नई दिल्ली: चंबल का नाम आने पर जंगल, बीहड़, डकैत ही ज़ेहन में आते हैं. डकैतों के गिरोह ख़त्म हो गए हैं लेकिन तस्वीर नहीं बदली है. बदहाली है. गरीबी है. बेरोजगारी है और अशिक्षा के साथ ही कई ऐसी दिक्कतें हैं जो बीहड़ की जड़ों में जैसे समा गई हैं. सरकारों ने कोशिश की या नहीं की, विकास की रौशनी बीहड़ के दूरदराज गाँवों में आज भी नहीं पहुंची है. डकैत नहीं हैं, लेकिन आज भी डकैतों के साथ ही बदहाली की कहानियां बीहड़ की हवाओं में हैं और लोगों की जुबान पर भी. एक्टिविस्ट शाह आलम की नई किताब ‘बीहड़ में साइकिल’ (Beehad Me Cycle) इन्हीं कहानियों को उबड़ खाबड़ रास्तों से निकाल कर देश और दुनिया के बीच तक पहुंचाने में कामयाब होती है. शाह आलम ने 29 मार्च, 2016 से 23 जून, 2016 तक चंबल के इलाकों में लगभग 2,800 किमी यात्रा साइकिल से की थी. ये किताब यात्रा के दौरान ही डायरी की तरह लिखी गई है. Also Read - बागियों की धरती रहा जो चंबल, अब वहां हो रहा अंतर्राष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल, कुछ ऐसा रहा है इतिहास

डकैतों और इनसे प्रभावित लोगों की सिहरन पैदा करने वाली कथाएं
कुछ दिनों पहले ही लॉन्च हुई ‘बीहड़ में साइकिल’ (Beehad Me Cycle) किताब की चर्चा हो रही है. चम्बल के इतिहास का शायद ये पहला मौका है जब किसी ने चम्बल के हर पहलू को छुआ है. शाह आलम (Shah Alam) ने इस किताब को डायरी की तरह दर्ज किया, जिसमें उन्होंने हर दिन अपनी यात्रा में जो देखा सुना और महसूस किया, उसे लिखा है. लम्बे समय से चम्बल में सक्रिय शाह आलम ने न सिर्फ बीहड़ से निकले क्रांतिकारियों को जिन्हें भुला दिया गया, को खोजा बल्कि चम्बल की पहली डकैत पुतली बाई, फूलन देवी से लेकर कई डकैतों और इनसे प्रभावित लोगों की सिहरन पैदा करने वाली कथाएं दर्ज की हैं. Also Read - ग्वालियर-चंबल में बंदूक का लाइसेंस चाहिए तो लगाने होंगे दस पौधे, डीएम को दिखानी होंगी Selfie

गुमनाम योद्धाओं के खोज की भी दिलचस्प गाथा
शाह आलम (Shah Alam) कहते हैं कि उन्होंने तीन महीने तक इस अजूबी दुनिया में यात्रा की और बीहड़ के दर्द को नजदीक से समझा. किताब में इसमें आजादी आंदोलन के गुमनाम योद्धाओं के खोज की भी दिलचस्प गाथा है. देश के सबसे बड़े गुप्त क्रांतिकारी दल मातृवेदी के दस्तावेजीकरण के बहाने चंबल के अनछुए पहलुओं से मुठभेड़ दिखती है. बीहड़ में साइकिल किताब चंबल घाटी के विभिन्न पहलुओं को परत दर परत वाकिफ कराने के साथ बदलाव की भी वकालत करती है. चंबल इलाके में प्रचलित पिछड़ेपन, क्षेत्र में मारे गए लोगों के परिवारों की बुरी स्थिति, मैला ढोने जैसी कुप्रथाओं की निरंतरता और समस्याओं का मुकाबला करने में उनकी भूमिका पर प्रकाश डाला है. किताब चंबल घाटी के इतिहास और भूगोल को बाहर निकालने में कामयाब दिखती है. Also Read - कभी चंबल का खूंंखार डकैत रहा मलखान सिंह अब धौरहरा से लड़ रहा है इस पार्टी से चुनाव

अब डकैतों नहीं, इस संग्रहालय के लिए जाना जाएगा चंबल, मिलेंगी ऐसी किताबें जिसके हर पन्ने पर है सोना

कौन हैं शाह आलम?

शाह आलम इटावा में चंबल संग्राहलय (Chambal Museum) को बनाने में अहम भूमिका निभा चुके हैं. शाह आलम ने अवध विश्वविद्यालय, फैजाबाद और जामिया सेन्ट्रल यूनिवर्सिटी, नई दिल्ली से पढ़ाई की. डेढ़ दशक से घुमंतू पत्रकारिता का चर्चित नाम हैं. भारतीय क्रांतिकारी आंदोलन के जानकार हैं. 2006 में ‘अवाम का सिनेमा’ की नींव रखी. देश में 17 केन्द्र हैं, जहां कला के विभिन्न माध्यमों को समेटे एक दिन से लेकर हफ्ते भर तक आयोजन अक्सर चलते रहते हैं. ‘अवाम का सिनेमा’ के जरिये वे नई पीढ़ी को क्रांतिकारियों की विरासत के बारे में बताते हैं. शाह आलम का नाम चम्बल में 2800 किमी से अधिक दूरी साइकिल से तय करके बीहड़, डकैतों और मातृवेदी क्रांतिकारियों के गहन शोध के लिए जाना जाता है. साइकिल से चम्बल की यात्रा काफी चर्चित रही थी. दर्जनों दस्तावेजी फिल्मों का निर्माण करने वाले शाह की इसी साल ‘मातृवेदी-बागियों की अमरगाथा’ पुस्तक भी प्रकाशित हो चुकी है.