
Gaurav Barar
गौरव बरार (Gaurav Barar) इंडिया.कॉम में बतौर चीफ सब एडिटर न्यूज डेस्क पर अपनी सेवा दे रहे हैं. उनकी नेशनल, पॉलिटिकल, इंटरनेशनल की खबरों पर अच्छी पकड़ और समझ है. ... और पढ़ें
UP BJP President: उत्तर प्रदेश बीजेपी में संगठनात्मक बदलाव की प्रक्रिया अब अंतिम चरण में पहुंचती दिखाई दे रही है. राज्य के जिलाध्यक्षों का चुनाव पूरा हो चुका है और अब संकेत मिल रहे हैं कि प्रदेश अध्यक्ष का चुनाव भी जल्द ही संपन्न हो सकता है. पार्टी सूत्रों के अनुसार, आने वाले दिनों में उत्तर प्रदेश बीजेपी को नया अध्यक्ष मिल जाएगा.
यह चुनाव लगभग एक वर्ष से लंबित है और इसके पूरा होने के बाद ही राष्ट्रीय अध्यक्ष के चुनाव की प्रक्रिया शुरू की जाएगी. चूंकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी वाराणसी से सांसद हैं, इसलिए वे प्रदेश अध्यक्ष चुने जाने के बाद ही राष्ट्रीय परिषद के सदस्य के तौर पर नामित होंगे और उसके बाद नए राष्ट्रीय अध्यक्ष के नामांकन पर हस्ताक्षर कर सकेंगे. सूत्रों का कहना है कि केंद्र से मंजूरी मिलते ही प्रदेश अध्यक्ष के चुनाव के लिए अधिकतम तीन दिनों की प्रक्रिया अपनाई जाएगी.
हालांकि यह चुनाव केवल संगठनात्मक औपचारिकता नहीं, बल्कि आने वाले दो बड़े चुनाव, 2026 के पंचायत चुनाव और 2027 के विधानसभा चुनाव के लिए सामाजिक और क्षेत्रीय समीकरणों को साधने की रणनीति भी है. पिछले लोकसभा चुनाव में खराब प्रदर्शन के बाद मौजूदा प्रदेश अध्यक्ष भूपेंद्र सिंह ने इस्तीफे की पेशकश की थी, जिसपर अब तक निर्णय लंबित था.
अगले अध्यक्ष के लिए ब्राह्मण, ओबीसी (विशेषकर लोध) और दलित समुदाय के नेताओं पर विचार किया जा रहा है. संभावित उम्मीदवारों में छह नाम प्रमुख माने जा रहे हैं. ब्राह्मण वर्ग से पूर्व उपमुख्यमंत्री और राज्यसभा सांसद दिनेश शर्मा का नाम सबसे आगे बताया जा रहा है, जिन्हें संगठन और सरकार दोनों का अनुभव है. ब्राह्मण चेहरे के रूप में हरीश द्विवेदी भी दावेदारी में हैं, जिन्हें संगठनात्मक अनुभव माना जाता है.
ओबीसी वर्ग से धर्मपाल सिंह और बी.एल. वर्मा प्रमुख नाम माने जा रहे हैं. दोनों लोध समुदाय से आते हैं और गैर-यादव ओबीसी वोट बैंक पर प्रभाव रखते हैं. दलित नेताओं में रामशंकर कठेरिया और एमएलसी विद्या सागर सोनकर पर चर्चा है, जो अपने-अपने क्षेत्रों में मजबूत पकड़ रखते हैं.
अगर ब्राह्मण और ओबीसी फॉर्मूले पर सहमति नहीं बन पाती, तो पार्टी “सरप्राइज” के तौर पर दलित अध्यक्ष भी चुन सकती है. यह निर्णय समाजवादी पार्टी के PDA नैरेटिव की काट के रूप में भी देखा जा सकता है.
बीजेपी के भीतर यह माना जा रहा है कि गैर-यादव ओबीसी- जैसे कुर्मी, लोध, निषाद, कुशवाहा और मौर्य पार्टी की कोर ताकत हैं और सपा का PDA नैरेटिव इन्हीं वर्गों को साधने की कोशिश कर रहा है. ऐसे में ओबीसी अध्यक्ष बनाना 2017-2022 वाले सामाजिक गठबंधन को मजबूत रखने का संदेश होगा.
दूसरी ओर, पिछले कुछ वर्षों में “ब्राह्मण नाराजगी” की चर्चा भी समय-समय पर उठती रही है. इसलिए ब्राह्मण अध्यक्ष चुनना परंपरागत सवर्ण वोटरों को संगठन में सम्मानजनक हिस्सेदारी देने का संकेत माना जा सकता है. वहीं दलित अध्यक्ष बनाने की स्थिति में पार्टी बसपा के पारंपरिक आधार में सेंध लगाने की रणनीति अपना सकती है.
सूत्रों के अनुसार, प्रदेश अध्यक्ष चुने जाने के बाद संगठन और सरकार दोनों में बदलाव संभावित हैं. पासी और कुर्मी समुदाय सहित कई जातीय समूह, जिन्होंने पिछले लोकसभा चुनाव में BJP से दूरी बनाई थी, उन्हें प्रतिनिधित्व देने की संभावना जताई जा रही है. विभिन्न क्षेत्रों- अवध, प्रतापगढ़-प्रयागराज, अम्बेडकरनगर, ब्रज और काशी में भी नए समीकरणों के अनुसार प्रतिनिधित्व बढ़ाया जा सकता है.
2024 के लोकसभा चुनाव में सपा ने व्यापक सोशल इंजीनियरिंग अपनाई थी, जिससे उसे कई क्षेत्रों में लाभ मिला. ऐसे में बीजेपी 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले ओबीसी विशेषकर कुर्मी, लोध और निषाद समुदाय को संगठन और कैबिनेट विस्तार के माध्यम से मजबूत संदेश देना चाहती है. यह अंतिम कैबिनेट विस्तार होगा, इसलिए पार्टी इसे सामाजिक संतुलन बनाने का बड़ा अवसर मानकर देख रही है.
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