क्या शिवसेना और NCP के बाद अब TMC की बारी? ममता बनर्जी की पार्टी के 'जयचंद' कौन, जिन्होंने खुद को बताया असली तृणमूल

Written By: Anjali Karmakar Updated by: Anjali Karmakar
Updated Date:June 2, 2026 5:13 PM IST

बंगाल में TMC के 80 विधायक हैं. नए गुट को मान्यता के लिए दो-तिहाई यानी 54 विधायकों की जरूरत होगी. इससे कम विधायक होने पर स्पीकर नए गुट को मान्यता नहीं देंगे.

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के नतीजे आने के बाद से ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस में घमासान मचा है. एक के बाद एक पार्टी के नेता साथ छोड़ रहे हैं. राजनीतिक गलियारों में ऐसी सुगबुगाहट तेज हो गई है कि महाराष्ट्र में जो हाल शिवसेना और NCP का हुआ था, ठीक वैसा ही हाल तृणमूल कांग्रेस का हो सकता है. यानी ममता की पार्टी भी दो गुटों में बंट सकती है. शिवसेना में टूट के लिए एकनाथ शिंदे को जिम्मेदार ठहराया जाता है. जबकि, अजित पवार ने अपने चाचा शरद पवार से बगावत करके उनकी पार्टी के नाम और निशान पर अपना अधिकार जमा लिया था. ऐसे में आइए जानते हैं कि बंगाल में ममता बनर्जी के जयचंद कौन हैं, जिनकी वजह से पार्टी में टूट हो सकती है?

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पहले जानिए जयचंद कौन थे?

जयचंद 12वीं शताब्दी में कन्नौज के गहड़वाल वंश के राजा थे. उनका शासन वर्तमान उत्तर प्रदेश के बड़े हिस्से में था. लोकप्रिय कथा के अनुसार, जयचंद और पृथ्वीराज चौहान के बीच दुश्मनी थी. पृथ्वीराज ने जयचंद की बेटी संयोगिता से स्वयंवर के दौरान शादी कर ली थी. इससे जयचंद नाराज हो गए थे. इसके बाद यह कहानी प्रचलित हुई कि जयचंद ने मुहम्मद गोरी का साथ दिया और पृथ्वीराज चौहान के खिलाफ साजिश की. इसी वजह से उन्हें गद्दार कहा जाने लगा.

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TMC में कौन है जयचंद?

ममता बनर्जी के लिए जयचंद का काम रिजू दत्ता कर रहे हैं. ममता बनर्जी ने हाल ही में उन्हें TMC से निकाल दिया था. इसके बाद रिजू ने दावा किया कि 80 में से 50 से ज्यादा विधायक खुद को असली तृणमूल बताने की तैयारी कर रहे हैं.

न्यूज एजेंसी ANI के मुताबिक, रिजू दत्ता ने दावा किया है कि ये सभी विधायक विधानसभा स्पीकर के पास जाएंगे. स्पीकर को बताया जाएगा कि हम ही असली तृणमूल कांग्रेस हैं. हमारे पास दो-तिहाई बहुमत है. हम विपक्ष के नेता ऋतब्रत को बनाना चाहते हैं. चूंकि, हमारे पास ज्यादा विधायक हैं, इसलिए हमें तृणमूल कांग्रेस का नाम और निशान (चुनाव चिह्न) मिलना चाहिए. बता दें कि TMC में टूट का दावा करने वाले रिजू दत्ता विधायक नहीं हैं.

संदीपन साहा और ऋतब्रत बनर्जी पार्टी से बर्खास्त

सोमवार को ममता बनर्जी ने TMC से 2 विधायक संदीपन साहा और ऋतब्रत बनर्जी को पार्टी से निकाल दिया था. दोनों ने स्पीकर से शिकायत की थी कि पार्टी ने शोभनदेव को नेता विपक्ष बनाने वाले प्रस्ताव में उनके उनके फर्जी साइन किए थे. निलंबन के बाद दोनों ने MLA हॉस्टल में TMC के कई विधायकों के साथ मीटिंग की थी. इसमें ममता के कई खास विधायक भी शामिल हुए. इस घटना के बाद TMC में टूट की अटकलों को और हवा मिली.

TMC में टूट होने पर क्या बनेंगे समीकरण?

  • बंगाल में TMC के 80 विधायक हैं. नए गुट को मान्यता के लिए दो-तिहाई यानी 54 विधायकों की जरूरत होगी. इससे कम विधायक होने पर स्पीकर नए गुट को मान्यता नहीं देंगे.
  • अगर TMC के कुल 80 विधायकों में से दो-तिहाई यानी 54 विधायक BJP में शामिल होने का फैसला लें, तो ऐसे में दलबदल कानून लागू नहीं होगा.
  • अगर TMC में 2 गुट हो जाए, तो एक ग्रुप पार्टी से अलग होकर असली TMC का दावा कर सकता है. इसके लिए भी 54 विधायकों के समर्थन की जरूरत होगी.
  • अगर एक गुट अपने पास दो-तिहाई विधायकों के समर्थन का दावा करता है, तो चुनाव आयोग आगे फैसला लेगा. फैसले पर सहमति नहीं बनने पर मामला कोर्ट में भी जा सकता है.

