क्या है V2V टेक्नोलॉजी और यह कैसे काम करेगी? सड़क हादसों पर क्या अब लगेगी लगाम! जानें सबकुछ- Explained
What Is Vehicle-to-Vehicle communication: व्हीकल-टू-व्हीकल सिस्टम एविएशन सेक्टर की टेक्नोलॉजी जैसा ही है, जहां एयरक्राफ्ट अपनी पोजीशन ब्रॉडकास्ट करते हैं और आस-पास के एयरक्राफ्ट और ग्राउंड स्टेशन इसे रिसीव करते हैं.
What Is Vehicle To Vehicle-V2V Technology: दुनिया में सड़क हादसों में सबसे ज्यादा मौतें भारत में होती हैं. सड़क हादसों में होने वाली मौतों को रोकने के लिए सरकार व्हीकल-टू-व्हीकल (V2V) सेफ्टी टेक्नोलॉजी लॉन्च करने की योजना बना रही है. बीते 22 जनवरी को नई दिल्ली में संसदीय सलाहकार समिति की एक बैठक में, केंद्रीय सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने कहा कि दूरसंचार विभाग ने व्हीकल-टू-व्हीकल कम्युनिकेशन सिस्टम के डेवलपमेंट के लिए 30 GHz रेडियो फ्रीक्वेंसी अलॉट की है, जिससे सड़क हादसों को रोकने और मौत के आंकड़ों को कम करने में मदद मिलेगी.
V2V या व्हीकल-टू-व्हीकल कम्युनिकेशन एक वायरलेस टेक्नोलॉजी है जो गाड़ियों को एक-दूसरे से कम्युनिकेट करने या बात करने में मदद करेगी ताकि स्पीड, लोकेशन, एक्सेलरेशन, ब्रेकिंग वगैरह की रियल-टाइम जानकारी शेयर की जा सके. यह व्हीकल-टू-एवरीथिंग (V2X) की सब-कैटेगरी है और इंटेलिजेंट ट्रांसपोर्ट सिस्टम के तहत आती है.
यह सिस्टम एविएशन सेक्टर की टेक्नोलॉजी जैसा ही है, जहां एयरक्राफ्ट अपनी पोजीशन, स्पीड, ऊंचाई ब्रॉडकास्ट करते हैं और आस-पास के एयरक्राफ्ट और ग्राउंड स्टेशन इसे रिसीव करते हैं. यह सिस्टम दुनिया भर में एविएशन सेक्टर में मजबूत है, सड़क सेक्टर अभी भी डेवलप हो रहा है और V2V कुछ देशों में काम कर रहा है.
यह कैसे काम करेगा?
भारत सरकार के सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय (MoRTH) के अधिकारियों के मुताबकि, V2V सिस्टम के लिए, कारों में एक ऑन बोर्ड यूनिट (OBU) इंस्टॉल की जाएगी ताकि आस-पास की गाड़ियां वायरलेस तरीके से एक-दूसरे के साथ जानकारी एक्सचेंज कर सकें. यह ड्राइवर को ब्लैक स्पॉट, रुकावटों, सड़क किनारे खड़ी गाड़ियों, कोहरे या किसी भी संभावित खतरे के बारे में अलर्ट करेगा.
आमतौर पर, V2V सिस्टम की रेंज 300 मीटर होती है और यह इस रेंज में गाड़ियों का पता लगा सकता है. उदाहरण के लिए, अगर कोई कार अचानक ब्रेक लगाती है तो आस-पास की गाड़ियों को उसे देखने से पहले ही धीमा होने का अलर्ट मिल जाएगा. इससे दुर्घटनाओं को कम करने में मदद मिलेगी.
कुल सड़क हादसों में होने वाली मौतों के मामले में भारत दुनिया में पहले स्थान पर है जो दूसरे और तीसरे स्थान पर रहने वाले देशों से कहीं आगे है. चीन में भारत की सड़क दुर्घटनाओं से होने वाली मौतों का सिर्फ 36% और अमेरिका में 25% मौतें होती हैं. MoRTH के सचिव वी उमाशंकर ने कहा कि OBUs की कीमत 5,000 रुपये से 7,000 रुपये होगी और इसे सबसे पहले नई गाड़ियों में लगाया जाएगा.
उन्होंने कहा, कुछ देशों में व्हीकल-टू-व्हीकल कम्युनिकेशन सिस्टम काम कर रहे हैं. इसका रोड सेफ्टी पर बड़ा असर पड़ेगा. कई बार ट्रक और कारें सड़क किनारे पार्क होती हैं और तेज रफ्तार गाड़ियां उनसे टकरा जाती हैं, जिससे जानें जाती हैं. हम ऐसे हादसों को कम कर पाएंगे, क्योंकि OBU अपने आप चेतावनी देगा.
कब शुरू किया जाएगा इसे?
सरकार ने अभी तक इस सिस्टम को शुरू करने की कोई खास तारीख घोषित नहीं की है. हालांकि, यह इस साल के रोड सेफ्टी प्रोग्राम के तहत MoRTH की एक अहम पहल है. MoRTH के सचिव वी उमाशंकर कहा कि मंत्रालय ओरिजिनल इक्विपमेंट मैन्युफैक्चरर्स (OEMs) के साथ मिलकर इसके लिए एक स्टैंडर्ड तैयार कर रहा है और टेलीकॉम डिपार्टमेंट के साथ एक जॉइंट टास्क फोर्स बनाई गई है.
