यूपी के गोरखपुर में हुए लोकसभा उपचुनाव में बीजेपी हार की कगार पर पहुंच गई है. समाजवादी पार्टी के प्रत्याशी ने लगभग 26 हजार वोटों से बढ़त बना ली है. राउंड-दर-राउंड सपा जीत के नजदीक पहुंच रही है. ऐसे में 29 साल बाद ऐसी स्थिति बन रही है, जब गोरखपुर का सांसद गोरक्षपीठ का महंत (मठाधीश) नहीं होगा. Also Read - बिहार में सीएम योगी ने कहा- JNU में अब 'भारत तेरे टुकड़े होंगे' के नारे नहीं लग सकते हैं

साल 1989 में गोरक्षपीठ के महंत अवैद्यनाथ ने हिंदू महासभा के टिकट पर गोरखपुर से लोकसभा का चुनाव लड़ा था. उन्होंने कांग्रेस के कब्जे वाली इस सीट पर बड़े अंतर से जीत हासिल की थी. इसके बाद साल 1991 के लोकसभा चुनाव में वह बीजेपी से संसद पहुंचे. उनकी जीत का सिलसिला यहीं नहीं रूका और उन्होंने साल 1996 में भी जीत हासिल की. Also Read - जय श्रीराम की हुंकार से बिहार में हुई योगी आदित्यनाथ की रैली की शुरुआत, विपक्ष पर बोला हमला

1998 में पहली बार सांसद बने थे योगी
अवैद्यनाथ के निधन के बाद योगी आदित्यनाथ मठ के साथ-साथ उनके राजनैतिक उत्तराधिकारी के रूप में सामने आए. साल 1998 के उपचुनाव में योगी आदित्यनाथ पहली बार संसद पहुंचे. उन्होंने साल 1999, 2004, 2009 और 2014 के लोकसभा चुनाव में भी इस सीट पर विजयी पताका फहराया. साल 2017 में हुए यूपी विधानसभा में बीजेपी की बड़ी जीत के बाद योगी आदित्यनाथ सीएम बने, जिससे यह सीट खाली हो गई और उपचुनाव हुए. Also Read - आज बिहार में ताबड़तोड़ रैलियां करेंगे योगी आदित्यनाथ, जानें किन जगहों पर किस समय होंगे मौजूद

मठ की वजह से ही बना था बीजेपी का मजबूत किला
ऐसे में स्पष्ट तौर पर दिख रहा है कि 1989 से लेकर अबतक गोरखपुर की राजनीति में गोरक्षपीठ मठ का ही दबदबा रहा है. लेकिन यह पहला मौका है कि यह सीट मठ के कब्जे से बाहर जा रही है. उपचुनाव के जो आंकड़े आ रहे हैं उससे सपा उम्मीदवार की जीत निश्चित दिख रही है. मठ की वजह से ही यह बीजेपी का एक मजबूत किला बन गया था. लेकिन मठ से सीधे तौर पर नहीं जुड़े रहने वाले प्रत्याशी के सामने आते ही बीजेपी का ये गढ़ धाराशाही हो गया. इससे साफ तौर पर गोरखपुर की राजनीति में मठ की महत्वत्ता को देखा जा सकता है.

टिकट बंटवारे के समय उठे थे सवाल
हालांकि, टिकट बंटवारे के समय में ही इस बात की चर्चा थी की सीएम योगी मठ से ही जुड़े व्यक्ति को टिकट दिलाना चाहते हैं. कहा जा रहा था कि इसके लिए उन्होंने प्रयास भी की थी. लेकिन बीजेपी नेतृत्व ने उपेंद्र शुक्ला पर दांव खेला, जो सही साबित होता नहीं दिख रहा है. वहीं, योगी आदित्यनाथ की प्रतिष्ठा भी दांव पर लग गई है.

2019 चुनाव पर पड़ सकता है असर
अगले साल 2019 में आम चुनाव होने हैं. ये रिजल्ट बीजेपी के लिए चिंता का विषय बन सकती है. इसका सबसे बड़ा कारण है कि गोरखपुर को ही केंद्र बनाकर बीजेपी पूर्वांचल की दूसरी सीटों पर भी चुनाव लड़ती और अच्छे परिणाम लाती रही है. साल 2014 के चुनाव में 71 सीटों पर बीजेपी की जीत के पीछे भी इस मजबूत किले ने बड़ा रोल निभाया था. लेकिन उपचुनाव के परिणाम कुछ और ही संकेत देते नजर आ रहे हैं.