आर-पार की लड़ाई में उतरे TMC के बागी विधायक, नई वर्किंग कमेटी में ममता बनर्जी की जगह अरूप रॉय को बनाया चेयरमैन

Written By: Anjali Karmakar Updated by: Anjali Karmakar
Updated Date:June 22, 2026 8:16 PM IST

पूरे विवाद के केंद्र में अभिषेक बनर्जी की भूमिका भी चर्चा में है. पार्टी के भीतर उठ रही आवाजों का एक बड़ा हिस्सा संगठन में उनके बढ़ते प्रभाव को लेकर सवाल उठा रहा है.

  • TMC के लोकसभा में 28 और राज्यसभा में 13 सांसद.
  • अलग गुट बनाने के लिए 2/3 का संख्याबल जरूरी.
  • पार्टी बचाने के लिए INDIA ब्लॉक से मांगी मदद.
  • ममता की सबसे बड़ी ताकत TMC का कैडर नेटवर्क.

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 हारने के बाद ममता बनर्जी अब तक के सबसे बड़े राजनीतिक संकट का सामना कर रही हैं. उनकी पार्टी तृणमूल कांग्रेस (TMC) का अंदरूनी संघर्ष लगातार गहराता जा रहा है. पहले TMC के 58 विधायकों ने अलग गुट बना लिया. फिर 20 लोकसभा सांसदों ने भी अलग राह चुन ली और त्रिपुरा की नेशनलिस्ट सिटीजन पार्टी ऑफ इंडिया (NCPI) में अपना विलय कर लिया. अब अलग गुट बना चुके TMC के 58 विधायकों ने ममता के खिलाफ एक और बड़ा कदम उठाया है. विधायक ऋतब्रत बनर्जी के गुट ने ममता बनर्जी की लीडरशिप को नकारते हुए सीनियर नेता अरूप रॉय को नया चेयरमैन घोषित किया है. अभिषेक बनर्जी भी महासचिव के पद से सस्पेंड किए गए हैं. ऋतब्रत बनर्जी के गुट ने इसे असली TMC बताया है. इस घटनाक्रम ने ममता बनर्जी और उनके भतीजे अभिषेक बनर्जी के नेतृत्व के सामने नई चुनौती खड़ी कर दी है.

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न्यूज एजेंसी PTI की रिपोर्ट के मुताबिक, बंगाल विधानसभा चुनावों में करारी शिकस्त के बाद TMC में शुरू हुआ आंतरिक विवाद अब पूरी तरह से पार्टी पर कब्जे की जंग में तब्दील हो चुका है. अलग गुट बना चुके TMC के विधायकों ने सोमवार (22 जून 2026) को कोलकाता के न्यू टाउन स्थित एक होटल में हुई इमरजेंसी मीटिंग की. इसमें 58 विधायक शामिल हुए. कोलकाता नगर निगम के 70 पार्षदों ने मीटिंग में हिस्सा लिया.

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नई वर्किंग कमेटी में कौन-कौन?

न्यूज एजेंसी ANI के मुताबिक, TMC के अलग गुट ने 30 लोगों की वर्किंग कमेटी बनाई है. इसमें नेता प्रतिपक्ष ऋतब्रत बनर्जी, संदीपन और जावेद खान महासचिव होंगे. वहीं, कोलकाता के मेयर रहे फिरहाद हाकिम, अरूप विश्वास, रथीन घोष को उपाध्यक्ष बनाया गया है.

कैसे शुरू हुआ विवाद?

पश्चिम बंगाल विधानसभा में 23 और 29 अप्रैल को दो फेज में वोटिंग हुई. नतीजे 4 मई को आए. 208 सीटों के साथ BJP ने पहली बार सरकार बनाई. ममता बनर्जी की TMC को इस बार मात्र 80 सीटें मिलीं. चुनाव नतीजे आने के 15 दिन के अंदर TMC में अंदरूनी कलह और असंतोष सामने आने लगा. विवाद की शुरुआत विधानसभा में विपक्ष के नेता (LoP) के चयन से जुड़े कथित फर्जी साइन मामले से हुई थी. बागी विधायक ऋतब्रत बनर्जी और संदीपन साहा ने आरोप लगाया था कि कुछ विधायकों के साइन का गलत इस्तेमाल किया गया. इसके बाद मामला पुलिस और CID जांच तक पहुंच गया. इन आरोपों के बाद TMC नेतृत्व ने ऋतब्रत बनर्जी और संदीपन साहा पर पार्टी विरोधी गतिविधियों का आरोप लगाते हुए उन्हें पार्टी से निष्कासित कर दिया. हालांकि, यह कदम बगावत को रोकने के बजाय और बड़ा राजनीतिक संकट बन गया.

