महात्मा गांधी को याद करने की कोई वजह ढूंढ़ी जाए, ऐसा नहीं लगता. आप गांधी को कभी भी याद कर सकते हैं. पढ़ने के बहाने, विचार के बहाने, नेताओं की चर्चा के बहाने या फिर उनकी कर्मस्थलियों पर जाकर. हम
आज गांधी को देश में उनके कुछ प्रसिद्ध नामचीन कर्मस्थल की यात्रा के बहाने याद कर रहे हैं. हम आपको ले चलते हैं दांडी, जहां गांधी ने अंग्रेजों के खिलाफ नमक सत्याग्रह किया था. दांडी का यह यात्रा वृत्तांत आपका
आज के दांडी से परिचय कराएगा, साथ ही पर्यटन करने को प्रेरित भी करेगा, ऐसी उम्मीद है.

दांडीः मैं छूना चाहता था सत्याग्रह की पवित्र जमीन

मैं 2017 में जब नई नौकरी के लिए उत्तर प्रदेश के नोएडा से गुजरात के सूरत शिफ्ट हो रहा था, तो क्लासमेट्स और कई साल कहीं रह लेने पर स्वाभाविक से लगाव को ‘घूमने की चाहत’ से किनारे किया था. मैंने
सोचा कि चलो कुछ नई जगह, नई संस्कृति देखने को मिलेगी, पहली बार समंदर देखा जाएगा. मेरे लिए घूमना मतलब है उसकी संस्कृति, लोग और उसके इतिहास को समझना. उसे कैमरे में कैप्चर करना. गुजरात में
घूमने वाली जगहों में दांडी का नाम सबसे ऊपर था. मैं सत्याग्रह की पवित्र जमीन को छूना चाहता था. हालांकि यह खूबसूरत दिन आया सूरत आने के कई महीनों के बाद किसी वीक ऑफ की पूर्व संध्या पर. जैसा कि
अखबार में नौकरी करते हुए हर काम वीक ऑफ के दिन ही निपटाने की योजना बनाने की अघोषित परंपरा है. मैं कैमरा दोबारा ले चुका था, इसकी सही शुरुआत दांडी से बेहतर और दूसरी जगह कहां हो सकती थी.

 

महात्मा गांधी.

महात्मा गांधी.

 

दांडी के लिए सुबह बस स्टैंड से बस पकड़ी. नई जगह, गुजरात में पहली बार बस की यात्रा और मेरा पहली बार अकेले घूमने का प्लान. मन में काफी उथल-पुथल मची थी. एक कारण तो गुजराती भाषा का कम समझ
में आना भी था. सूरत से इसकी दूरी करीब 60 किलोमीटर है. जिसके लिए दो बार बस बदलनी पड़ती है. पहली नवसारी तक, जिसकी दूरी 45 किलोमीटर है और दूसरी वहां से करीब 18 किलोमीटर दूर दांडी तक.

दो घंटे में बस नवसारी पहुंची तो मैं कंडक्टर की बात समझ नहीं पाया और एक किलोमीटर पहले उतर लिया. बस स्टैंड का कुछ समझ नहीं आया तो पहले गूगल मैप का सहारा लिया. लेकिन जल्दी ही समझ आ गया
कि गूगल का सहारा नहीं, किसी व्यक्ति से पूछताछ की जानी चाहिए. भूख बहुत जोर की लगी थी, एक पराठे की रेहड़ी दिखी. पहले तो मेथी के पराठे खाने की हिम्मत नहीं पड़ रही थी लेकिन दो लिया, काफी टेस्टी थे.
दो फिर और खाया और पानी पिया तब थोड़ी जान में जान आई. इससे भी बड़ी सुकून वाली बात लगी कि सिर्फ 20 रुपए खर्च हुए. खाकर बस स्टैंड पहुंचा तो मालूम हुआ कि एक-डेढ़ घंटे बाद दांडी के लिए बस
मिलेगी. अब इतनी देर क्या करता, बस अड्‌डे का मुआयना किया. आसपास के बाजार देखे.

आप गुजरात में बस से यात्रा करते हुए पाएंगे कि बस स्टैंड या बस अड्ड् अक्सर किसी मॉल की तरह दिखेंगे. नवसारी मॉल जैसा तो नहीं था, लेकिन उसपर एक छोटा ढाबा जरूर चल रहा था. हालांकि मैं पराठे खा चुका
था तो देखकर कोई इच्छा नहीं हुई. बाहर कुछ महिलाएं बेर, अमरूद, नासपाती और नारियल के अलावा कुछ स्थानीय फल भी बेच रही थीं. इसी बीच एक खटारा सी बस आई, हम सवार हो लिए.

