सूखे का पर्याय बन चुके बुंदेलखंड में गरीबों, बच्चों और असहाय बुजुर्गो का पेट भरना मुश्किल हो चला है। बिगड़े हालात से लड़ने का बीड़ा उठाया है यहां की महिलाओं ने। ये वे महिलाएं हैं जो पानी के संरक्षण और संवर्धन के लिए अलख जगाती हैं।उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड के ललितपुर जिले के तालबेहट विकासखंड के भदौना गांव की बस्ती में स्थित कुसुम के घर के आंगन का नजारा सुबह और शाम के समय किसी उत्सव का एहसास करा जाता है। यहां एक साथ तीन चूल्हे जल रहे होते हैं, तो दूसरी ओर बुजुर्ग और बच्चे अपने-अपने घर से लाई थाली में खाना खाते नजर आ जाते हैं।इस गांव की बिनिया बाई कांपती जुबान से बताती हैं कि सूखे की मार ने उनकी जिंदगी को संकट में डाल दिया है, खेत सूखे पड़े हैं, काम है नहीं, बच्चे काम को परदेस चले गए हैं। इस स्थिति में उनके लिए पेट की आग बुझाना समस्या हो गई है। यहां कुछ महिलाओं ने मिलकर खाना देना शुरू किया, तो अब उन्हें भूखे पेट नहीं सोना पड़ रहा है।महिलाओं के बीच पानी संरक्षण के काम में लगी जल सहेली ललिता दुबे बताती हैं कि इस गांव के युवा लड़के और बहुएं काम की तलाश में पलायन कर गए हैं। ऐसे में कई घरों मंे बुजुर्ग और बच्चे ही रह गए हैं। इनके सामने खाने का संकट होने का जब उन्हें पता चला तो सबसे पहले उन्होंने हर घर से एक से दो रोटी और अचार व सब्जी जुटाई। इसमें गांव वालों ने सहयोग किया। ये महिलाएं गांव भर से इकट्ठा की गई रोटी, सब्जी व अचार जरूरतमंदों के घर-घर जाकर देने लगीं।यहाँ भी पढ़े:बुंदेलखंड का सूखा भी देखें प्रधानमंत्री : राहुल

उन्होंने आगे बताया कि इस गांव में पानी के संरक्षण के प्रति महिलाओं को जागृत करने के लिए पानी पंचायत बनाई गई। इसकी सदस्य महिलाएं है। सभी ने मिलकर तय किया कि बुजुर्गो, बच्चों और असहाय लोगों को भोजन मुहैया करने हर संभव कोशिश करेंगी। इसके लिए सामाजिक संस्था परमार्थ से आर्थिक मदद मांगी गई। उसके बाद यहां सामुदायिक रसोई शुरू की गई।भदौना गांव में चल रही सामुदायिक रसोई में सब के काम बंटे हुए हैं। पांच महिलाएं जहां दोनों वक्त का खाना पकाती हैं, तो पांच महिलाएं भोजन स्थल की साफ-सफाई व जंगल में जाकर लकड़ी का इंतजाम करती हैं। यहां लगभग 40 लोगों को दोनों वक्त भर पेट खाना मिल रहा है।गांव की बुजुर्ग महिला रामवती बताती हैं कि उनके पति का निधन हो चुका है, उनके पास काम नहीं है, चार बच्चे हैं जिनका भरण पोषण अब तक किसी तरह किया, अब पेट भरने का संकट है। इस रसोई के शुरू होने से उन्हें भर पेट खाना मिल जाता है। वे चाहती हैं कि अगर काम मिल जाए तो अच्छा है।नियमित रूप से भोजन करने आने वाले ²ष्टि बाधित सुशील कुछ समझ नहीं पाता है कि यह सब क्या हो रहा है। उसे कुछ नजर तो नहीं आता, मगर उसका पेट जरूर भर रहा है।

इसी तरह राधाबाई इस बात से खुश हैं कि उन्हंे खाना आसानी से मिल रहा है। अब उन्हें इस बात का डर सता रहा है कि अगर यह रसोई बंद हो गई तो वे क्या करेंगी।बुंदेलखंड की भौगोलिक स्थिति पर गौर करें तो पता चलता है कि यह दो प्रदेशों उत्तर प्रदेश और मध्यप्रदेश के कुल 13 जिलों में फैला हुआ है। उत्तर प्रदेश के सात जिलों- झांसी, जालौन, ललितपुर, हमीरपुर, बांदा, महोबा और चित्रकूट और मध्यप्रदेश के छह जिलों सागर, दमोह, पन्ना, छतरपुर, टीकमगढ़ और दतिया को मिलाकर बुंदेलखंड बनता है।पूरे बुंदेलखंड में कमोबेश एक जैसे हालात हैं। वर्षा कम होने से खेती बुरी तरह चौपट हो चुकी है, जलस्रोत सूख चले हैं, लोग पलायन को मजबूर है, मगर दोनों राज्यों की सरकारों ने अब तक इस दिशा में ऐसी कोई पहल नहीं की है, जिससे यहां के लोगांे को राहत मिल सके।सूखे की त्रासदी से जूझते बुंदेलखंड के लिए सरकारों ने भले ही अब तक किसी तरह की कार्य योजना न बनाई हो, मगर यहां के लोगों ने ही जरूरतमंदों की मदद का बीड़ा उठा लिया है। यही कारण है कि कई हिस्सों में सामुदायिक रसोइयां शुरू हो गई हैं।