उन्होंने कहा, 'स्टैंडर्ड पर फैसला होने के बाद हम एक नोटिफिकेशन जारी करेंगे. शुरू में, नई गाड़ियों में ये ऑन-बोर्ड यूनिट्स लगानी होंगी. उसके बाद, पुरानी गाड़ियों में भी इसे लगाया जाएगा. नेशनल फ्रीक्वेंसी एलोकेशन प्लान के तहत, टेलीकम्युनिकेशन डिपार्टमेंट मुफ्त स्पेक्ट्रम देगा. इसलिए OEMs इस स्पेक्ट्रम का इस्तेमाल कर पाएंगे और इसे गाड़ी में लगवा पाएंगे. हमारा मकसद इसे इस साल लागू करना है.
क्या हैं चुनौतियां?
V2V सिस्टम सड़क हादसों और ट्रैफिक को बेहतर तरीके से मैनेज करने का एक समाधान देता है. हालांकि, इसमें कुछ सीमाएं और प्राइवेसी की चिंताएं भी हैं. सिस्टम के लिए अलॉट किया गया फ्रीक्वेंसी बैंड सभी गाड़ियों को सपोर्ट नहीं कर सकता है. इसका मतलब है कि अगर जानकारी गलत तरीके से दी जाती है, तो इससे हादसे और मौतें हो सकती हैं.
दूसरी समस्या यह है कि यह गाड़ियों, उनकी लोकेशन, ड्राइवर के बारे में डिटेल्स वगैरह का बहुत सारा डेटा स्टोर करेगा, जिससे पूरे इंटेलिजेंट ट्रांसपोर्ट इंफ्रास्ट्रक्चर के गलत इस्तेमाल का खतरा बढ़ जाता है. इसे लागू करने के लिए निश्चित रूप से सरकारी नियमों और कानूनों की जरूरत होगी. इस सिस्टम के लिए साइबर अटैक भी एक और चिंता का विषय है. अगर कोई हमलावर सिस्टम पर पूरा कंट्रोल कर लेता है तो इसका गलत इस्तेमाल करके एक बड़ा सिक्योरिटी खतरा पैदा किया जा सकता है.
किन-किन देशों में हो रहा V2V का इस्तेमाल?
अमेरिका V2V कम्युनिकेशन सिस्टम रिसर्च और इसे मजबूत नियमों के साथ लागू करने में सबसे आगे है. इसके अलावा, जर्मनी, फ्रांस, यूनाइटेड किंगडम जैसे कुछ यूरोपीय देश नई गाड़ियों और स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट्स में V2V को शामिल कर रहे हैं. Volkswagen Golf 8 और अमेरिका में Cadillac जैसे कार मॉडल V2V टेक सेफ्टी सिस्टम के साथ आते हैं.
चीन भी V2V को अपनाने वाला एक और बड़ा देश है. साथ ही जापान ने ITS कनेक्ट प्रोग्राम लॉन्च किए हैं जो उसके स्मार्ट व्हीकल पहलों का हिस्सा हैं. यह V2V सिस्टम के तहत ड्राइवरों को रियल-टाइम ट्रैफिक सिग्नल डेटा, ब्लाइंड स्पॉट चेतावनी और इमरजेंसी व्हीकल अलर्ट देते हैं. भारत की तरह, UAE, सऊदी अरब, ब्राजील, मैक्सिको जैसे देश भी V2V कम्युनिकेशन सिस्टम को शुरू करने के शुरुआती पायलट स्टेज में हैं.
FAQs
क्या है V2V सेफ्टी टेक्नोलॉजी?
V2V या व्हीकल-टू-व्हीकल कम्युनिकेशन एक वायरलेस टेक्नोलॉजी है जो गाड़ियों को एक-दूसरे से कम्युनिकेट करने या बात करने में मदद करेगी.
V2V टेक्नोलॉजी से कैसे रुकेगा हादसा?
V2V टेक्नोलॉजी के माध्यम से गाड़ियों की स्पीड, लोकेशन की रियल टाइम जानकारी शेयर होगी.
कैसे काम करेगी V2V टेक्नॉलजी?
रियल टाइम डेटा की मदद से यह ड्राइवर को ब्लैक स्पॉट, सड़क किनारे खड़ी गाड़ियों, कोहरे या किसी भी संभावित खतरे के बारे में अलर्ट करेगा.
किन-किन देशों में अभी V2V टेक्नॉलजी का हो रहा इस्तेमाल?
अमेरिका,जर्मनी, फ्रांस, यूनाइटेड किंगडम जैसे कुछ यूरोपीय देश V2V टेक्नोलॉजी का कर रहे हैं इस्तेमाल.
भारत में कब से लागू होगी V2V टेक्नॉलजी?
परिवहन मंत्रालय की योजना इस साल इसे लागू करने की है. सबसे पहले इसे नई गाड़ियों में लगाया जाएगा.
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