 

दांडी स्थित सैफी विला, जहां ठहरे थे महात्मा गांधी.

दांडी स्थित सैफी विला, जहां ठहरे थे महात्मा गांधी.

 

बस में सवारी अधिक नहीं थी, कुछ लड़के थे जो दांडी जा रहे थे, बीच पर मस्ती करने और कुछ महिलाएं और बुजुर्ग. लड़के गांधी को जानते थे, लेकिन ऐसे बुड्ढे के तौर पर, जिसकी वजह से दांडी बीच काफी डेवलप
है, इससे अधिक नहीं. नवसारी से दांडी के बीच सड़क के दोनों तरफ हरे खेत और आम के पेड़ थे. किनारे के पेड़ इतने सघन थे कि सड़क पर घनी छाया थी. बहुत दिन बाद इतनी हरियाली देखने को मिली थी. बस के
दांडी में मुख्य जगह पहुंचने से पहले एक रोचक लेकिन थोड़ा आश्चर्यजनक घटना हुई. बस में सवार एक महिला का घर मुख्य सड़क से करीब दो तीन किलोमीटर अलग हटकर था. बस उसे घर तक छोड़ने गई. पूछने
पर बताया कि वह इतना लंबा पैदल नहीं जा सकती, इसलिए बस हर रोज छोड़ती है. अब हम पहुंच गए थे नमक तोड़ने, प्रार्थना स्थल और सैफी विला के परिसर के मुख्य गेट पर. एक चाय-पानी की दुकान चलाने वाले
दुकानदार ने बताया कि शाम को भी बस यहीं से मिलती है, आराम से घूमिए. उसने थोड़ा बहुत गांधी और नमक सत्याग्रह के बारे में भी बताया.

मेन गेट से सैफी विला की दूरी एक किलोमीटर से अधिक है. तेज धूप और समंदर की नम हवा से उपजी चिपचिपाहट भरे मौसम में यह दूरी तय करनी पड़ी. पक्की सड़क के दोनों तरफ बबूल की घनी झाड़ियां थीं. उस
पर गौरैये, कबूतर और पेंडुकी जैसे पक्षी आराम फरमा रहे थे. पक्षी और भी रहे होंगे लेकिन आंखें खोज नहीं पाईं. इसके अलावा थोड़ी-थोड़ी देर में इक्का-दुक्का मोटरसाइकिलें भी गुजर जा रही थीं.

जहां गांधी जी ने नमक कानून तोड़ा था वह एक परिसर की तरह है. जिसमें एक ऊंची पटि्टका बनी हुई है, पास में काले रंग से पेंट की हुई गांधी जी की नमक उठाने की मुद्रा में मूर्ति खड़ी है. आसपास बने पार्क नुमा
जगह में लगे पौधों की छंटाई काफी दिनों से नहीं हुई थी. मैं परिसर में घुसते ही सबसे पहले इसी जगह पर पहुंचा. इस दौरान कान में एक व्यक्ति की जूते चप्पल निकालने की हिदायत भरी आवाज पड़ी. ये रमन भाई
पटेल थे, जो पिछले 15-16 सालों से यहां ‘गांधी’ की हिफाजत करते हैं. उन्होंने बैठाया, पानी पिलाया, जैसा कि वो करीब सबके साथ करते हैं उसी अंदाज में.

 

रतन भाई पटेल, गांधी स्मारक के केयर टेकर.

रतन भाई पटेल, गांधी स्मारक के केयर टेकर.

