UP Election 2027: क्या यूपी में तीसरा मोर्चा बिगाड़ेगा BJP-SP का सियासी खेल? पहली बार चुनावी मैदान में उतर सकती हैं 5 राज्यों की 12 पार्टियां
उत्तर प्रदेश की 403 विधानसभा सीटों का चुनाव सिर्फ राज्य की सत्ता तय नहीं करेगा, बल्कि 2029 के लोकसभा चुनाव की दिशा भी काफी हद तक तय करेगा. इसलिए BJP, समाजवादी पार्टी, BSP और उभरते क्षेत्रीय दल सभी अपने-अपने सामाजिक समीकरण साधने में जुटे हैं.
यूपी में अगले साल मार्च से अप्रैल के बीच में विधानसभा के चुनाव होने हैं. (ANI और AI जेनरेटेड)
- UP में लोकसभा की 80 और विधानसभा की 403 सीटें
- 2022 के चुनाव में 273 सीटों के साथ बनी NDA सरकार
- अखिलेश की समाजवादी पार्टी को मिली थी 111 सीटें
- चुनाव में OBC, दलित, मुस्लिम और सवर्ण वोट बैंक अहम
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 की तैयारियां तेज हो गई हैं. भारतीय जनता पार्टी (BJP) और समाजवादी पार्टी के बीच सीधी लड़ाई की चर्चा के बीच अब राज्य की राजनीति में एक नया समीकरण बनता दिखाई दे रहा है. न्यूज एजेंसी PTI की रिपोर्ट के मुताबिक, ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM), आजाद समाज पार्टी (ASP) और अपना दल (कमेरावादी) जैसे दल मुस्लिम और दलित वोटों को एक मंच पर लाने की कोशिश में जुटे हैं. अगर यह प्रयोग सफल होता है, तो इसका असर सीधे BJP और समाजवादी पार्टी दोनों के चुनावी गणित पर पड़ सकता है.
रिपोर्ट के मुताबिक, 2027 के यूपी विधानसभा चुनाव में 5 राज्यों की 12 क्षेत्रीय पार्टियां थर्ड फ्रंट के तौर पर चुनावी मैदान में उतरने की तैयारी कर रही हैं. इनमें बिहार की जनता दल यूनाइटेड (JDU), लोक जनशक्ति पार्टी (LJP), राष्ट्रीय जनता दल (RJD), विकासशील इंसान पार्टी शामिल हैं. झारखंड से झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM), दिल्ली से आम आदमी पार्टी(AAP), महाराष्ट्र से शिवसेना (UBT), NCP (शरद पवार गुट) और दक्षिण भारत के राज्य तेलंगाना से ओवैसी की पार्टी AIMIM यूपी के चुनाव में अपने कैंडिडेट उतार सकती हैं. वहीं, लेफ्ट फ्रंट से भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI), भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी), CPI-ML यूपी में अपनी किस्मत आजमाना चाहती हैं.
मुस्लिम-दलित गठजोड़ की कोशिश
हैदराबाद से सांसद असदुद्दीन ओवैसी की AIMIM लंबे समय से उत्तर प्रदेश में अपनी राजनीतिक जमीन तलाश रही है. पार्टी का मानना है कि मुस्लिम वोटों को सिर्फ रणनीतिक वोटिंग तक सीमित नहीं रहना चाहिए. उन्हें अपनी स्वतंत्र राजनीतिक ताकत भी बनानी चाहिए. इसी सोच के साथ ओवैसी लगातार पश्चिमी यूपी, अवध और पूर्वांचल में जनसभाएं कर रहे हैं. वो विपक्षी दलों के साथ गठबंधन के संकेत भी दे चुके हैं.
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दूसरी ओर, नगीना से सांसद चंद्रशेखर आजाद की आजाद समाज पार्टी दलित राजनीति में अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश कर रही है. बहुजन समाज पार्टी (BSP) के कमजोर होने के बाद दलित वोटों में नई राजनीतिक संभावनाएं पैदा हुई हैं, जिन्हें ASP अपने पक्ष में लाना चाहती है.
