भारत में तीन तलाक पर काफी अर्से से चल रही बहस एक अहम मुकाम पर आ गई है. सुप्रीम कोर्ट ने जजों की बैंच ने बहुमत के फैसले से एक साथ तीन तलाक को असंवैधानिक करार दिया है. कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि केंद्र सरकार 6 महीने के अंदर संसद में इसको लेकर कानून बनाए. सुप्रीम कोर्ट में मुख्य न्यायधीश जे.एस. खेहर के नेतृत्व में 5 जजों की पीठ ने अपना फैसला सुनाया. कोर्ट में तीन जज तीन तलाक को अंसवैधानिक घोषित करने के पक्ष में थे, वहीं 2 दो जज इसके पक्ष में नहीं थे. खेहर के अलावा जस्टिस कुरियन जोसफ, आरएफ नरीमन, यूयू ललित और अब्‍दुल नजीर भी इस बैंच में शामिल थे. ये तो रहा इस मामले का न्यायिक पक्ष, लेकिन सोशल मीडिया और न्यूज़ चैनलों पर भी इस मामले में जमकर चर्चा हो रही है.

तीन तलाक़ एक शरिया नियम है जो मर्दों को तीन बार तलाक़ कहने से शादी ख़त्म करने का अधिकार देता है. बहुत से लोग तीन तलाक को एक कुप्रथा मानते हैं और इसपर बैन लगाने की मांग करते हैं, वहीं कई लोग ऐसे भी हैं जो क़ुरान का हवाला देकर इसे जायज़ ठहराते हैं. इस बहस में मुसलमानों के साथ-साथ दूसरे महज़बों के लोग भी जमकर हिस्सा लेते हैं. हालांकि अभी तक कई लोगों को ये बात साफ नहीं है कि असल में क़ुरान तीन तलाक पर क्या कहता है?

दरअसल, इस बहस का एक अहम हिस्सा ‘तीन तलाक बनाम इंस्टैंट तीन तलाक’ है. ये दोनों तलाक की दो अलग-अलग प्रक्रियाएं हैं. इनको समझने के लिए पहले ये समझते हैं कि क़ुरान में किस प्रक्रिया वाले तीन तलाक की बात की गई है.

कुरान में तीन तलाक की प्रक्रिया

क़ुरान के मुताबिक, जब पति-पत्नी के अलग होने की नौबत आ जाए तो, अल्लाह ने क़ुरान में उनके करीबी रिश्तेदारों या फिर उनका भला चाहने वालों को यह हिदायत दी है कि वो आगे बढ़ कर मामले सुलझाए और उनका रिश्ता सुधारें. लेकिन, अगर इससे बात नहीं बनती तो पति अपनी तलाक दिया जाता है. इसके लिए पत्नी के मासिकधर्म (पीरियड्स) के आने और उसके खत्म होने का इंतजार किया जाता है. इसके खत्म होने के बाद कम से कम गवाहों के सामने पति पत्नी को एक तलाक दे. उसे बस एक बार कहना है कि ‘मैं तुम्हे तलाक देता हूं’. इसके बाद पत्नी तीन महीने तक अपने ससुराल या पति के साथ रह सकती है. इस दौरान उसका सारा खर्च पति को उठाना होगा.

अगर पत्नी प्रेगनेंट है तो बच्चा होने तक वो साथ रह सकती है. ऐसी प्रक्रिया इस वजह से है ताकि पती अपनी पत्नी को दिए तलाक के फैसले के बारे में सोच सके. वो इन तीन महीनों के वक्त में सुलह करके तलाक वापस ले सके. इसके लिए जिन गवाहों के सामने तलाक दिया था, उन्हीं के सामने कहना होगा कि हमने फैसला बदल लिया है. कुरान के मुताबिक ऐसा, सिर्फ दो बार ही किया जा सकता है. लेकिन देखा गया है कि इस प्रक्रिया का पालन न करके कई बार मुस्लिम पुरूष एक बार में तीन तलाक दे देते हैं. वो कुरान में बताए गए वक्त को ध्यान में नहीं रखते। इसी को एक बार में तीन तलाक या इंस्टैंट तीन तलाक का नाम दिया गया है.

इंस्टैंट तलाक न कुरान में है न शरियत में, फिर भी देश के मुसलमान इस तरीके से तलाक दे रहे हैं.

