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आज सुबह चमोली, पिथौरागढ़ और नैनीताल जिले के कई इलाकों में हल्की बारिश हुई।  जिससे तापमान में गिरावट के साथ-साथ जंगलों में पिछले करीब तीन माह से लगी आग को भी ठंडी करने में मदद मिली। उत्तराखंड मौसम विभाग के अनुसार  बुधवार सुबह नैनीताल में रिमझिम बारिश होती रही। चमोली स्थित वेदनी बुग्याल सहित ऊंचाई वाले इलाकों में बारिश होने से करीब दो माह बाद आसमान में छाई धुंध साफ हुई है।

90 दिनों से जंगल की आग बरपा रही थी कहर-

पिछले तीन महीने में उत्तराखंड के दोनों मंडलों कुमाऊँ और गढ़वाल में आग की करीब 600 घटनाएँ हुई, इसमें 1143 हेक्टेयर जंगल जलकर राख हो गए। कुमाऊं में आग की 130 घटनाओं में 271 एकड़ वन प्रदेश और गढ़वाल में 608 एकड़ वन प्रदेश आग की चपेट में आ चुके हैं। इसके अलावा जानवरों के लिए संरक्षित 262 हेक्टेयर जंगल भी आग की चपेट में है। माना जा रहा था कि ये आग 15 जून तक रह सकती है। इस सूरत में तबाही का दायरा और बढ़ सकता था। यह भी पढ़ें: उत्तर भारत के इन राज्यों में कहर बरपा रही है गर्मी, जानिये कैसा रहेगा आज मौसम

अचानक हुई बारिश सभी के लिए एक बड़ी राहत लेकर आई। बद्रीनाथ धाम में मौसम सुहावना हो गया है। बारिश होने से देहरादून के चकराता वन प्रभाग के कोरूवा बीट के जंगल में बीते आठ दिन से भड़की आग अब ठंडी पड़ने लगी है।

वन्य जीवों के लिए भी जीवन दान –

आग की वजह से केदार, जिम कार्बेट और राजाजी नेशनल पार्क में भी असर देखा जा रहा है। जिम कार्बेट नेशनल पार्क का 198 एकड़ इलाका आग की चपेट में आ चुका है। राजाजी के 70 और केदारनाथ का 60 एकड़ इलाके पर आग ने असर डाला है। अफसरों के मुताबिक, आग बढ़ने की वजह से वन्य प्राणी रिहायशी इलाकों की तरफ जा रहे हैं। कार्बेट में 215 से ज्यादा बाघ हैं, जो आग की वजह से उ.प्र. की सीमा की तरफ जा सकते हैं। इससे इनके अवैध शिकार की संभावनाएँ भी बढ़ सकती हैं। वन्य जीवों के लिए यह बारिश एक जीवन दान की तरह है।

वन विभाग ने खड़े कर दिए थे हाथ –

उत्तराखंड के जंगलों की आग के सामने वन विभाग ने हाथ खड़े कर दिए थे। विभाग की ओर से किए जा रहे उपाय नाकाफी साबित हो रहे थे। उत्तराखंड के मुख्य वन्य संरक्षक बी.पी. गुप्ता मीडिया में बजट की दुहाई देते रहे। रिपोर्ट्स में उन्होंने कहा कि आग बुझाने के लिए तकरीबन एक हजार सीजनल कर्मचारियों की जरूरत होती है। लेकिन विभाग को जो बजट आवंटित किया गया है उसमें सिर्फ 200 कर्मचारी ही रखे जा सकते हैं।

उत्तराखंड की बारिश ने राहत भले दी हो लेकिन 90 दिनों से लगी आग का प्रकोप सरकार और प्रशासन की लापरवाही साबित करने के लिए काफी है।