ठाकुरनगर (पश्चिम बंगाल): मतुआ समुदाय की कुलदेवी बीणापाणि देवी ‘बोरोमा’ नहीं रहीं. 100 साल की कुलदेवी मानी जानी वाली दलित नेता बोरोमा ने एक दिन पहले मंगलवार को रात 8.52 मिनट पर अंतिम सांस ली थी. आज उनका पार्थिव शरीर 24 परगना जिले में उनके गृहनगर पहुंचाया गया है. यहां उनका अंतिम दर्शन करने के लिए लाखों की संख्या में लोग जमा हैं. उन्हें बदूकों से सलामी देकर राजकीय सम्मान से होगी अंतिम विदाई दी जाएगी. मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने उनके निधन पर शोक प्रकट किया और कहा कि उनका राजकीय सम्मान के साथ अंतिम संस्कार किया जाएगा.

आशीर्वाद लेने पहुंचे थे पीएम मोदी
पिछले माह 2 फरवरी को पश्चिम बंगाल में रैलियां करने पहुंचे पीएम नरेंद्र मोदी दलित समुदाय ‘ऑल इंडिया मतुआ महासंघ’ की कुलदेवी बोरोमा (बीनापाणि देवी) से भी मिलने पहुंचे थे. उन्होंने बोरोमा से पांच मिनट तक मुलाकात की थी. पीएम ने बोरोमा के पैर छूकर आशीर्वाद भी लिया था. मोदी ने समुदाय द्वारा आयोजित जनसभा को संबोधित किया था. महासंघ के महासभापतियों में से एक मंजुल कृष्णा ठाकुर के बेटे शांतनु ठाकुर और अन्य नेताओं ने मतुआ परंपरा के अनुसार प्रधानमंत्री को शॉल, माला और स्मृति चिह्न देकर उनका स्वागत किया था. समुदाय को संबोधित करते हुए मोदी ने ठाकुरनगर की मिट्टी को पवित्र बताया था. इसके बाद उन्होंने मतुआ समुदाय के दिवंगत नेता ठाकुर गुरुचंद और हरिचंद का भी उल्लेख किया. प्रधानमंत्री ने कहा, “मुझे ‘बोरोमा ‘ और हरिचंद ठाकुर के वंशजों के साथ होने पर गर्व है.”

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राज्य के बड़े तबके में प्रभावशाली थीं बोरोमा
बता दें कि बोरोमा को राज्य में एक बड़े तबके में बेहद प्रभावशाली माना जाता था. जहां ठाकुरनगर में वह रहती थीं, वो कस्बा बांग्लादेश की सीमा के निकट है. ठाकुरनगर में मतुआ समुदाय की अच्छी खासी आबादी है. मूल रूप से यह समुदाय पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) से यहां आया था. धार्मिक अत्याचार की वजह से 1950 के दशक में इन लोगों ने यहां पर पनाह ली थी.

बोरोमा का आशीर्वाद मिलना होती थी बड़ी बात
बता दें कि प्रभाव को देखते हुए अक्सर नेता बोरोमा से मिलने पहुंचते थे. कुछ माह पहले पश्चिम बंगाल की सीएम ममता बनर्जी बोरोमा के 100वें जन्मदिन के मौके पर उनसे मिलने पहुंची थीं. बोरोमा का आशीर्वाद मिलना पूरे मतुआ समुदाय का साथ मिलने जैसा होता था. चुनाव में इस इलाके में ये समुदाय हारने और जिताने में अहम भूमिका निभाता है. मतुआ समुदाय मुख्य रूप से बांग्लादेश से आए छोटी जाति के हिंदू शरणार्थी हैं और इन्हें लगभग 70 लाख की जनसंख्या के साथ बंगाल का दूसरा सबसे प्रभावशाली अनुसूचित जनजाति समुदाय माना जाता है. बनगांव लोकसभा क्षेत्र में 50 फीसदी से ज्यादा मतुआ समुदाय के लोग हैं. हालांकि प्रदेश के विभिन्न दक्षिणी जिलों में इस समुदाय की जनसंख्या लगभग एक करोड़ है, जो प्रदेश की कुल 294 विधानसभा सीटों में से कम से कम 74 सीटों पर निर्णायक भूमिका निभाते हैं.