दुनिया के कई इस्लामिक देशों में बैन है तीन तलाक

मिस्र वो पहला देश है जिसने तीन तलाक खत्म करने की ऐतिहासिक घोषणा की थी. इस देश में 1929 में कानून-25 के जरिए घोषणा की गई कि तलाक को तीन बार कहने पर भी उसे एक ही माना जाएगा और इसे वापस लिया जा सकता है. मिस्र ने 1929 में इस विचार को कानूनी मान्यता दी थी. लेकिन इस कानून में एक बात जो गौर करने वाली है वो ये हैं कि लगातार तीन तूहरा (जब बीवी का मासिक चक्र न चल रहा हो) के दौरान तलाक कहने से तलाक अंतिम माना जाएगा.

वहीं, बहुत से मुस्लिम बहुल देशों में सीधे या अप्रत्यक्ष तौर पर तीन तलाक की प्रथा को खत्म किया जा चुका है. इन देशों में पाकिस्तान, बांग्लादेश, ईरान, तुर्की, ट्यूनीशिया, अल्जीरिया और मलेशिया जैसे देश शामिल हैं. अब ये प्रथा अब सिर्फ भारत और दुनियाभर के सिर्फ सुन्नी मुसलमानों में बची हुई हैं.

तीन तलाक पर क्या कहती है मुसलमानों से जुड़ी देश की पांच संस्थाएं

ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड – लगातार तीन तलाक बोलने के खिलाफ हम हैं. ये गुनाह है और इसके लिए प्रचार भी करते हैं. लेकिन क़ुरान में तीन तलाक का जो सही तरीका बताया गया है उसे माना जाएगा.

ऑल इंडिया शिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड – वैसे तो शियाओं में तीन तलाक का नियम नहीं है लेकिन सुन्नियों में अगर है तो हम उसकी इज्जत करते हैं. साथ ही इस पर भी बात होनी चाहिए कि कौन लोग इसका गलत फायदा उठा रहे हैं.

बरेली मदरसा – कुरान में तीन तलाक का तरीका बताया गया है. उसी को सभी लोग अपनाते भी हैं. मोबाइल, इंटरनेट और चिट्ठी से भी तलाक देने का एक तरीका है, उसी तरीके को सही माना गया है.

नदवा मदरसा – तीन तलाक का जिक्र कुरान और हदीस दोनों से ही साबित है. वैसे तलाक को बहुत गलत बताया गया है, जो लोग इस बारे में बोल रहे हैं उन्हें पूरी जानकारी नहीं.

देवबंद मदरसा – कुरान में तीन तलाक का साफ तौर पर जिक्र हुआ है लेकिन लगातार तीन तलाक बोलने से परहेज करना चाहिए. अगर कोई तैश में आकर या फिर जाने अनजाने एक साथ  तीन तलाक बोल देता है तो वो माना जाएगा.

तीन तलाक को खत्म करने की कोशिशें

देश में तीन तलाक की प्रथा को खत्म करने के लिए लंबे वक्त से कोशिशें चल रही हैं. मुस्लिम समाज का पढ़ा-लिखा तबका, एक्टिविस्ट और धर्मगुरु लंबे समय से चली आ रही तीन तलाक की प्रथा खत्म करने के लिए कुछ नहीं किया जा रहा. यहां की अदालतों में भी इस प्रथा को खत्म करने के लिए फैसले सुनाए हैं. साल 2008 में दिल्ली हाईकोर्ट के जज बदर दुरेज अहमद ने कहा था कि भारत में तीन तलाक को एक तलाक (जो वापस लिया जा सकता है) समझा जाना चाहिए.

इसी तरह से गुवाहाटी हाईकोर्ट ने जियाउद्दीन बनाम अनवरा बेगम मामले में कहा था कि तलाक के लिए पर्याप्त आधार होने चाहिए और सुलह की कोशिशों के बाद ही तलाक होना चाहिए. 2016 में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने भी तीन तलाक पर बड़ा फैसला सुनाया था और इसे मुस्लिम महिलाओं के खिलाफ क्रूरता बताया था. वहीं मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने इस फैसले के खिलाफ नाराजगी जताते हुए इसे शरियत के खिलाफ बताया था. भारत में बड़ी संख्या में मुस्लिम महिलाएं तीन तलाक को खत्म करने के पक्ष में थीं.