क्या है 'G2'? ट्रंप का नया खेल या रणनीतिक बदलाव, इसकी चर्चा ने कैसे बढ़ाई भारत की बेचैनी
Donald Trump 'G2' Strategy: अमेरिका के 'G2' संकेत, इंडो-पैसिफिक नाम में बदलाव और भारत का गलत नक्शा दिखाने जैसी घटनाओं ने नई बहस छेड़ दी है. सवाल उठ रहे हैं कि क्या वॉशिंगटन की प्राथमिकताएं बदल रही हैं.
Donald Trump 'G2' Strategy: भारत और अमेरिका के रिश्तों को पिछले एक दशक में वैश्विक राजनीति की सबसे मजबूत रणनीतिक साझेदारियों में गिना गया है. रक्षा सहयोग, तकनीकी समझौते, क्वाड (QUAD) और इंडो-पैसिफिक रणनीति जैसे कई मंचों पर दोनों देश करीब आए, लेकिन हाल के कुछ घटनाक्रमों ने नई चर्चाओं को जन्म दे दिया है. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की तरफ से बार-बार 'G2' यानी अमेरिका और चीन की साझेदारी का जिक्र, इंडो-पैसिफिक शब्द के महत्व में बदलाव और भारत के गलत नक्शे को लेकर उठे विवाद ने नई दिल्ली में सवाल खड़े कर दिए हैं.
आखिर क्या है G2?
G2 कोई औपचारिक संगठन नहीं है, बल्कि एक अवधारणा है. इसका मतलब है कि दुनिया की दो सबसे बड़ी आर्थिक और सैन्य शक्तियां अमेरिका और चीन वैश्विक मुद्दों पर मिलकर फैसले लेने में प्रमुख भूमिका निभाएं. सालों तक अमेरिका चीन को अपना सबसे बड़ा रणनीतिक प्रतिद्वंद्वी बताता रहा, लेकिन अब ट्रंप की भाषा में कुछ बदलाव दिखाई दे रहा है. हाल के महीनों में ट्रंप ने कई बार चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ अपने रिश्तों का उल्लेख किया है. यही वजह है कि भारत सहित कई देशों में यह चर्चा शुरू हो गई है कि क्या अमेरिका चीन के साथ टकराव की जगह सीमित सहयोग की राह तलाश रहा है.
भारत क्यों हो सकता है चिंतित?
भारत लंबे समय से बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था का समर्थक रहा है। नई दिल्ली नहीं चाहती कि एशिया में किसी एक शक्ति का वर्चस्व हो. अगर अमेरिका और चीन किसी तरह के रणनीतिक समझौते की दिशा में आगे बढ़ते हैं, तो एशिया में शक्ति संतुलन बदल सकता है. भारत की सुरक्षा चिंताएं केवल आर्थिक नहीं हैं. वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर चीन के साथ तनाव और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में बढ़ती चीनी गतिविधियां पहले से ही भारत के लिए चुनौती बनी हुई हैं. ऐसे में अगर अमेरिका का फोकस चीन को संतुलित करने से हटता है, तो भारत को अपनी रणनीतिक प्राथमिकताओं पर पुनर्विचार करना पड़ सकता है.
QUAD की भूमिका पर भी उठे सवाल
भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया का समूह QUAD क्षेत्रीय संतुलन बनाए रखने का एक महत्वपूर्ण मंच माना जाता है. इसका मकसद केवल सुरक्षा सहयोग नहीं बल्कि सप्लाई चेन, तकनीक, समुद्री सुरक्षा और आर्थिक साझेदारी को मजबूत करना भी है. अगर अमेरिका चीन के साथ संबंधों को प्राथमिकता देता है, तो QUAD की उपयोगिता और प्रभाव को लेकर सवाल उठ सकते हैं. हालांकि, फिलहाल ऐसा कोई संकेत नहीं है कि यह मंच कमजोर पड़ रहा है, लेकिन रणनीतिक विशेषज्ञ इस संभावना पर नजर बनाए हुए हैं.
इंडो-पैसिफिक विवाद ने बढ़ाई चर्चा
हाल ही में अमेरिका द्वारा अपने सैन्य ढांचे में 'इंडो-पैसिफिक' शब्द को लेकर लिए गए फैसलों ने भी बहस को तेज किया है. कई विशेषज्ञों का मानना है कि 'इंडो' शब्द केवल भौगोलिक पहचान नहीं था, बल्कि भारत की बढ़ती वैश्विक भूमिका का प्रतीक भी था. इसके साथ ही एक अमेरिकी दस्तावेज में भारत का गलत नक्शा दिखाए जाने से विवाद और बढ़ गया. भारत ने इसे गंभीर मुद्दा मानते हुए अपनी आपत्ति दर्ज कराई. इस घटना ने उन लोगों की चिंताओं को और मजबूत किया जो अमेरिका की बदलती प्राथमिकताओं को लेकर सवाल उठा रहे हैं.
क्या भारत-अमेरिका संबंध कमजोर हो रहे हैं?
विशेषज्ञों का मानना है कि फिलहाल ऐसा कहना जल्दबाजी होगी. दोनों देशों के बीच रक्षा, तकनीक, खुफिया सहयोग और व्यापारिक रिश्ते लगातार मजबूत हो रहे हैं, लेकिन ये भी सच है कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में प्रतीकात्मक संकेतों का महत्व होता है. यही वजह है कि भारत अब अपनी विदेश नीति को और ज्यादा विविध बनाने पर जोर दे रहा है। यूरोप, मध्य पूर्व, अफ्रीका और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में नई साझेदारियां इसी रणनीति का हिस्सा हैं. भारत का लक्ष्य किसी एक शक्ति पर निर्भर रहने के बजाय बहुस्तरीय कूटनीतिक संतुलन बनाए रखना है.
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