नई दिल्ली/रायपुर. छत्तीसगढ़ में एक जगह है सुकमा. इसका नाम सामने आते ही नक्सली हमला, शहीद होते जवान, मूलभूत सुविधाओं से वंचित लोग, शासन प्रशासन की कार्रवाई, सरकारों के वादे जैसी चीजें ही दिमाग में आती हैं. हो भी क्यों न, पिछले कुछ दशक से ये इलाका इन्हीं चीजों के लिए चर्चित रहा है. लेकिन, इस बार सुकमा इन सबसे बड़ी ‘घटना’ की वजह से चर्चित है. कारण है यहां कि 19 साल की आदिवासी लड़की.

हम खबरें पढ़ते-सुनते हैं कि इस नक्सल प्रभावित क्षेत्र में स्कूल तो खुले हैं, लेकिन टीचर नदारद रहते हैं. या फिर जाते भी हैं तो खानापूर्ति करने के लिए. इन सबके बीच एक आदिवासी लड़की ने अपनी स्कूली पढ़ाई  पूरी की और मेडिकल कॉलेज में एडमिशन लिया है. खास बात ये है कि उसने इसके लिए कोई कोचिंग तक नहीं की.

बचपन से डॉक्टर बनना चाहती थीं
माया कश्यप सुकमा के दोरनापाल की रहने वाली हैं. सुकमा बचपन से डॉक्टर बनना चाहती थीं, लेकिन उन्हें ये नहीं पता था कि इसका रास्ता कैसे तय किया जाए. उन्हें इतना तक नहीं पता था कि पढ़ाई में कितना खर्च आएगा. लेकिन कहते हैं न कि परिश्रम कभी जाया नहीं जाता. माया की मेहनत को भी अंजाम मिल ही गया.दोरनापाल में प्राइमरी एजुकेशन में 3 हजार बच्चे इनरोल हैं. गांव के स्कूल जिनमें से एक में माया पढ़ती है कभी-कभी टीचर को देख पाते हैं. ऐसे में मुश्किल से ही कुछ बच्चे हाईस्कूल तक की पढ़ाई पूरी कर पाते हैं. कॉलेज जाना तो उनका सपना ही होता है.

बचपन में उठ गया पिता का साया
अंग्रेजी अखबार टाइम्स ऑफ इंडिया से माया ने बताया, 9 साल पहले उनके पिता का देहांत हो गया था. इसके बाद उसका परिवार काफी मुश्किलों से जीवन-व्यापन करने लगा. माया बताती हैं, मैंने बाधाओं को कभी नहीं देखा. मैंने सिर्फ अपने लक्ष्य को देखा. इसका परिणाम ही है कि NEET परीक्षा में एसटी वर्ग में माया को 154वां रैंक मिला. ऐसे में उसे अंबिकापुर मेडिकल कॉलेज में एडमिशन मिल गया.

ऐसे की फीस का इंतजाम
माया बताती हैं, मैं बचपन से ही डॉक्टर बनना चाहती थी. पिता के देहांत के बाद पढ़ाई जारी रखना काफी मुश्किल हो गया था. लेकिन मैं रुकी नहीं. मैंने अपने सपने को नहीं छोड़ा. जब मैंने NEET क्वालिफाई किया तो मेरी फैमिली बहुत खुश थी, लेकिन फीस को लेकर चिंतित भी थी. उसके भाई अनूप ने दोस्त से लोन लिया तो भाभी ने रिश्तेदारों से पैसा. इसके बाद ही उसका एडमिशन हो पाया.

मुश्किल भरा रहा है जीवन
बचपन के दिनों को याद करते हुए माया कहती हैं, पिता के निधन के बाद तीन बच्चों को पालने की जिम्मेदारी मां की थी. ऐसे में सभी ने काफी मुश्किलों का सामना किया. वह NEET के लिए कभी कोचिंग नहीं गईं. वह कहती हैं कि डॉक्टर बनने के बाद वह अपने क्षेत्र में वापस लौटना चाहती हैं और लोगों की सेवा करना चाहती हैं.