BSP की कमजोरी ने खोला नया रास्ता
एक समय उत्तर प्रदेश की राजनीति पर राज करने वाली BSP पिछले कुछ चुनावों में लगातार कमजोर हुई है. 2022 विधानसभा चुनाव और 2024 लोकसभा चुनाव में पार्टी का प्रदर्शन उम्मीद से काफी खराब रहा. यही वजह है कि दलित राजनीति में खाली होती जगह को भरने के लिए कई छोटे दल सक्रिय हो गए हैं. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यही कारण है कि ASP, AIMIM और अन्य क्षेत्रीय दल नए सामाजिक गठजोड़ बनाने की कोशिश कर रहे हैं.
अपना दल (कमेरावादी) की भूमिका
कृष्णा पटेल के नेतृत्व वाला अपना दल (कमेरावादी) भी पिछड़े वर्गों और किसानों के बीच अपनी पकड़ बढ़ाने की कोशिश कर रहा है. अगर ये पार्टी AIMIM और ASP जैसे दलों के साथ चुनावी तालमेल बनाती है, तो पिछड़ा, दलित और मुस्लिम वोटों का एक नया सामाजिक समीकरण तैयार हो सकता है. हालांकि, यह गठबंधन कितना प्रभावी होगा, इसका जवाब चुनावी मैदान में ही मिलेगा.
BJP की रणनीति क्या है?
BJP 2027 के चुनाव में गैर-यादव पिछड़े वर्ग, गैर-जाटव दलित, महिलाओं और लाभार्थी वर्ग पर सबसे ज्यादा फोकस कर रही है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में पार्टी अपने संगठन को बूथ स्तर तक मजबूत करने में लगी है. BJP का मानना है कि विपक्ष चाहे जितने गठबंधन बना ले, लेकिन अगर उसका पारंपरिक वोट बैंक मजबूत रहा तो सत्ता में वापसी संभव है.
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समाजवादी पार्टी की सबसे बड़ी चुनौती
समाजवादी पार्टी 2024 लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के साथ गठबंधन के जरिए अच्छा प्रदर्शन कर चुकी है. अब पार्टी 2027 में अपने PDA (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फॉर्मूले के जरिए सामाजिक आधार को और मजबूत करना चाहती है. अगर मुस्लिम वोट AIMIM की ओर खिसकते हैं. दलित वोट ASP या अन्य दलों में बंटते हैं, तो इसका सीधा नुकसान समाजवादी पार्टी को हो सकता है. यही वजह है कि ओवैसी लगातार विपक्षी एकता की बात भी कर रहे हैं.
किन सीटों पर दिख सकता है असर?
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश, रोहिलखंड, पूर्वांचल और कुछ शहरी इलाकों की ऐसी सीटें हैं, जहां मुस्लिम और दलित मतदाता मिलकर चुनावी नतीजे बदल सकते हैं. खासकर वे सीटें जहां मुस्लिम आबादी 25 से 40 प्रतिशत के बीच है और दलित वोट भी निर्णायक भूमिका निभाते हैं. अगर नया गठबंधन इन इलाकों में प्रभावी उम्मीदवार उतारता है, तो मुकाबला त्रिकोणीय हो सकता है.
क्या बनेगा तीसरा मोर्चा?
फिलहाल AIMIM, ASP और अन्य छोटे दलों के बीच किसी औपचारिक गठबंधन की घोषणा नहीं हुई है. राजनीतिक गतिविधियां यह संकेत जरूर दे रही हैं कि BJP और SP के बीच एक वैकल्पिक राजनीतिक ध्रुव बनाने की कोशिश चल रही है. सवाल यह भी है कि क्या ये दल चुनाव से पहले किसी बड़े विपक्षी गठबंधन में शामिल होंगे या अलग लड़कर अपनी ताकत दिखाएंगे.
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