Opinion: उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 में सत्ता में वापसी के सपने देख रही सपा, पश्चिम UP में कैसे सधेंगे समीकरण? गुर्जर समाज को नहीं भरोसा

Written By: Arun Kumar Updated by: Arun Kumar
Updated Date:July 4, 2026 7:16 AM IST

उत्तर प्रदेश में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनावों की तैयारियां होने लगी हैं. सत्ता में वापसी का सपना संजोए समाजवादी पार्टी को प्रदेश के पश्चिमी हिस्से से भी आस है. इस हिस्से में गुर्जर फैक्टर भी महत्वपूर्ण है तो क्या सपा उनका भरोसा जीत पाई है?

भावेष पांडेय. 

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उत्तर प्रदेश में 2027 विधानसभा चुनाव की तैयारी शुरू हो चुकी हैं. सभी राजनीतिक दल जातीय और क्षेत्रीय समीकरण साधने में जुट गए हैं. यूपी की राजनीति में अक्सर यादव, जाट, दलित और मुस्लिम वोट बैंक की चर्चा होती है. इसके बावजूद पश्चिमी उत्तर प्रदेश का एक ऐसा समुदाय है, जिस पर अपेक्षाकृत कम बात होती है, जबकि दर्जनों सीटों पर उसकी निर्णायक भूमिका रहती है. यह समुदाय है- गुर्जर समाज.

मेरठ, बागपत, गाजियाबाद, गौतमबुद्ध नगर, बुलंदशहर, हापुड़, मुजफ्फरनगर, शामली, सहारनपुर और बिजनौर जैसे जिलों में गुर्जर मतदाता कई विधानसभा सीटों पर चुनावी नतीजों को प्रभावित करने की स्थिति में रहते हैं. ऐसे में 2027 से पहले सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर गुर्जर समाज इस बार किसके साथ जाएगा?

अभी सपा पर नहीं है गुर्जरों को भरोसा

अगर पिछले एक दशक के चुनावी रुझानों को देखें तो एक बात साफ नजर आती है कि गुर्जर समाज का बड़ा हिस्सा भाजपा के साथ बना रहा है. वहीं समाजवादी पार्टी लगातार कोशिशों के बावजूद इस समाज का पूरा भरोसा हासिल नहीं कर सकी है. आखिर इसकी वजह क्या है? इसका जवाब केवल चुनावी गणित में नहीं, बल्कि राजनीतिक धारणा, सामाजिक मनोविज्ञान और क्षेत्रीय परिस्थितियों में छिपा है.

सपा की सबसे बड़ी चुनौती उसकी छवि

समाजवादी पार्टी की पहचान लंबे समय तक मुस्लिम-यादव (MY) गठजोड़ वाली पार्टी के रूप में रही है. इस रणनीति ने पार्टी को सत्ता भी दिलाई, लेकिन इसी के साथ पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कई गैर-यादव पिछड़े वर्गों में यह धारणा भी बनी कि पार्टी का नेतृत्व और संगठन मुख्य रूप से यादव नेताओं के इर्द-गिर्द केंद्रित है. राजनीति में कई बार धारणा, वास्तविकता से ज्यादा असर डालती है. यही वजह है कि पश्चिमी यूपी में गुर्जर समाज कभी भी समाजवादी पार्टी के साथ पूरी तरह सहज नहीं दिखा.

2013 के बाद बदला पूरा राजनीतिक समीकरण

अगर किसी एक घटना ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति को सबसे ज्यादा बदला तो वह 2013 के मुजफ्फरनगर दंगे थे. दंगों के बाद जाटों के साथ बड़ी संख्या में गुर्जर मतदाता भी भाजपा की ओर चले गए. गुर्जर समाज के एक बड़े वर्ग में यह धारणा मजबूत हुई कि समाजवादी पार्टी की राजनीति में मुस्लिम और यादव समीकरण को प्राथमिकता दी जाती है. पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जहां कई सीटों पर मुस्लिम आबादी निर्णायक है, वहां यह सोच और गहरी होती गई. यही कारण रहा कि 2014 का लोकसभा चुनाव हों, 2017 और 2022 का विधानसभा चुनाव या फिर 2019 का लोकसभा चुनाव. गुर्जर समाज का बड़ा हिस्सा भाजपा के साथ खड़ा दिखाई दिया.

भाजपा ने सिर्फ वोट नहीं, प्रतिनिधित्व भी दिया

भाजपा ने केवल वैचारिक राजनीति नहीं की, बल्कि प्रतिनिधित्व की राजनीति भी की. पश्चिमी उत्तर प्रदेश में गुर्जर नेताओं को संगठन और सरकार में जगह दी गई. स्थानीय नेतृत्व को मजबूत किया गया और समुदाय को सत्ता की साझेदारी का संदेश देने की कोशिश हुई. बाद में राष्ट्रीय लोकदल (RLD) के एनडीए में आने से भाजपा का सामाजिक आधार और मजबूत हुआ. आरएलडी के साथ जुड़े कई प्रभावशाली गुर्जर चेहरे भी सत्ता पक्ष का हिस्सा बन गए, जिससे भाजपा का भरोसा और गहरा हुआ.

सपा ने कोशिश की, लेकिन काफी देर से

समाजवादी पार्टी को भी यह अहसास हुआ कि केवल मुस्लिम-यादव समीकरण के भरोसे पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भाजपा को चुनौती देना आसान नहीं होगा. इसी वजह से पिछले कुछ समय में अखिलेश यादव ने गुर्जर समाज पर विशेष फोकस बढ़ाया. राजकुमार भाटी जैसे नेताओं को आगे किया गया, गुर्जर चौपालों का आयोजन हुआ, सम्राट मिहिर भोज के सम्मान को राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बनाया गया और संगठन में भी गुर्जर नेताओं को जगह देने की कोशिश हुई. अब सवाल यह है कि क्या केवल कुछ नए चेहरे आगे कर देने से वर्षों पुरानी धारणा बदल जाएगी?

छवि बदलना सबसे मुश्किल काम

राजनीति में केवल टिकट देना या मंच साझा करना काफी नहीं होता. समुदाय यह भी देखता है कि पार्टी कठिन समय में उसके साथ खड़ी होती है या नहीं. हाल के महीनों में समाजवादी पार्टी के कुछ नेताओं के बयान भी विवादों में रहे. राजकुमार भाटी के कुछ बयानों को लेकर गुर्जर समाज के एक वर्ग में नाराजगी देखने को मिली. वहीं सूर्या चौहान हत्याकांड जैसे मामलों में भी सपा मुखरता नहीं दिखा सकी. इन घटनाओं ने पहले से बनी धारणाओं को और मजबूत किया.

2027 में असली परीक्षा

2027 का चुनाव समाजवादी पार्टी के लिए केवल सत्ता में वापसी की लड़ाई नहीं होगा, बल्कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भरोसा जीतने की भी परीक्षा होगा. अगर सपा वास्तव में भाजपा को चुनौती देना चाहती है तो उसे केवल मुस्लिम-यादव समीकरण से आगे बढ़कर गुर्जर, जाट, सैनी, कश्यप, लोध, कुर्मी और दूसरे गैर-यादव पिछड़े वर्गों के बीच स्थायी भरोसा बनाना होगा. फिलहाल तस्वीर यही बताती है कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भाजपा को गुर्जर समाज का जो भरोसा पिछले एक दशक में मिला है, उसे तोड़ना समाजवादी पार्टी के लिए आसान नहीं होगा.

(लेखक इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ में अधिवक्ता हैं. सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों पर लेखन करते हैं.)

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