 

रमन भाई को मैं गांधीवादी तो नहीं कह सकता, लेकिन गांधी के प्रति उनका लगाव साफ तौर पर दिखा. उनसे काफी लंबी बातचीत हुई. उन्होंने पास में बन रहे म्यूजियम के प्रोजेक्ट के कामगारों पर बात की. देश की
वर्तमान राजनीतिक स्थिति और सैफी विला की उपेक्षा जैसे कई सारे मुद्दों पर बात की. व्यवस्था और इस सरकार के प्रति उनका आक्रोश चरम पर था. मैं उनकी आंखों में गांधी की उपेक्षा का आक्रोश साफ साफ देख
सकता था। उन्होंने कहा, ‘इस सरकार का बस चले तो गांधी को समंदर में डुबा कर खत्म कर दे. लेकिन वह चाहकर भी ऐसा नहीं कर सकती.’ रमन भाई ने बताया कि कई बार घास काटने और देख-रेख पर आने वाले
खर्च सरकार से नहीं मिलते तो उन्हें अपनी जेब से देने पड़ते हैं. उन्हें लगा कि मैं अखबार में काम करता हूं तो खबर छप जाएगी. लेकिन मैं जानता था कि ऐसा कुछ नहीं होने वाला. रमन भाई ने कहा, दांडी देखने के
लिए विदेश से भी लोग आते हैं लेकिन सैफी विला की मरम्मत नहीं हो रही. कई बार दो-दो, तीन-तीन महीने घास काटने वाले के पैसे तक नहीं मिलते. सैफी विला में दो तीन बल्ब जलते हैं, लेकिन उसका बिल तक
सरकार नहीं जमा करती. वे बीच-बीच में गांधी दर्शन को आने वाले पर्यटकों को हिदायत भी देते रहते थे. वे लगातार बोले जा रहे थे और मैं सुनता रहा। उनके पास शिकायतों का पूरा गठ्‌ठर था.

 

गांधी स्मारक में रखा है बिहार के चंपारण से लाया गया मिट्टी का कलश.

गांधी स्मारक में रखा है बिहार के चंपारण से लाया गया मिट्टी का कलश.

 

सैफी विला
मैंने सैफी विला के बारे में अभी तक नहीं बताया. दरअसल यह ऊंचे चबूतरे पर बनी एक इमारत है, जिसमें गांधी जी आकर रुके थे. अब यह म्युजियम है, जिसमें गांधी से जुड़ी तस्वीरों का संग्रह है. इसमें चंपारण
(बिहार) की मिट्टी से भरा एक कलश रखा है. चंपारण शताब्दी वर्ष के अवसर पर पर वहां से पांच अप्रैल 2017 को दांडी स्मृति कलश लाया गया था. इसमें चंपारण की मिट्टी रखी हुई है. इसी तरह का एक स्मृति कलश
दांडी से चंपारण भी भेजा गया था. म्युजियम में लगी ऐतिहासिक तस्वीरों से होकर गुजरते हुए महसूस हुआ कि गांधी को हम कितना कम जानते हैं. उनके विचारों के बारे में हम कितना सतही तौर पर सोच पाते हैं.
यदि किसी दिन सैफी विला सच में खत्म हो जाएगा या गांधी की निशानियों को मिटा दिया जाएगा तो क्या सच में गांधी मिट जाएंगे? म्युजियम में घूमते हुए मन में ख्याल आया कि क्यों न साबरमती आश्रम से दांडी
तक यात्रा की जाए, जिसमें उन्हीं गांवों से होकर गुजरा जाए जहां गांधी रुके थे. क्या गांधी के विचारों का कोई प्रभाव अब भी लोगों में बचा हुआ है? अब कैसे हैं ये गांव. क्यों न निलहे किसानों की जमीन वाले चंपारण
से नमक के खेतों में मजदूरी करने वाले दांडी और कच्छ तक पदयात्राएं की जाएं.

 

दांडी का समुद्र तट.

दांडी का समुद्र तट.

 

मैं करीब दो बजे रमन भाई से दोबारा मिलने का वादा करके लेकर दांडी बीच पर पहुंचा. धूसर रंग का दूर तक पसरा हुआ यह बीच गुजरात के दूसरे समुद्र तटों के मुकाबले काफी साफ-सुथरा है. हालांकि उम्मीद थी कि
समंदर के किनारे खूबसूरत सूर्यास्त देखने को मिलेगा, लेकिन बादल होने की वजह से ऐसा नहीं हो सका. सूर्यास्त नहीं दिखा तो समंदर की रेत के कुछ पैटर्न और वहां मस्ती कर रहे लोगों की तस्वीरें कैप्चर कर लीं.

साभारः  प्रवीण कुमार  के ब्लॉग कच्ची सड़क4 से. लेखक पेशे से पत्रकार हैं. फोटोग्राफी-घूमने के शौकीन हैं. अभी गुजरात के सूरत में कार्यरत हैं.

(डिस्क्लेमर : इस आलेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी विचार हैं)