Crude Oil Price Hike: मध्य पूर्व में धधकती जंग की लपटों ने अब पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था को अपनी चपेट में लेना शुरू कर दिया है. अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच बढ़ते सैन्य टकराव ने वैश्विक स्तर पर ऑयल शॉक की स्थिति पैदा कर दी है. कच्चे तेल की कीमतें आसमान छू रही हैं, जिससे साल 2022 के बाद पहली बार क्रूड ऑयल 100 डॉलर प्रति बैरल के स्तर को पार कर गया है.
यह उछाल न केवल विकसित देशों बल्कि विकासशील अर्थव्यवस्थाओं के लिए भी एक बड़ा खतरा बनकर उभरा है. सोमवार, 9 मार्च 2026 को बाजार खुलते ही कच्चे तेल की कीमतों में जो सुनामी आई, उसने निवेशकों और सरकारों के होश उड़ा दिए.
कच्चे तेल की कीमतों में ऐतिहासिक उछाल
बेंट क्रूड में लगभग 25% की भारी बढ़त देखी गई और यह 115 डॉलर प्रति बैरल के पार निकल गया. WTI क्रूड की कीमतों में भी 24% का उछाल आया और यह 112 डॉलर के स्तर को पार कर गया. मर्बन क्रूड 18% की तेजी के साथ 120 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गया है.
दिलचस्प बात यह है कि जून 2022 के बाद यह पहला मौका है जब तेल की कीमतें इस स्तर पर पहुंची हैं. प्राकृतिक गैस की कीमतों में भी 8% की वृद्धि दर्ज की गई है, जिससे ऊर्जा संकट गहरा गया है.
युद्ध के कारण सप्लाई चेन तबाह
तेल की कीमतों में इस आग के पीछे मुख्य कारण युद्ध के चलते सप्लाई चेन का पूरी तरह ध्वस्त होना है. युद्ध के दौरान तेल रिफाइनरियों को सीधा निशाना बनाया जा रहा है, जिससे उत्पादन ठप है.
होर्मुज जलडमरूमध्य की नाकाबंदी
दुनिया के कुल तेल व्यापार का लगभग 20% हिस्सा इसी समुद्री मार्ग से गुजरता है. ईरान द्वारा इस रूट पर पाबंदी लगाने से तेल की आवाजाही ठप हो गई है. कुवैत और कतर जैसे बड़े तेल उत्पादकों ने सप्लाई रोकने की चेतावनी दी है, जिससे बाजार में घबराहट का माहौल है.
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पाकिस्तान और बांग्लादेश में हाहाकार
कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों का सबसे भयावह असर भारत के पड़ोसी देशों पर दिख रहा है. पाकिस्तान में ईंधन की कीमतें रिकॉर्ड स्तर पर हैं. पेट्रोल 336 PKR और डीजल 321 PKR प्रति लीटर तक पहुंच चुका है. जनता महंगाई की दोहरी मार झेल रही है.
बांग्लादेश में हालात इतने बिगड़ चुके हैं कि सरकार को राशनिंग सिस्टम लागू करना पड़ा है. अब नागरिकों को तय मात्रा में ही तेल मिल पा रहा है, ताकि स्टॉक को लंबे समय तक चलाया जा सके.
भारत के लिए भी चिंता की बात
हालांकि भारत सरकार ने पर्याप्त तेल भंडार होने का दावा किया है, लेकिन लंबी खिंचती जंग भारत की मुश्किल बढ़ा सकती है. भारत अपनी तेल जरूरतों का लगभग 85% आयात करता है. यदि कच्चा तेल 110-120 डॉलर के स्तर पर बना रहता है, तो भारत का इंपोर्ट बिल बढ़ जाएगा, जिससे राजकोषीय घाटा बढ़ेगा.
रुपये पर दबाव
डॉलर की बढ़ती मांग से भारतीय रुपया कमजोर हो सकता है, जिससे हर आयातित वस्तु महंगी हो जाएगी. वर्तमान भू-राजनीतिक परिस्थितियां एक बड़े वैश्विक आर्थिक संकट की ओर इशारा कर रही हैं. यदि कूटनीतिक रास्तों से इस युद्ध को तुरंत नहीं रोका गया, तो 150 डॉलर प्रति बैरल का स्तर भी दूर नहीं लगता, जो दुनिया को गहरी मंदी में धकेल सकता है.
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