हाल ही में मेडिकल क्षेत्र में जवाबदेही को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसला सुनाया है. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यदि किसी डॉक्टर पर इलाज में लापरवाही का आरोप है और मामले की सुनवाई के दौरान उसकी मृत्यु हो जाती है, तो भी मुआवजे की कानूनी कार्यवाही बंद नहीं होगी. ये मामला डॉक्टर के कानूनी वारिशों तक जाएगा, जिससे पीड़ित को उसके नुकसाान की भरपाई की जा सके. आइये जानते हैं इस पूरे मामले को विस्तार से…
जस्टिस जेके माहेश्वरी और जस्टिस अतुल एस चांदुरकर की बेंच ने स्पष्ट किया कि डॉक्टर की मौत से मेडिकल लापरवाही का मामला ‘स्वतः’ (Automatically) खत्म नहीं होता. कोर्ट ने कहा कि डॉक्टर के कानूनी वारिसों (Legal Heirs) को इस मामले में पक्षकार बनाया जा सकता है. हालांकि, यह कार्यवाही केवल उन दावों के लिए होगी जो मृतक डॉक्टर की संपत्ति (Estate) से जुड़े वित्तीय नुकसान की भरपाई से संबंधित हों.
असल में ये मामला बिहार के मुंगेर का है, जहां 1990 में सुरेश चंद्र रॉय ने अपनी पत्नी की आंख के दर्द के लिए डॉक्टर पीबी लाल से संपर्क किया था. ऑपरेशन के बाद भी दर्द ठीक नहीं हुआ और बाद में पता चला कि आंख की रोशनी चली गई है. जिला उपभोक्ता फोरम ने 2003 में डॉक्टर को दोषी पाया था, लेकिन बाद में राज्य आयोग ने इस फैसले को पलट दिया. मामला जब राष्ट्रीय उपभोक्ता आयोग (NCDRC) पहुंचा, तो 2009 में सुनवाई के दौरान ही डॉक्टर लाल की मृत्यु हो गई. डॉक्टर की मृत्यु के बाद उनके फैमिली को मामले में पार्टी बनाया गया. फैमिली ने इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी.
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में एक महीन लकीर खींची है. कोर्ट ने कहा कि व्यक्तिगत नुकसान जैसे कि मानसिक पीड़ा, दर्द या प्रतिष्ठा की हानि से जुड़े दावे डॉक्टर की मौत के साथ खत्म हो जाते हैं, लेकिन वित्तीय नुकसान (Pecuniary Loss), जैसे कि इलाज का खर्च, अस्पताल के बिल और आर्थिक हानि, डॉक्टर की विरासत या संपत्ति से वसूले जा सकते हैं.
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि डॉक्टर के बच्चों या पत्नी को व्यक्तिगत रूप से लापरवाही का दोषी नहीं माना जा सकता. उनकी जिम्मेदारी केवल उतनी ही होगी, जितनी संपत्ति उन्हें विरासत में मिली है, यानी मुआवजे की रकम डॉक्टर द्वारा छोड़ी गई जायदाद से दी जाएगी, उनके वारिसों की अपनी निजी कमाई से नहीं.
इससे पहले 2001 के ‘बलबीर सिंह मकोल’ केस में यह माना जाता था कि डॉक्टर की मौत के साथ ही लापरवाही का कारण (Cause of Action) खत्म हो जाता है. सुप्रीम कोर्ट ने इस पुराने नजरिए को बदलते हुए कहा कि भारतीय कानून, विशेषकर उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 306, वित्तीय नुकसान के दावों को बरकरार रखने की अनुमति देता है.
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम की धारा 13(7) के तहत सिविल प्रोसीजर कोड (CPC) के प्रावधान लागू होते हैं, जो पक्षों की मृत्यु के बाद भी कार्यवाही जारी रखने की अनुमति देते हैं. इस फैसले के बाद अब मामला वापस NCDRC जाएगा. नेशनल कंज्यूमर फोरम तय करेगा कि क्या डॉक्टर वास्तव में लापरवाह थे और कितनी वित्तीय क्षतिपूर्ति देय है.
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