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बागी विधायकों के लिए क्या कहता है संविधान?

संविधान की 10वीं अनुसूची में दिए गए दलबदल कानून के मुताबिक, अगर किसी राष्ट्रीय/राज्य स्तर की पार्टी के विधायक बागी हो जाएं, तो वे सीधे पार्टी पर दावा नहीं कर सकते. यह मामला दलबदल कानून, पार्टी संगठन के संविधान और निर्वाचन आयोग के नियमों से तय होता है.

हालांकि, 91वें संविधान संशोधन (2003) के बाद अगर कम से कम दो-तिहाई विधायक मूल पार्टी से अलग होने का फैसला लेते हैं, तो उन्हें अयोग्यता से छूट मिल सकती है. इसके बाद चुनाव आयोग यह जांच करता है कि पार्टी पर असली नियंत्रण किसका होगा.

शिवसेना में कैसे हुई थी टूट?

  • महाराष्ट्र में 2019 में विधानसभा के चुनाव हुए. शिवसेना और BJP ने मिलकर चुनाव लड़ा और बड़ी जीत दर्ज की. लेकिन, मुख्यमंत्री पद को लेकर दोनों दलों में विवाद हो गया. उद्धव ठाकरे CM बनना चाहते थे. BJP इसके लिए तैयार नहीं थी. मामला बढ़ता गया और शिवसेना-BJP के रास्ते जुदा हो गए.
  • इसी बीच NCP के अजित पवार (दिवंगत) ने बगावत कर दी. वो चुपके से BJP के साथ हो लिए. सुबह 5 बजे देवेंद्र फडणवीस ने CM और अजित पवार ने डिप्टी CM की शपथ भी ले ली. लेकिन, मामला कोर्ट में पहुंच गया. इसके बाद 2 दिन के अंदर दोनों को इस्तीफा देना पड़ा.
  • फिर उद्धव ठाकरे ने कांग्रेस, NCP के साथ मिलकर महाविकास अघाड़ी की सरकार बना ली. हालांकि, शिवसेना के कई विधायक कांग्रेस-NCP के साथ गठबंधन को लेकर नाराज थे. BJP ने इस नाराजगी को कैश किया.
  • जून 2022 में एकनाथ शिंदे ने 40 से ज्यादा विधायकों के साथ बगावत कर दी. इससे उद्धव सरकार अल्पमत में आ गई और गिर गई. आखिरकार उद्धव ठाकरे ने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया. फिर देवेंद्र फडणवीस के साथ मिलकर एकनाथ शिंदे ने सरकार बना ली. शिंदे CM बने. फडणवीस ने डिप्टी बनना स्वीकार किया.
  • इसके बाद असली शिवसेना को लेकर शिंदे गुट और उद्धव गुट में लंबी लड़ाई चली. आखिरकार बहुमत के आधार पर चुनाव आयोग ने शिंदे गुट को असली शिवसेना माना. पार्टी का नाम और निशान भी उसे दे दिया गया.
  • सुप्रीम कोर्ट ने भी फैसले को बरकरार रखा. इसके बाद शिवसेना के दोनों गुटों को नया नाम और नया चुनाव चिह्न मिला. उद्धव गुट को शिवसेना (UBT) कहा गया. इसे मशाल चुनाव चिह्न दिया गया. जबकि असली शिवसेना का दर्जा शिंदे गुट को मिला. उसे तीर-कमान चिह्न भी मिल गया.

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NCP में कैसे हुई थी टूट?

  • NCP में बड़ी टूट 2023 में हुई. अजित पवार ने अपने चाचा शरद पवार के खिलाफ बगावत कर दी थी. 2 जुलाई 2023 को अजित पवार महाराष्ट्र की तत्कालीन शिंदे-फडणवीस सरकार में शामिल हो गए. उन्होंने डिप्टी CM की शपथ ले ली.
  • अजित पवार के साथ NCP के कई विधायक और नेता भी चले गए. इससे पार्टी दो गुटों में बंट गई. शरद पवार गुट ने कहा कि असली NCP उनके पास है, क्योंकि पार्टी उन्होंने बनाई थी. अजित पवार गुट ने दावा किया कि ज्यादातर विधायक और संगठन उनके साथ हैं, इसलिए वही असली NCP हैं.
  • फरवरी 2024 में चुनाव आयोग ने विधायकों और संगठनात्मक समर्थन को आधार मानते हुए अजित पवार गुट को NCP का आधिकारिक नाम और 'घड़ी' चुनाव चिन्ह दे दिया. इसके बाद शरद पवार के गुट को नया नाम मिला.
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