ बन पड़ा है. गीत मधुर और ओज का संगम है. उसके कथ्य में चंबल की भावभूमि है, तो इतिहास और संस्कृति की झलक भी. गीत में वाद्ययंत्रों के अपूर्व संयोजन से, चम्बल की धारा का कलकल निनाद और उसके कूल-कछारों में पंछियों की चहचहाहट का जो प्रभाव उत्पन्न किया गया है वह गीत को और भी जीवन्त बनाता है. इस गीत को चंबल की संपूर्ण की अवाम को समर्पित किया गया है.

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-चंबल पर बनीं कई फिल्में
एक दौर ऐसा आया जब देश में बनने वाली हर चौथी फिल्म की कहानी या लोकेशन चंबल होती. जमींदारों के अत्याचार, आपसी लड़ाई और ज़र, जोरू और ज़मीन के झगड़ों को लेकर 1963 में आई फ़िल्म ‘मुझे जीने दो’ के बाद इस विषय पर सत्तर के दशक में बहुत सारी फिल्में, चम्बल के बीहड़ और बागियों को लेकर बनीं, जिनमें ‘डाकू मंगल सिंह -1966’, ‘मेरा गाँव मेरा देश-1971’, ‘चम्बल की क़सम-1972’, ‘पुतलीबाई-1972’, ‘सुल्ताना डाकू-1972, कच्चे धागे-1973’, प्राण जाएँ पर बचन न जाए-1974, ‘शोले-1975’, ‘डकैत-1987’, ‘बैंडिट क्वीन-1994’, ‘वुंडेड : द बैंडिट क्वीन-2007’, पान सिंह तोमर-2010, दद्दा मलखान सिंह और सोन चिरैया-2019 प्रमुख हैं. इन फिल्मों में से कुछ फिल्मों में चम्बल की वास्तविक तस्वीर बड़ी विश्वसनीयता के साथ अंकित हुई है.

– चंबल में फिल्मकार बना सकते हैं बड़ी फिल्में
घाटी में फिल्मांकन की दृष्टि से पीला सोना यानी सरसों से लदे खेत, इसके खाई-भरखे, पढ़ावली-मितावली, बटेश्वर, सिंहोनिया के हजारों साल पुराने मठ-मन्दिर, सबलगढ़, धौलपुर, अटेर, भिंड के किले, चंबल सफ़ारी में मगर, घड़ियाल और डॉल्फिनों के जीवन्त दृश्य और चाँदी की तरह चमकती चंबल के रेतीले तट और स्वच्छ जलधारा…और भी बहुत कुछ है चम्बल में, जिस पर फिल्मकारों और पर्यटकों की अभी दृष्टि पड़ी नहीं है. चंबल बहुत ही उर्वर है इस मामले में नए फिल्मकारों को इसका लाभ उठाना चाहिये. इस बार के फिल्म फेस्टिवल में इसी को लेकर चर्चा होगी.