'वंदे मातरम' पर फिर बवाल! क्या वाकई हटाए गए थे इसके कुछ हिस्से? जानें इतिहास से लेकर ताजा विवाद तक सबकुछ

Vande Mataram Controversy: वंदे मातरम को लेकर एक बार फिर विवाद छिड़ गया है. गीत के 150 साल पूरे होने पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोमवार (8 दिसंबर) को लोकसभा में इस पर चर्चा की शुरुआत की. दरअसल, वंदे मातरम को लेकर लंबे समय से सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच विवाद चल रहा है.

Published date india.com Updated: December 9, 2025 3:41 PM IST
'वंदे मातरम' पर फिर बवाल! क्या वाकई हटाए गए थे इसके कुछ हिस्से? जानें इतिहास से लेकर ताजा विवाद तक सबकुछ

Vande Mataram Controversy: वंदे मातरम एक ऐसा गीत जिसने आजादी की लड़ाई में करोड़ों भारतीयों के दिलों में जोश भरा, आज फिर विवादों के केंद्र में है. 150 साल पूरे होने के मौके पर जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लोकसभा में इसकी चर्चा शुरू की, तो पुराना राजनीतिक टकराव फिर से सामने आ गया. कई तरह के सवाल उठने लगे. क्या सच में इसके कुछ हिस्से हटाए गए थे? किस पंक्ति को लेकर ऐतराज हुआ? और आखिर ये विवाद बार-बार क्यों भड़कता है? इतिहास, राजनीति और भावनाओं के इस संगम में वंदे मातरम का सफर एक बार फिर सुर्खियों में है. चलिए आपको बताते हैं इसके इतिहास से लेकर ताजा विवाद तक सबकुछ.

Highlights

  • वंदे मातरम ने आजादी की लड़ाई में करोड़ों भारतीयों के दिलों में जोश भरा
  • 150 साल पूरे होने पर जब PM मोदी ने संसद में इस पर चर्चा की, तो टकराव देखने को मिला
  • इसे लेकर कई तरह के सवाल उठने लगे कि क्या सच में इसके कुछ हिस्से हटाए गए थे?

पीएम मोदी ने कहा, ‘जब वंदे मातरम के 50 साल हुए तब देश गुलामी में जीने के लिए मजबूर था. जब इसके 100 साल हुए देश आपातकाल की जंजीरों में जकड़ा हुआ था. तब भारत के संविधान का गला घोंट दिया गया था. ये गीत ऐसे समय पर लिखा गया जब 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के बाद अंग्रेज सल्तनत बौखलाई हुई थी. भारत पर भांति-भांति का दबाव था, भांति-भांति के जुल्म कर रही थी और भारत के लोगों को अंग्रेजों की तरफ से मजबूर किया जा रहा था.’

कैसे बना राष्ट्रगान?

डेढ़ सौ साल पहले, बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने ‘वंदे मातरम’ नाम की एक कविता लिखी थी, जिसका अनुवाद है ‘मां, मैं तुम्हें नमन करता हूं’. ये पहली बार 7 नवंबर, 1875 को साहित्यिक पत्रिका बंगदर्शन में पब्लिश हुई थी. बाद में, इसे रवींद्रनाथ टैगोर ने संगीतबद्ध किया और ये राष्ट्र की सभ्यतागत, राजनीतिक और सांस्कृतिक चेतना का अभिन्न अंग बन गया. सालों बाद, 1937 में, कांग्रेस ने वंदे मातरम के एक संशोधित संस्करण को देश के राष्ट्रगीत के रूप में अपनाया और 1951 में राजेंद्र प्रसाद की अपील पर संविधान सभा ने इसे राष्ट्रगीत के रूप में अपनाया, जबकि जन गण मन को राष्ट्रगान घोषित किया गया.

अब, इतने साल बीत जाने के बाद, सोमवार (8 दिसंबर) को संसद में इस गीत पर एक स्पेशल सेशन आयोजित किया गया. यहां प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लोकसभा में सरकार की ओर से पक्ष रखे, जबकि गृह मंत्री अमित शाह ने मंगलवार यानी आज उच्च सदन, यानी राज्यसभा में इस मुद्दे पर चर्चा की. हालांकि, सालों पहले लिखा गया ये गीत संसद में चर्चा का विषय क्यों बन गया है?

क्यों हो रहा इस पर विवाद

वंदे मातरम के 150 साल पूरे होने के उपलक्ष्य में, संसद ने लोकसभा के साथ-साथ राज्यसभा में भी इस राष्ट्रगीत पर चर्चा के लिए समय निर्धारित किया. संसद के निचले सदन, लोकसभा ने इस विषय पर 10 घंटे की चर्चा की, जिसकी शुरुआत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने की थी. अपने भाषण में, मोदी ने कांग्रेस पर सामाजिक समरसता की आड़ में इस गीत को तोड़ने का आरोप लगाया और कहा कि वह अभी भी तुष्टिकरण की राजनीति कर रही है.

उन्होंने जवाहरलाल नेहरू की तरफ से सुभाष चंद्र बोस को लिखे एक पत्र का हवाला दिया, जिसमें दावा किया गया था कि वंदे मातरम की पृष्ठभूमि मुसलमानों को नाराज कर सकती है. उन्होंने कहा कि यह पत्र लखनऊ में मोहम्मद अली जिन्ना के विरोध प्रदर्शन के बाद लिखा गया था. पत्र का हवाला देते हुए, मोदी ने कहा कि नेहरू ने लिखा था कि उन्होंने इस गीत की पृष्ठभूमि पढ़ी है और इससे मुसलमानों में गुस्सा भड़क सकता है.

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उन्होंने आरोप लगाया, ’26 अक्टूबर को कांग्रेस ने वंदे मातरम पर समझौता किया. उन्होंने सामाजिक सद्भाव की आड़ में इसे टुकड़ों में तोड़ दिया, लेकिन इतिहास गवाह है… यह कांग्रेस की तुष्टिकरण की राजनीति थी. तुष्टिकरण की राजनीति के दबाव में, कांग्रेस वंदे मातरम को विभाजित करने के लिए सहमत हो गई. यही कारण है कि कांग्रेस ने विभाजन की मांग के आगे घुटने टेक दिए.’

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