मिसाइल और ड्रोन हमलों से लहूलुहान खाड़ी देश ईरान पर क्यों नहीं कर रहे अटैक? जानिये क्या है असली वजह- Explained

Written By: Parinay Kumar Updated by: Parinay Kumar
Updated Date:March 18, 2026 2:30 PM IST

Why Arab Countries Not Against Iran: अमेरिका-इजरायल के खिलाफ जंग में ईरान खाड़ी देशों को भी लगातार निशाना बना रहा है. अब तक इन मुस्लिम देशों ने ईरान के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की है.

Israel Iran War Update: ईरान-इजरायल की जंग बीते 19 दिनों से जारी है. इजरायल-अमेरिका की तरफ से किये गए हर वार का ईरान मुंहतोड़ जवाब दे रहा है. फिलहाल युद्ध खत्म होने के संकेत नहीं दिख रहे हैं. अमेरिका-इजरायल के खिलाफ अपनी लड़ाई में ईरान पड़ोसी खाड़ी देशों को भी निशाना बना रहा है. हालांकि लोगों के मन में यह सवाल है कि आखिर ये सभी मुस्लिम देश युद्ध में शामिल क्यों नहीं हो रहे और ईरान पर हमला क्यों नहीं बोल रहे? जिन देशों को निशाना बनाया जा रहा है, उनमें से कई देश अभी भी ईरान के खिलाफ लड़ाई में शामिल होने से इनकार कर रहे हैं. जंग की बजाय वे संयम और कूटनीति का रास्ता चुन रहे हैं. खाड़ी देशों की सरकारों का कहना है कि उनकी प्राथमिकता अपने इलाके की रक्षा करना है और एक ऐसे बड़े संघर्ष को रोकना है जो इस इलाके को और वैश्विक एनर्जी मार्केट को अस्थिर कर सकता है.

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'फॉक्स न्यूज' की एक रिपोर्ट के मुताबिक, जब व्हाइट हाउस के वरिष्ठ रिपोर्टर पीटर डूसी ने खाड़ी देशों पर ईरान के हमलों को लेकर ट्रंप से सवाल किया तो अमेरिकी राष्ट्रपति ने कहा कि विशेषज्ञों को भी यह अंदाजा नहीं था कि तेहरान पड़ोसी देशों को निशाना बनाएगा. ट्रंप ने कहा कि बड़े से बड़े विशेषज्ञ को भी इसका अंदेशा नहीं था. मालूम हो कि इजरायल-अमेरिका के खिलाफ जंग में ईरान ने कतर, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, बहरीन और कुवैत को भी निशाना बनाया है.

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'आर्म्ड कॉन्फ्लिक्ट लोकेशन एंड इवेंट डेटा प्रोजेक्ट' के मुताबिक, इस महीने की शुरुआत में ईरानी तेल ठिकानों पर अमेरिका-इजरायल के हमलों के बाद तेहरान ने जंग को और बढ़ा दिया. उसने खाड़ी के एनर्जी इंफ्रास्ट्रक्चर और होर्मुज स्ट्रेट में शिपिंग रूट्स पर जवाबी हमले तेज कर दिए. आर्म्ड कॉन्फ्लिक्ट लोकेशन एंड इवेंट डेटा प्रोजेक्ट (ACLED) ने 28 फरवरी के बाद से खाड़ी और होर्मुज स्ट्रेट में शिपिंग पर कम से कम 25 ईरानी हमलों को रिकॉर्ड किया है.

ACLED में यमन और खाड़ी क्षेत्र के वरिष्ठ विश्लेषक लुका नेवोला के हवाले से फॉक्स न्यूज ने बताया, 'तेहरान ने खाड़ी के एनर्जी इंफ्रास्ट्रक्चर और होर्मुज स्ट्रेट में शिपिंग को इसलिए निशाना बनाया ताकि अमेरिका और उसके क्षेत्रीय सहयोगियों के लिए युद्ध की लागत बढ़ाई जा सके.''अमेरिका फर्स्ट पॉलिसी इंस्टीट्यूट' के चीफ रिसर्च ऑफिसर जैकब ओलिडोर्ट ने बताया, 'जब से 'ऑपरेशन एपिक फ्यूरी' शुरू हुआ है, हमारे खाड़ी सहयोगियों ने ईरानी शासन से पैदा होने वाले खतरों के खिलाफ एक अभूतपूर्व और एकजुट मोर्चा बनाकर जवाब दिया है.' उन्होंने कहा कि उनका मुख्य उद्देश्य युद्ध को बढ़ाना नहीं, बल्कि हमलों को रोकना रहा है.

