उत्तर प्रदेश को आखिरकार बुधवार को नया लोकायुक्त मिल गया। सर्वोच्च न्यायालय ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश, न्यायमूर्ति वीरेंद्र सिंह को उत्तर प्रदेश का नया लोकायुक्त नियुक्त किया है। सर्वोच्च न्यायालय ने, लोकायुक्त नियुक्ति में संवैधानिक प्राधिकार के विफल रहने पर अपनी नाराजगी भी जताई। न्यायमूर्ति रंजन गोगोई व न्यायमूर्ति एन.वी. रमन की सर्वोच्च न्यायालय की पीठ ने न्यायालय के आदेश का पालन न कर पाने के लिए ‘संवैधानिक प्राधिकार की विफलता’ पर गहरा खेद व्यक्त किया। न्यायालय ने कहा कि वह उत्तर प्रदेश सरकार की तरफ से पेश हुए वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल द्वारा लोकायुक्त की नियुक्ति न कर पाने के पक्ष में दिए गए स्पष्टीकरण से ‘नाखुश’ है। यह भी पढ़ें: सीबीआई के छापे को लेकर अन्ना हजारें ने केजरीवाल पर साधा निशानाAlso Read - शादी का झांसा देकर दरोगा ने किया विधवा का बलात्कार, 2019 से बना रहा था यौन संबंध; अब पुलिस ने...

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सिब्बल ने न्यायालय में कहा कि मुख्यमंत्री, नेता प्रतिपक्ष और उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के कॉलेजियम ने लोकायुक्त का नाम तय करने के लिए गंभीर प्रयास किए। लेकिन नए लोकायुक्त पर आम सहमति नहीं बन पाई। इसके बाद सर्वोच्च न्यायालय ने अपने विशेषाधिकार का प्रयोग करते हुए बुधवार को राज्य का नया लोकायुक्त नियुक्त कर दिया। यह पहला मौका है जब सर्वोच्च न्यायालय ने किसी राज्य का लोकायुक्त नियुक्त किया है। Also Read - सपा के शासन में जाली टोपी वाले गुंडे व्यापारियों को धमकाते थे, UP Dy CM केशव मौर्य

सिब्बल ने इससे पहले न्यायालय को बताया कि मंगलवार को लोकायुक्त की नियुक्ति पर निर्णय के लिए मुख्यमंत्री अखिलेश यादव, नेता विरोधी दल स्वामी प्रसाद मौर्या और इलाहाबाद उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति डी. वाई. चंद्रचूड़ की सदस्यता वाले कॉलेजियम की मुख्यमंत्री आवास पर बैठक हुई और इसके बाद बुधवार सुबह भी दो घंटे बैठक हुई। सिब्बल ने अदालत को पांच नाम दिए थे। मुख्यमंत्री और नेता प्रतिपक्ष के बीच पांच में से तीन नामों पर आम सहमति बनी थी, जबकि इलाहाबाद उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश ने कोई भी राय व्यक्त नहीं की। उप्र में लोकायुक्त की नियुक्ति कई दिनों से लटकी हुई थी। सर्वोच्च न्यायालय ने जल्द से जल्द लोकायुक्त की नियुक्ति करने के लिए सरकार को कड़े निर्देश भी दिए थे।