
Satyam Kumar
सत्यम, बिहार से हैं. उन्होंने LS College, मुजफ्फरपुर, बिहार से जर्नलिज्म की पढ़ाई की है. जामिया मिल्लिया इस्लामिया से MA In Media Governance में मास्टर्स किया है. मास्टर्स के साथ ... और पढ़ें
हाल में ही त्रिपुरा हाई कोर्ट ने राज्य के हजारों सरकारी शिक्षकों के हक में एक ऐसा फैसला सुनाया है, जो पूरे देश के लिए नजीर बन सकता है. त्रिपुरा हाईकोर्ट ने राज्य सरकार के दशकों पुराने उस नियम को असंवैधानिक करार देते हुए रद्द कर दिया है. इस नियम के तहत नए सरकारी कर्मचारियों को ज्वाइनिंग के शुरुआती 5 साल तक केवल ‘फिक्स्ड वेतन’ (नियत वेतन) पर काम करना पड़ता था. हाई कोर्ट ने साफ किया है कि अब टीईटी (TET) शिक्षकों सहित सभी स्थायी कर्मचारियों को पहले दिन से ही रेगुलर पे-स्केल का लाभ मिलेगा.
चीफ जस्टिस एम.एस. रामचंद्र राव और जस्टिस बिश्वजीत पालित की खंडपीठ ने स्पष्ट रूप से कहा कि जब शिक्षकों की भर्ती एक चयन परीक्षा प्रक्रिया के माध्यम से स्थायी पदों पर हुई है, तो उन्हें पूर्ण वेतनमान से वंचित करना उनके संवैधानिक अधिकारों का हनन है. कोर्ट ने स्पष्ट आदेश दिया है कि चाहे वह ग्रेजुएट टीचर हों या पोस्ट-ग्रेजुएट, सभी को उनकी नियुक्ति की तारीख से ही पूर्ण वेतनमान दिया जाए.
त्रिपुरा में साल 2001 और 2007 के सरकारी आदेशों के मुताबिक, स्थायी पदों पर भर्ती होने के बावजूद कर्मचारियों को पहले पांच साल तक नियमित वेतनमान नहीं दिया जाता था. उन्हें एक निश्चित सैलरी (Fixed Salary) पर काम पर रखा जाता था. राज्य सरकार के इस नियम के खिलाफ 18 कर्मचारियों ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया.
राज्य सरकार ने बचाव में तर्क दिया था कि शिक्षकों ने अपनी नियुक्ति के समय ऑफर लेटर में लिखी ‘फिक्स्ड-पे’ की शर्त को खुद स्वीकार किया था. हालांकि, अदालत ने इस तर्क को सिरे से खारिज कर दिया. बेंच ने बहुत गहरी टिप्पणी करते हुए कहा कि सरकार और नौकरी पाने वाले उम्मीदवार के बीच मोलभाव (Bargaining Power) की शक्ति समान नहीं होती. मजबूरी में नौकरी स्वीकार करने का मतलब यह कतई नहीं है कि सरकार उनके साथ भेदभाव करे या अवैध नियम थोपे.
कोर्ट ने 2001 और 2007 के उन सरकारी ज्ञापनों (Memorandums) को रद्द कर दिया, जो नए कर्मचारियों को 5 साल तक कम वेतन पर काम करने को मजबूर करते थे. अदालत ने इसे संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन माना. याचिकाकर्ताओं, जिनका पक्ष अधिवक्ता पुरुषोत्तम रॉय बर्मन ने रखा, ने दलील दी थी कि वे ग्रुप सी और डी के स्वीकृत पदों पर तैनात हैं, फिर भी उन्हें नियमित वेतन का केवल 75 प्रतिशत हिस्सा ही दिया जा रहा था, जो कि मनमाना और तर्कहीन है.
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में वित्तीय लाभ को लेकर भी स्थिति स्पष्ट की है. हाई कोर्ट ने कहा कि सभी याचिकाकर्ता अपनी जॉइनिंग की तारीख से ही नियमित शिक्षक माने जाएंगे और उन्हें काल्पनिक रूप से (Notionally) लाभ मिलेगा. चूंकि कर्मचारियों ने कोर्ट आने में देरी की, इसलिए उन्हें याचिका दायर करने से 3 साल पहले तक का ही एरियर (बकाया) मिलेगा. साथ ही इस बकाया राशि पर सरकार को 9% वार्षिक ब्याज भी देना होगा. इसके साथ ही हाई कोर्ट ने राज्य सरकार पर प्रत्येक याचिकाकर्ता को 2,000 रुपये कानूनी खर्च के रूप में देने को कहा है. अब त्रिपुरा सरकार को तीन महीने के भीतर इस फैसले का पालन करना है.
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