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जंग में सऊदी क्यों नहीं ले रहा भागीदारी?

फॉक्स न्यूज ने सऊदी के जियो पॉलिटिकल रिसर्चर सलमान अल-अंसारी के हवाले से बताया कि रियाद वैश्विक बाजार में स्थिरता बनाए रखने पर ध्यान दे रहा है और इस समय पूरी संयम बरत रहा है. अल-अंसारी ने सऊदी अरब की एक पुरानी रणनीतिक सोच की ओर भी इशारा किया. उन्होंने कहा, 'सौ साल से भी पहले, सऊदी अरब के संस्थापक, राजा अब्दुलअजीज अल सऊद ने कहा था, 'जीवित लोग मृतकों से नहीं लड़ते.' शायद रियाद इसी सिद्धांत का पालन कर रहा है, कम से कम तब तक जब तक कि आगे के घटनाक्रम सामने नहीं आ जाते.'

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कतर को है किस बात का डर?

कतर ने भी इसी तरह का नजरिया अपनाया है. कतर के एक अधिकारी ने बताया, 'कतर की नीतियां हमेशा संघर्षों को शांत करने की कोशिश करती हैं. कतर युद्ध का हिस्सा नहीं है और हमें यकीन है कि हिंसा बातचीत के ज़रिए ही खत्म होनी चाहिए. साथ ही, ईरान के हमलों के बाद कतर अपने देश और संप्रभुता की रक्षा करना जारी रखे हुए है.'

क्या है खाड़ी देशों की नीति?

खाड़ी देशों की क्षेत्रीय नीति भी इसले लिए अहम है. इसके तहत वे अपनी जमीन का इस्तेमाल ईरान पर हमले करने के लिए नहीं होने देते. कुछ अमेरिकी सैन्य विशेषज्ञों का कहना है कि खाड़ी देशों की यह हिचकिचाहट इस क्षेत्र में अमेरिका की विश्वसनीयता को लेकर उनकी पुरानी चिंताओं से भी जुड़ी हैं. अमेरिकी सेंट्रल कमांड के पूर्व डिप्टी कमांडर, वाइस एडमिरल रॉबर्ट एस. हारवर्ड ने कहा कि खाड़ी देशों की सरकारें संघर्ष बढ़ने के खतरों का बहुत सावधानी से आकलन कर रही हैं. उन्होंने कहा, 'जब ये देश इस बात पर विचार करते हैं कि उन्हें जवाबी हमला करना चाहिए या नहीं, तो उन्हें इस बात की चिंता सताती है कि जब हम (अमेरिका) यहां से चले जाएंगे, तब क्या होगा?

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...तो पूरे गुट को युद्ध में होना होगा शामिल?

क्षेत्रीय विश्लेषकों का कहना है कि खाड़ी देशों के नेताओं को इस बात की चिंता है कि अगर एक भी देश इस लड़ाई में शामिल हो गया, तो यह संघर्ष बहुत तेजी से पूरे इलाके को अपनी चपेट में ले सकता है. बहरीन के विश्लेषक अब्दुल्ला अलजुनेद के हवाले से 'Fox News' ने बताया कि अगर 'Gulf Cooperation Council' (GCC) का कोई एक सदस्य युद्ध में शामिल होता है, तो यह पूरे गुट को अपने साथ खींच सकता है. अलजुनेद ने कहा, 'अगर GCC का कोई भी सदस्य इस हमले में शामिल होने का फैसला करता है तो बाकी GCC देशों के लिए भी उसी समय शामिल होना जरूरी हो जाएगा.' कुल मिलाकर खाड़ी देशों के लीडर संघर्ष को बढ़ाने के बजाय उसे नियंत्रित करने के लिए दृढ़ दिख रहे हैं, भले ही ईरान के हमले उनके क्षेत्र तक पहुंच चुके हों.

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