ऋतब्रत बनर्जी ने बनाया अलग गुट और किया असली TMC होने का दावा

निष्कासन के बाद ऋतब्रत बनर्जी ने दावा किया कि उन्हें पार्टी के बड़ी संख्या में विधायकों का समर्थन हासिल है. बागी गुट ने विधानसभा अध्यक्ष के सामने अलग विधायी समूह के रूप में अपनी दावेदारी पेश की और ऋतब्रत बनर्जी को विपक्ष का नेता बनाने का प्रस्ताव रखा. बाद में उन्हें विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष के रूप में मान्यता भी मिल गई.

सवालों के घेरे में अभिषेक बनर्जी की भूमिका

इस पूरे विवाद के केंद्र में अभिषेक बनर्जी की भूमिका भी चर्चा में है. पार्टी के भीतर उठ रही आवाजों का एक बड़ा हिस्सा संगठन में उनके बढ़ते प्रभाव को लेकर सवाल उठा रहा है. कई रिपोर्टों में दावा किया गया है कि बगावत का निशाना केवल ममता बनर्जी नहीं, बल्कि अभिषेक बनर्जी का नेतृत्व भी है.

फिलहाल मामला अदालत और विधानसभा दोनों स्तरों पर पहुंच चुका है. कलकत्ता हाई कोर्ट भी नेता प्रतिपक्ष की नियुक्ति से जुड़े विवाद पर सुनवाई कर रहा है. ऐसे में आने वाले दिनों में यह संघर्ष पश्चिम बंगाल की राजनीति की दिशा तय कर सकता है. एक समय अटूट दिखने वाली TMC अब अपने सबसे बड़े आंतरिक संकट से गुजरती नजर आ रही है.

TMC को हुआ क्या-क्या नुकसान?

  • TMC के लोकसभा में 28 में से 20 सांसद और राज्यसभा में 13 में से 2 सांसद यानी कुल 22 सांसद टूट चुके हैं. 3 जून को बंगाल के 80 में से 58 विधायक अलग गुट बना चुके हैं. इस गुट ने ऋतब्रत बनर्जी को अपना नेता बनाया है. उत्तर दमदम में 21 पार्षदों ने भी इस्तीफा दे दिया है.
  • 3 जून को TMC में पहली बार बगावत की खबर सामने आई थी. 58 बागी विधायकों ने पार्टी से निकाले गए विधायक ऋतब्रत बनर्जी को अपना नेता चुना. विधानसभा स्पीकर रथींद्र बोस को सपोर्ट लेटर दिया. इसमें मांग की गई कि ऋतब्रत को नेता विपक्ष घोषित किया जाए. स्पीकर ने मंजूरी दे दी.
  • 8 जून को TMC के लोकसभा के 28 सांसदों में से 20 ने NDA सरकार को समर्थन देने का फैसला किया था. सांसद और TMC की पूर्व नेता काकोली घोष दस्तीदार ने कहा था कि सांसदों के साइन वाला लेटर लोकसभा स्पीकर ओम बिरला को भेज दिया है. इसमें अलग संसदीय ब्लॉक के रूप में अलग बैठने की व्यवस्था की मांग भी की गई.

ममता बनर्जी के पास अभी क्या बचा है?

  • TMC के पास कुल 28 लोकसभा सांसद थे, जिसमें से 20 अलग हो गए हैं. अब लोकसभा में ममता के पास सिर्फ 8 सांसद बचे हैं. राज्यसभा की बात करें, तो 13 में से 2 सांसद इस्तीफा दे चुके हैं. 11 राज्यसभा सांसद बचे हैं.
  • TMC ने इस विधानसभा चुनाव में 80 सीटें जीती हैं. 58 विधायक अलग गुट बना चुके हैं. ऐसे में ममता के पास सिर्फ 22 विधायक बचे हैं.

क्या सच में ममता बनर्जी की पकड़ कमजोर पड़ रही?

पिछले कुछ दिनों में तृणमूल कांग्रेस के भीतर असंतोष लगातार बढ़ता दिख रहा है. काकोली घोष दस्तीदार का दावा इस संकट को और बड़ा बना रहा है. काकोली घोष ने न्यूज एजेंसी ANI से कहा था, “अगर इतने बड़े स्तर पर सांसद NDA के साथ जाने का फैसला करते हैं, तो यह सिर्फ संसदीय संख्या का मामला नहीं रहेगा. इससे ममता बनर्जी की राजनीतिक पकड़ पर भी सवाल खड़े होंगे.”

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