आखिर टूट गया ममता का तृणमूल, 60 विधायकों के गुट को स्पीकर ने माना असली TMC

पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी को बड़ा झटका लगा है. पश्चिम बंगाल विधानसभा स्पीकर रवीन्द्र नाथ बोस ने ऋतब्रत बनर्जी को नेता प्रतिपक्ष की मान्यता दे दी है.

Written by: Anjali Karmakar
Updated: June 3, 2026, 7:05 PM IST

पश्चिम बंगाल का विधानसभा चुनाव हारने के बाद लगता है कि ममता बनर्जी की किस्मत भी रूठ गई है. पहले भतीजे अभिषेक बनर्जी पर अटैक हुआ. अब ममता की TMC में भी फूट पड़ चुकी है. सोमवार को पार्टी से निकाले गए विधायक ऋतब्रत बनर्जी ने दावा किया कि उनके साथ पार्टी के 60 विधायक हैं. इन सभी ने बुधवार को विधानसभा अध्यक्ष रथींद्र बोस से मिलकर ऋतब्रत को विधायक दल का नेता घोषित करने के लिए समर्थन पत्र सौंपा है. स्पीकर ने भी ऋतब्रत के गुट को मान्यता दे दी है.

रिपोर्ट के मुताबिक, जावेद खान, संदीपन साहा और सिउली साहा को उपनेता बनाया गया है. वहीं, अखरुज्जमान को चीफ व्हिप बनाया गया है. हालांकि, बागी गुट ने अपने पत्र में ममता बनर्जी को अब भी पार्टी अध्यक्ष बताया है. इस बगावत के बीच ममता बनर्जी ने बुधवार को राज्य की सभी कमेटियों और फ्रंटल संगठनों को तत्काल प्रभाव से भंग कर दिया है. पार्टी अब पूरे संगठन का पुनर्गठन करेगी.

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पार्टी से क्यों निकाले गए संदीपन साहा और ऋतब्रत बनर्जी?
ममता बनर्जी ने TMC से 2 विधायक संदीपन साहा और ऋतब्रत बनर्जी को पार्टी से निकाल दिया था. दोनों ने स्पीकर से शिकायत की थी कि पार्टी ने शोभनदेव को नेता विपक्ष बनाने वाले प्रस्ताव में उनके उनके फर्जी साइन किए थे. साहा और बनर्जी का आरोप है कि यह शिकायत करने पर ही दोनों TMC से निकाले गए. इसके बाद ही TMC में फूट पड़ने लगी थी. कुल 80 में से 60 विधायक शोभनदेव के खिलाफ थे. उन्होंने ऋतब्रत बनर्जी को अपना नेता बताया था.

कैसे बनी TMC?

  • ममता बनर्जी लंबे समय तक कांग्रेस में रहीं, लेकिन पश्चिम बंगाल में लेफ्ट के खिलाफ कांग्रेस की रणनीति से असंतुष्ट थीं.
  • 1 जनवरी 1998 को ममता बनर्जी ने कांग्रेस से अलग होकर ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस की स्थापना की.
  • पार्टी का मुख्य लक्ष्य पश्चिम बंगाल में 34 साल से सत्ता में मौजूद वाम मोर्चे को चुनौती देना था.
  • शुरुआती दौर में ममता बनर्जी ने BJP के नेतृत्व वाले NDA का साथ दिया और केंद्र सरकार में मंत्री भी बनीं.
  • ग्रामीण इलाकों और महिलाओं के बीच ममता की लोकप्रियता लगातार बढ़ती गई.
  • सिंगूर और नंदीग्राम आंदोलन उनके लिए टर्निंग पॉइंट साबित हुए.
  • भूमि अधिग्रहण के खिलाफ आंदोलनों ने ममता बनर्जी को राज्यव्यापी नेता के रूप में स्थापित कर दिया.
  • फिर 2011 में बंगाल में विधानसभा चुनाव हुए. इसमें TMC ने वाम मोर्चे को हराकर 34 साल पुराना शासन खत्म कर दिया.
  • 20 मई 2011 को ममता बनर्जी ने पश्चिम बंगाल की पहली महिला मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली.
  • आज TMC सिर्फ बंगाल तक सीमित नहीं है. पार्टी ने गोवा, त्रिपुरा और अन्य राज्यों में भी विस्तार की कोशिश की है. ये राष्ट्रीय राजनीति में विपक्षी खेमे की प्रमुख आवाज़ों में शामिल भी शामिल है.

