Opinion: पर्ची-खर्ची से मेरिट तक... यूपी में कैसे बदली सरकारी भर्ती की तस्वीर? अखिलेश यादव vs सीएम योगी का फर्क समझिए

Written By: India.com Hindi News Desk Updated by: Gargi Santosh
Updated Date:August 17, 2026 9:43 PM IST

UP में सरकारी नौकरी की भर्ती व्यवस्था कैसे बदली? जानिए अखिलेश सरकार के दौर की भर्ती प्रक्रिया और योगी सरकार के मेरिट, डिजिटल निगरानी व पारदर्शिता वाले मॉडल में क्या अंतर है.

हरिशंकर मिश्र । किसी भी सरकार की पारदर्शिता और प्रशासनिक शुचिता को परखने का सबसे सीधा पैमाना उसकी भर्ती व्यवस्था होती है. सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि परीक्षा कौन पास करता है, बल्कि यह है कि क्या एक गरीब किसान के बेटे और किसी प्रभावशाली नेता के बेटे को एक ही परीक्षा में समान अवसर मिलता है? क्या अंतिम चयन में सिफारिश, पहचान और पैसे से ऊपर योग्यता खड़ी होती है? उत्तर प्रदेश की भर्ती व्यवस्था को 2012-17 के अखिलेश यादव सरकार के दौर और 2017 के बाद योगी आदित्यनाथ सरकार के कार्यकाल के संदर्भ में देखें तो दोनों दौर की नीतियों और प्रक्रियाओं में बड़ा अंतर दिखाई देता है. इसी बदलाव को साक्षात्कार व्यवस्था, परीक्षा सुरक्षा, डिजिटल निगरानी और भर्ती प्रक्रिया में पारदर्शिता जैसे कदमों के जरिए समझा जा सकता है.

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पर्ची-खर्ची के आरोपों से घिरी भर्ती व्यवस्था

अखिलेश यादव सरकार के कार्यकाल में भर्ती प्रक्रिया को लेकर सबसे बड़ा सवाल सिफारिश और इंटरव्यू के जरिए मेरिट प्रभावित होने को लेकर उठता रहा. समूह 'ग' और 'घ' जैसे पदों में भी साक्षात्कार के अंकों का चयन पर असर पड़ता था. आरोप रहा कि लिखित परीक्षा में अच्छे अंक हासिल करने वाले अभ्यर्थी इंटरव्यू के नंबरों के कारण पीछे हो जाते थे, जिससे चयन प्रक्रिया की निष्पक्षता पर सवाल खड़े हुए.

UPPSC विवाद ने बढ़ाई युवाओं की नाराजगी

उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर करीब एक दशक पहले कई विवाद सामने आए. त्रिस्तरीय आरक्षण नीति, प्रश्नपत्र लीक और OMR शीट में कथित हेराफेरी जैसे मुद्दों को लेकर प्रतियोगी छात्रों ने बड़े स्तर पर आंदोलन किए. कई भर्तियां अदालतों और जांच एजेंसियों की प्रक्रिया में उलझीं, जिनमें 72,825 प्रशिक्षु शिक्षक भर्ती और पुलिस भर्ती जैसे मामले भी शामिल रहे. इसका सीधा असर उन लाखों अभ्यर्थियों पर पड़ा, जिन्हें लंबे समय तक परिणाम और नियुक्ति का इंतजार करना पड़ा.

योगी सरकार ने बदला भर्ती का फॉर्मूला

2017 के बाद योगी आदित्यनाथ सरकार ने भर्ती प्रक्रिया में बिना भेदभाव, बिना सिफारिश और योग्यता को आधार बनाने पर जोर दिया. सबसे अहम बदलाव समूह 'ग' और 'घ' के पदों से साक्षात्कार व्यवस्था को हटाना रहा. इसके बाद इन पदों पर चयन में लिखित परीक्षा के अंकों की भूमिका बढ़ी और सरकार ने इसे सिफारिश तथा मनमानी की गुंजाइश कम करने वाले कदम के तौर पर पेश किया.

परीक्षा केंद्रों पर तकनीक का पहरा

भर्ती प्रक्रिया को ज्यादा पारदर्शी बनाने के लिए बायोमीट्रिक सत्यापन, परीक्षा केंद्रों पर CCTV निगरानी, प्रश्नपत्रों की डिजिटल कोडिंग और OMR शीट की कंप्यूटरीकृत स्कैनिंग जैसे उपाय लागू किए गए. इन तकनीकी व्यवस्थाओं का उद्देश्य नकल, फर्जी अभ्यर्थियों और सॉल्वर गैंग जैसी गड़बड़ियों पर रोक लगाना है. पेपर लीक और अनुचित साधनों के मामलों में कड़ी कानूनी कार्रवाई के लिए उत्तर प्रदेश सार्वजनिक परीक्षा (अनुचित साधनों का निवारण) कानून का भी इस्तेमाल किया गया.

प्रमोशन और ट्रांसफर में भी डिजिटल सिस्टम

सिर्फ भर्ती ही नहीं, बल्कि नियुक्ति के बाद प्रमोशन और ट्रांसफर की प्रक्रिया को भी डिजिटल बनाने पर जोर दिया गया. मानव संपदा पोर्टल के जरिए कर्मचारियों से जुड़ी जानकारी और सेवा संबंधी प्रक्रियाओं को ऑनलाइन किया गया. सरकार का दावा है कि इससे सिफारिश की गुंजाइश कम हुई और कर्मचारियों के प्रदर्शन तथा रिकॉर्ड के आधार पर फैसले लेने की व्यवस्था मजबूत हुई.

लाखों नियुक्तियों का दावा

सरकार के मुताबिक पिछले वर्षों में पुलिस, बेसिक और माध्यमिक शिक्षा, चिकित्सा एवं स्वास्थ्य तथा अन्य अधीनस्थ सेवाओं में बड़ी संख्या में युवाओं को नियुक्तियां दी गईं. सरकार इन नियुक्तियों को पारदर्शी और मेरिट आधारित भर्ती व्यवस्था का उदाहरण बताती है. हालांकि भर्ती व्यवस्था को पूरी तरह त्रुटिरहित बनाना अभी भी एक सतत प्रक्रिया है और समय-समय पर सामने आने वाली गड़बड़ियां इस व्यवस्था को लगातार मजबूत करने की जरूरत बताती हैं.

असली कसौटी है युवाओं का भरोसा

उत्तर प्रदेश की भर्ती व्यवस्था में हुए बदलाव की असली परीक्षा इस बात से होगी कि एक सामान्य अभ्यर्थी को बिना सिफारिश और आर्थिक प्रभाव के अपनी योग्यता के आधार पर आगे बढ़ने का कितना भरोसा मिलता है. इंटरव्यू हटाने से लेकर डिजिटल निगरानी और नकल विरोधी कानून तक उठाए गए कदम प्रशासनिक सुधार का हिस्सा हैं. आखिरकार किसी भी भर्ती व्यवस्था की सफलता सिर्फ नियुक्तियों की संख्या से नहीं, बल्कि निष्पक्षता, पारदर्शिता और समान अवसर पर युवाओं के भरोसे से तय होती है.

(हरिशंकर मिश्र वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक हैं. उन्हें राजनीतिक विषयों पर लिखना पसंद है.)

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