नई दिल्ली: बीजेपी के सीनियर नेता एवं केंद्रीय कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने कांग्रेस पर हमला किया है. मंत्री प्रसाद ने कहा कि कांगेस की छवि और पहचान आपातकाल से दिशानिर्देशित होती आ रही है, क्योंकि प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा के खिलाफ महाभियोग का उसका हालिया कदम न्यायपालिका को जोखिम में डालने की एक कोशिश थी. आपातकाल लागू होने की 43 वीं बरसी पर बीजेपी के सीनियर नेता एवं केंद्रीय कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने मीडियाकर्मियों से कहा कि कांग्रेस ने उस वक्त न्यायपालिका को चुप करने की कोशिश की थी और इसी तरीके से अब कई मुद्दों को उठा कर उसने इसे एक संदेश दिया है. Also Read - UP Vidhan Parishad Election: यूपी विधान परिषद की 11 सीटों के लिए हुए चुनाव में 55.47% मतदान

केंद्रीय कानून मंत्री प्रसाद ने ने कहा कि आपातकाल का समर्थन करना कांग्रेस के डीएनए में है. प्रसाद ने कहा कि जब वह (कांग्रेस) चुनाव हारती है , तब वह इसके लिए इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) और चुनाव आयोग को जिम्मेदार ठहराती है. उसके नेता सेना प्रमुख पर भी प्रहार करते हैं. उन्होंने इस बात को खारिज कर दिया कि मोदी सरकार ने भी आलोचनाओं की आवाज दबाने के लिए बल प्रयोग की तरकीब का इस्तेमाल किया है.

शाह पर झूठे आरोप
भाजपा नेता ने कहा कि इस तरह के आरोप बेबुनियाद हैं. उन्होंने नोटबंदी के दौरान चलन से बाहर किए गए भारी मात्रा में नोट गुजरात के एक सहकारी बैंक में जमा होने के बारे में खबरें प्रकाशित होने का जिक्र किया. दरअसल, भाजपा अध्यक्ष अमित शाह इस बैंक के निदेशक हैं. उन्होंने कहा कि उनकी पार्टी स्वतंत्र प्रेस की समर्थक है.

मोदी सालों संगठित अभियान के रहे पीड़ित
बीजेपी के सीनियर नेता एवं केंद्रीय कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पिछले कई बरसों से सर्वाधिक संगठित अभियान के पीड़ित रहे हैं. प्रसाद ने इस मांग का समर्थन किया कि पाठ्यपुस्तकों में आपातकाल पर एक अध्याय शामिल करना चाहिए.

न्यायाधीशों की वरिष्ठता क्रम की अनदेखी की थी
विरोधी दल को निशाना बनाने के लिए न्यायाधीश लोया की मौत के मामले को कांग्रेस प्रमुख राहुल गांधी द्वारा उठाए जाने का भी उन्होंने जिक्र किया. केंद्रीय मंत्री ने पूछा, ”वे महाभियोग प्रस्ताव क्यों लाए? उन्होंने न्यायपालिका को एक संदेश भेजने की कोशिश की.” उन्होंने इस बात का जिक्र किया कि कांग्रेस की सरकार ने तो अपनी पसंद का एक प्रधान न्यायाधीश नियुक्त करने के लिए उच्चतम न्यायालय के कई न्यायाधीशों की वरिष्ठता क्रम की अनदेखी कर दी थी.