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पार्टी को बचाने के लिए क्या कर रहीं ममता?

  • विधानसभा चुनाव हारने के बाद ममता बनर्जी दो तरह की स्ट्रैटेजी पर काम कर रही हैं. एक तरफ वो मजबूत और जुझारू की इमेज दिखा रही हैं. दूसरी ओर, विपक्षी दलों को भी साथ लेकर चलने पर जोर दे रही हैं.
  • चुनाव में हार के बाद पहली बार किसी CM ने इस्तीफा देने से मना कर दिया. ये ममता का अपने कैडर के लिए ‘मैं नहीं झुकूंगी’ वाला मैसेज था, ताकि वो एकजुट रहे.
  • हाल के समय में अभिषेक बनर्जी समेत TMC के कई नेताओं और कार्यकर्ताओं पर हमले हुए. ममता ने इन मामलों को आक्रामक तरीके से उठाया.
  • लोकसभा चुनाव 2024 के दौरान और विधानसभा चुनाव 2026 से पहले ममता बनर्जी का कॉन्फिडेंस अलग लेवल पर था. वो ‘एकला चलो रे’ की पॉलिसी पर चल रही थीं.
  • विधानसभा चुनाव हारने के बाद ममता बनर्जी ने विपक्षी दलों के गठबंधन INDIA ब्लॉक को फिर से साथ लेकर चलने की बात कर रही हैं.
  • चुनाव हारते ही 5 मई को ममता ने कहा, ‘मेरा टारगेट बहुत क्लियर है. मैं INDIA टीम को मजबूत करूंगी… सोनिया जी, राहुल, अरविंद केजरीवाल, हेमंत सोरेन…सभी ने मुझे फोन किया. सभी INDIA गठबंधन के सहयोगी मेरे साथ हैं.’

क्या सत्ता में दोबारा लौट पाएगी TMC?
इसका जवाब ठीक-ठीक कहा नहीं दिया जा सकता. लेकिन, गुंजाइश बहुत कम है. पश्चिम बंगाल के इतिहास में झांककर देखें, तो ऐसा होता दिख नहीं रहा. 1977 तक बंगाल में कांग्रेस 25 साल शासन में रही. बीच में 1967 से 1972 तक यूनाइटेड फ्रंट भी सत्ता में आई. इसके बाद 34 साल तक लेफ्ट फ्रंट की सरकार चली. 2011 में ममता बनर्जी ने लेफ्ट के शासन पर फुल स्टॉप लगाया. वो 2011 से 2026 तक बंगाल की सत्ता में काबिज रहीं. इसी पैटर्न को फॉलो करें, तो अब BJP भी लंबे समय तक बंगाल में रहेगी.

अब आगे क्या?

  • राजनीतिक जानकार बताते हैं कि TMC के बागी विधायक नेता विपक्ष, चीफ व्हिप जैसे पद तो ले सकते हैं, लेकिन शिवसेना और NCP की तरह पार्टी पर अधिकार अभी नहीं ले पाएंगे.
  • अगर ऐसा होता है, तो बड़े गुट के दावे पर चुनाव आयोग फैसला लेगा. चुनाव आयोग के फैसले को कोर्ट में चुनौती दी जा सकती है.
  • इसके लिए दो-तिहाई यानी 28 में से 19 लोकसभा सांसदों की भी जरूरत भी होगी.

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