नई दिल्ली. विधानसभा चुनाव में अपने अभूतपूर्व परिणाम को लेकर त्रिपुरा अभी चर्चा में है. भारतीय जनता पार्टी ने 25 साल के वाम शासन का अंत कर यहां की सत्ता पर कब्जा जमाया है. लेकिन क्या आपको पता है कि त्रिपुरा अपने रमणीक पर्यटन स्थलों के कारण भी जाना जाता है. फिर चाहे वह यहां के पहाड़ हों या उनाकोटि. उनाकोटि का नाम आपने सुना तो जरूर होगा. उत्तरी त्रिपुरा में स्थित यह जगह घने जंगलों के बीच चट्टानों पर बनी असंख्य मूर्तियों के लिए जाना जाता है. ये मूर्तियां विभिन्न देवी-देवताओं की हैं. त्रिपुरा के इस हरे-भरे और शांत शीतल वातावरण में सैकड़ों वर्षों से जंगल के बीच रखी इन मूर्तियों को देखकर लगता है जैसे किसी शिल्पकार ने कई सालों की मेहनत के बाद देवी-देवताओं को इतने सुंदर माहौल में विश्राम के लिए छोड़ दिया हो. आप इस जंगल में कहीं पर भी चले जाइए, हर तरफ आपको मूर्तियां नजर आ जाएंगी. आइए जानते हैं इस उनाकोटि के बारे में.

एक करोड़ से एक कम मूर्तियों के कारण पड़ा यह नाम
उनाकोटि के नामकरण की वजह बड़ी रोचक है. दरअसल, इसका अर्थ होता है एक करोड़ से एक कम. त्रिपुरा की राजधानी से लगभग 178 किलोमीटर दूर इस जगह पर जंगल में बनी मूर्तियों की संख्या की अभी तक किसी ने गिनती तो नहीं की, लेकिन जंगल में जहां-तहां पड़ी इन मूर्तियों को देखकर यहां के नाम की सार्थकता जरूर महसूस हो जाती है. बड़े-बड़े चट्टानों पर उकेरी गई इन मूर्तियों के यहां होने के पीछे की कहानी भी रोचक है. स्थानीय लोग और दंतकथाएं बताती हैं कि यहां देवी-देवताओं की एक सभा हुई थी. जिसकी निशानी के रूप में ये मूर्तियां हैं.

उनाकोटि के जंगल में स्थित एक मूर्ति. (फोटो साभारः त्रिपुरा4यू)

उनाकोटि के जंगल में स्थित एक मूर्ति. (फोटो साभारः त्रिपुरा4यू)

 

नाम के संदर्भ में भगवान शिव की कथा रोचक
उनाकोटि के नाम से संबंधित एक और कथा बड़ी रोचक है. इसके अनुसार भगवान शिव एक करोड़ देवी-देवताओं के साथ काशी की यात्रा पर निकले थे. चलते-चलते रात हो गई तो सभी देवी-देवताओं ने इसी स्थान पर रात्रि विश्राम किया. रात को सोने से पहले भगवान शिव ने सभी देवताओं से कहा कि सुबह सूर्योदय से पहले सभी लोग उठ जाएं, ताकि आगे की यात्रा की जा सके. लेकिन सुबह में सूर्योदय से पहले भगवान शिव को छोड़कर और किसी देवी या देवता की नींद नहीं खुली. ऐसे में भगवान शिव तो आगे के लिए प्रस्थान कर गए, मगर बाकी देवता यहीं छूट गए. सूर्योदय होते ही सभी देवी-देवता पत्थर की मूर्तियों में तब्दील हो गए. इसी कारण इस स्थान का नाम उनाकोटि, यानी एक करोड़ से एक कम, पड़ा.

उनाकोटि के जंगल में बनी एक मूर्ति.  (फोटो साभारः त्रिपुरा4यू)

उनाकोटि के जंगल में बनी एक मूर्ति. (फोटो साभारः त्रिपुरा4यू)

 

शिव और गणेश की प्रतिमाओं की संख्या ज्यादा
उनाकोटि के जंगल में जमीन पर पड़ी इन मूर्तियों के केंद्र में भगवान शिव और गणेश हैं. ताज्जुब की बात यह है कि इन मूर्तियों का आकार निश्चित नहीं है. कोई अत्यंत छोटी हैं तो किसी का आकार विशालकाय है. 30 फुट ऊंचे शिव की विशाल प्रतिमा देखने योग्य है. इसे यहां उनाकोटिश्वर काल भैरव कहा जाता है. पास ही में शेर पर सवार दुर्गा की प्रतिमा भी उकेरी गई है. इसके अलावा चार हाथ वाले और तीन दांतों वाले गणेश की प्रतिमा भी अद्भुत है. इन्हीं मूर्तियों के बीच एक कुंड भी है, जिसे सीता कुंड कहा जाता है. हर साल अप्रैल में यहां मेला लगता है.

8वीं या 9वीं सदी के शिल्प
उनाकोटि के जंगलों में चट्टानों पर कब ये शिल्प उकेरे गए या किसी राजा ने ये मूर्तियां बनवाईं या यहां पर इतनी बड़ी तादाद में मूर्तियां क्यों बनवाई गई, इसका इतिहास नहीं मिलता. हालांकि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के अनुसार उनाकोटि का काल आठवीं या नौवीं शताब्दी का है. लेकिन इसके शिल्प यानी मूर्तियों के समय-काल के बारे में अनेकानेक मत हैं. बहरहाल सरकार अब इस पुरातात्विक महत्व के स्थल के उद्धार की योजना बना रही है. उम्मीद है कि भारतीय जनता पार्टी की नई बनने वाली सरकार भारत के पूर्वोत्तर हिस्से में स्थित इस ऐतिहासिक स्थान को देश के पर्यटन के नक्शे पर लाने की दिशा में काम करेगी.

उनाकोटि के जंगलों में झरने भी पर्यटकों को आकर्षित करते हैं. (फोटो साभारः त्रिपुरा4यू)

उनाकोटि के जंगलों में झरने भी पर्यटकों को आकर्षित करते हैं. (फोटो साभारः त्रिपुरा4यू)

 

कैसे पहुंचें उनाकोटि
अगरतला से लगभग 200 किलोमीटर दूर उनाकोटि पहुंचने के लिए आप ट्रेन या बस की यात्रा कर सकते हैं. उत्तरी त्रिपुरा में स्थित इस जगह के लिए निजी टैक्सी की सेवा भी उपलब्ध है. आपको पहले अगरतला से नॉर्थ त्रिपुरा जिले के मुख्यालय कैलाशहर जाना होगा. यहां से कुमारघाट तक की यात्रा करनी होगी. कुमारघाट से आधे घंटे की दूरी पर यह मनोरम स्थान है. कैलाशहर से उनाकोटि की दूरी महज 8 किलोमीटर है.