नैनीताल: उत्तराखंड हाई कोर्ट ने सरकारी उपक्रम उत्तराखंड विद्युत निगम लिमिटेड (यूपीसीएल) को अपने महाप्रबंधक पर लाखों रुपए का बकाया होने के बावजूद उनसे बिजली के बिल के रूप में हर माह नाममात्र शुल्क लेने को लेकर फटकार लगाई है. मुख्य न्यायाधीश रमेश रंगनाथन और न्यायमूर्ति आलोक कुमार की खंडपीठ ने कल एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए यूपीसीएल से इस मामले पर एक सप्ताह के अंदर स्पष्टीकरण देने को भी कहा है.

इससे पहले, अदालत को बताया गया कि महाप्रबंधक पर पिछले 25 माह से बिजली उपभोग के रूप में निगम के 4.02 लाख रूपए बकाया हैं लेकिन उनसे बिजली के बिल के रूप में हर माह केवल 425 रुपए का शुल्क लिया जा रहा है. इस मामले में नाराजगी जाहिर करते हुए हाई कोर्ट ने कहा कि यूपीसीएल के अधिकारी जानबूझकर अस्पष्ट आंकडे़ दिखाकर बिजली का दुरुपयोग कर रहे हैं. जनहित याचिका में यह भी आरोप लगाया गया है कि यूपीसीएल अपने कर्मचारियों और उनके परिवारों को सेवानिवृत्ति के बाद भी यह सुविधा दे रही है.

याचिका में कहा गया है कि यूपीसीएल के महाप्रबंधक और कर्मचारी जहां बिजली के बिल के रूप में नाममात्र का शुल्क दे रहे हैं, वहीं आम आदमी को पहले 100 यूनिट तक 2.75 प्रति यूनिट की दर से और उसके बाद 5.65 प्रति यूनिट की दर से बिजली के बिल का भुगतान करना पड़ता है. अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि न्यायाधीशों को भी सालभर में 15,000 यूनिट बिजली खर्च करने की सुविधा मिलती है जबकि यूपीसीएल में उनके कर्मचारियों के लिए बिजली उपयोग की कोई सीमा नहीं है. पीठ ने कहा कि नाममात्र के शुल्क का भुगतान भी विवादित है.

हाई कोर्ट ने यूपीसीएल से इस पर भी अपना रुख स्पष्ट करने को कहा है कि ऐसी सुविधाएं निगम के अधिकारियों के अलावा उसके उत्पादन और वितरण विभागों को भी क्यों उपलब्ध कराई जा रही हैं. यूपीसीएल को यह भी निर्देश दिया गया है कि वह अपने कर्मचारियों द्वारा यूनिट या राशि के रूप में बिजली उपभोग की सीमा निर्धारित किए जाने की व्यावहारिकता का भी परीक्षण करे.