बागियों को काउंटर करने के लिए ममता बनर्जी ने चला नया दांव, फिर बदल दी TMC की वर्किंग कमेटी, EC को भेजा प्रस्ताव

Written By: Anjali Karmakar Updated by: Anjali Karmakar
Updated Date:June 23, 2026 7:02 PM IST

यह कदम ऐसे समय उठाया गया है, जब बागी गुट ने कोलकाता में अलग बैठक कर पार्टी के समानांतर संगठन की घोषणा कर दी थी. बागी नेताओं ने ममता बनर्जी को अध्यक्ष पद से हटाने का दावा करते हुए वरिष्ठ विधायक अरूप रॉय को नया अध्यक्ष घोषित कर दिया था.

  • TMC के लोकसभा में 28 और राज्यसभा में 13 सांसद.
  • अलग गुट बनाने के लिए 2/3 का संख्याबल जरूरी.
  • पार्टी बचाने के लिए INDIA ब्लॉक से मांगी मदद.
  • ममता की सबसे बड़ी ताकत TMC का कैडर नेटवर्क.

पश्चिम बंगाल की राजनीति में जारी घमासान के बीच तृणमूल कांग्रेस (TMC) प्रमुख ममता बनर्जी ने पार्टी पर अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए बड़ा कदम उठाया है. पार्टी में सांसदों और विधायकों के एक धड़े की बगावत के बीच TMC ने चुनाव आयोग (EC) को पदाधिकारियों और राष्ट्रीय कार्यसमिति की नई लिस्ट भेजी है. इस लिस्ट में साफ तौर पर बताया गया है कि पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष अब भी ममता बनर्जी ही हैं. एक दिन पहले 22 जून को विधायक ऋतुब्रत बनर्जी की अगुवाई वाले TMC के अलग गुट ने वर्किंग कमेटी का ऐलान किया था. इसमें ममता बनर्जी को हटाकर अरूप रॉय को पार्टी का चेयरमैन बनाया गया था. वहीं, अभिषेक बनर्जी को सभी पदों से सस्पेंड कर दिया गया था.

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न्यूज एजेंसी ANI की रिपोर्ट के मुताबिक, चुनाव आयोग को भेजी गई TMC वर्किंग कमेटी की नई लिस्ट में 20 जून 2026 तक की पार्टी की आधिकारिक संगठनात्मक संरचना दर्ज की गई है. इसके जरिए TMC नेतृत्व ने यह मैसेज देने की कोशिश की है कि पार्टी के भीतर चल रही उठापटक के बावजूद संगठन का आधिकारिक नियंत्रण ममता बनर्जी के हाथों में ही है.

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सुभ्रत बक्शी को उपाध्यक्ष और भतीजे अभिषेक को बनाया महासचिव

नई लिस्ट के मुताबिक, ममता बनर्जी पार्टी की चेयरपर्सन बनी रहेंगी. वहीं, सुभ्रत बक्शी को उपाध्यक्ष और अभिषेक बनर्जी को राष्ट्रीय महासचिव के तौर पर बरकरार रखा गया है. इसके अलावा डेरेक ओ'ब्रायन और डोला सेन को ज्वॉइंट सेक्रेटरी और सुभाशीष चक्रवर्ती को कोषाध्यक्ष (Treasurer) की जिम्मेदारी दी गई है.

बागियों को ममता दीदी का जवाब

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि चुनाव आयोग को नई लिस्ट भेजना सिर्फ प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि पार्टी के भीतर चल रही सत्ता की लड़ाई में ममता बनर्जी का रणनीतिक जवाब है. इसके जरिए TMC नेतृत्व यह साबित करना चाहता है कि पार्टी का आधिकारिक ढांचा और वैधानिक नियंत्रण अभी भी उनके पास है. इससे पहले पार्टी में बढ़ती बगावत के बीच ममता बनर्जी ने TMC के कई पुराने संगठनात्मक ढांचे को भंग कर पुनर्गठन की प्रक्रिया शुरू की थी.

कैसे शुरू हुआ विवाद?

पश्चिम बंगाल विधानसभा में 23 और 29 अप्रैल को दो फेज में वोटिंग हुई. नतीजे 4 मई को आए. 208 सीटों के साथ BJP ने पहली बार सरकार बनाई. ममता बनर्जी की TMC को इस बार मात्र 80 सीटें मिलीं. चुनाव नतीजे आने के 15 दिन के अंदर TMC में अंदरूनी कलह और असंतोष सामने आने लगा. विवाद की शुरुआत विधानसभा में विपक्ष के नेता (LoP) के चयन से जुड़े कथित फर्जी साइन मामले से हुई थी. बागी विधायक ऋतब्रत बनर्जी और संदीपन साहा ने आरोप लगाया था कि कुछ विधायकों के साइन का गलत इस्तेमाल किया गया. इसके बाद मामला पुलिस और CID जांच तक पहुंच गया. इन आरोपों के बाद TMC नेतृत्व ने ऋतब्रत बनर्जी और संदीपन साहा पर पार्टी विरोधी गतिविधियों का आरोप लगाते हुए उन्हें पार्टी से निष्कासित कर दिया. हालांकि, यह कदम बगावत को रोकने के बजाय और बड़ा राजनीतिक संकट बन गया.

ऋतब्रत बनर्जी ने बनाया अलग गुट और किया असली TMC होने का दावा

निष्कासन के बाद ऋतब्रत बनर्जी ने दावा किया कि उन्हें पार्टी के बड़ी संख्या में विधायकों का समर्थन हासिल है. बागी गुट ने विधानसभा अध्यक्ष के सामने अलग विधायी समूह के रूप में अपनी दावेदारी पेश की और ऋतब्रत बनर्जी को विपक्ष का नेता बनाने का प्रस्ताव रखा. बाद में उन्हें विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष के रूप में मान्यता भी मिल गई.

TMC के भविष्य को लेकर बढ़ी चिंता

हाल के दिनों में कई सांसदों, विधायकों और नेताओं के बागी तेवरों ने पार्टी नेतृत्व की चिंता बढ़ा दी थी. अब चुनाव आयोग को नई लिस्ट भेजकर ममता बनर्जी ने यह स्पष्ट संकेत दिया है कि पार्टी नेतृत्व किसी भी कीमत पर संगठन पर अपनी पकड़ ढीली नहीं पड़ने देना चाहता. हालांकि, बागी गुट भी पीछे हटने को तैयार नहीं है. ऐसे में आने वाले दिनों में यह लड़ाई केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि कानूनी और संगठनात्मक स्तर पर भी और तेज हो सकती है.

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