नई दिल्ली. लोकसभा में अविश्वास प्रस्ताव पर शुक्रवार को चर्चा होनी है. आंकड़ों के हिसाब से देखें तो इस अविश्वास प्रस्ताव से मोदी सरकार पर कोई खतरा मंडराता नहीं दिख रहा है. लेकिन फिर भी इस मुद्दे पर सरकार और विपक्ष दोनों ही काफी उत्साहित और एग्रेसिव हैं. इससे साफ होता है कि अविश्वास प्रस्ताव के बहाने ही बीजेपी और कांग्रेस दोनों साल 2019 के आम चुनाव की रूपरेखा तैयार करना चाहती हैं. इसे इस तरह कह सकते हैं कि एनडीए और यूपीए अपनी ताकत का प्रदर्शन कर सकते हैं. Also Read - पंतजलि ने PM CARES Fund में 25 करोड़ रुपए का सहयोग दिया: योगगुरु रामदेव

कांग्रेस इसे साल 2003 के अविश्वास प्रस्ताव से जोड़ कर देख रही है. उस दौरा में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार अपने पूरे रौं में थी. देश में एक तरह से उसकी लहर दौड़ रही थी. अटल का भाषण, आडवाणी की संगठन क्षमता और और प्रमोद महाजन का मैनेजमेंट बीजेपी को मजबूती दिए हुए था. ‘इंडिया शाइनिंग’ का नारा बुलंद था. लेकिन कांग्रेस ने अविश्वास प्रस्ताव लाया. हालांकि, उस दौर में भी सरकार को इससे कोई खास फर्क नहीं पड़ा, लेकिन सोनिया गांधी विपक्ष को एकजुट करने में कामयाब हो गईं. एक मजबूत यूपीए साल 2004 के चुनाव में उतरा और उसकी जीत भी हुई. ऐसे में कांग्रेस उसी को ध्यान में रखते हुए रणनीति तैयार कर रही है. Also Read - Coronavirus लॉकडाउन में ये काम कर रहे हैं PM मोदी, शेयर किए 3D Videos

बीजेपी की कोशिश
दूसरी तरफ बीजेपी की कोशिश है कि वह चुनाव के पहले मजबूत विपक्ष के गुब्बाड़े की हवा निकाल दे. बीजेपी की कोशिश है कि एनडीए के सहयोगी दल तो उसके साथ मजबूती के साथ रहे ही, साथ ही कुछ और नेता और दल उसके साथ रहें. इसके साथ ही वह यह भी साबित करने की कोशिश करेगी कि विपक्ष के पास साल 2019 के लिए कोई विजन और आधार नही हैं. Also Read - राहुल गांधी ने पीएम मोदी को लिखा पत्र, बोले- अचानक बंद होने से भय और भ्रम पैदा हो गया है

टीडीपी-शिवसेना चुनौती
बीजेपी के साथ मुश्किल ये है कि एनडीए की सहयोगी रह चुकी टीडीपी ही यह अविश्वास प्रस्ताव लेकर आई है. ऐसे में एक बजबूत पार्टी एनडीए के खिलाफ मुखर होकर खड़ी है. वहीं, शिवसेना लगातार बीजेपी को धमकी दे रही है. उसने पहले ही घोषणा कर दिया है कि वह साल 2019 का चुनाव अकेले लड़ेगी. अविश्वास प्रस्ताव में भी वह वोटिंग में भाग नहीं ले रही है. ऐसे में बीजेपी को शिवसेना को साथ लाना भी एक बड़ी चुनौती है.
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टीआरएस पर संशय
टीआरएस भी एनडीए के साथ नहीं दिख रही है. के चंद्रशेखर राव गैर बीजेपी, गैर कांग्रेस गठबंधन की बात लगातार करते आ रहे हैं. लेकिन थर्ड फ्रंट का ये मामला बनता नहीं दिख रहा है. हालांकि, यहां पर बीजेपी को ये लगता है कि थर्ड फ्रंट नहीं बनने की स्थिति में टीआरएस एनडीए के साथ ही आ जाएगी.

बीजू जनता दल
बीजू जनता दल ने भी अपना रुख तैयार नहीं किया है. ओडिशा के सीएम नवीन पटनायक राज्य में अपनी स्थिति को लेकर लगातार चिंतित हैं. एक तरफ वहां कांग्रेस उन्हें हमेशा से चुनौती देते आ रही थी तो दूसरी तरफ बीजेपी भी राज्य में लगातार अपनी स्थिति मजबूत करने की कोशिश कर रही है. ऐसे में वह किसके साथ जाएगी, इसे भी लेकर असमंजस की स्थिति है. हालांकि, कांग्रेस लगाता नवीन पटनायक को सांधने की कोशिश कर रही है,

एआईडीएमके
जयललिता के निधन के बाद से एआईडीएमके में लगातार कलह की बात आ रही है. पनीरसेल्वम और पलानीस्वामी में जहां अलगाव और फिर एकजुटटा दिखी वहीं, दिनाकरन भी खुद को जयललिता का उत्तराधिकारी घोषित करने की कोशिश कर रहे हैं. कावेरी मु्द्दे पर वह केंद्र सरकार के खिलाफ तो है ही, लेकिन कांग्रेस के साथ भी जाती नहीं दिख रही है. इसलिए उसकी क्या स्थिति होगी, वह भी स्पष्ट नहीं है.