माता-पिता ही आखिर क्यों मांग रहे 32 साल के हरीश की मौत? सुप्रीम कोर्ट को लेना है फैसला, जानें क्या है पूरा मामला

दिल्ली के रहने वाले हरीश राणा 2013 में एक हादसे के बाद पिछले 13 सालों से कोमा में है. उनके माता-पिता ने सुप्रीम कोर्ट में पैसिव यूथेनेशिया की मांग की थी. कोर्ट ने अब इस ऐतिहासिक मामले में अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है.

Published date india.com Published: January 15, 2026 4:35 PM IST
माता-पिता ही आखिर क्यों मांग रहे 32 साल के हरीश की मौत? सुप्रीम कोर्ट को लेना है फैसला, जानें क्या है पूरा मामला

13 सालों से बिस्तर पर पड़े हरीश राणा की जिंदगी आज सुप्रीम कोर्ट के एक ऐतिहासिक फैसले के मोड़ पर खड़ी है. दिल्ली के महावीर एन्क्लेव निवासी हरीश राणा वर्ष 2013 में चंडीगढ़ में पढ़ाई के दौरान एक गंभीर हादसे का शिकार हो गए थे. अपने पीजी आवास की चौथी मंजिल की बालकनी से गिरने के बाद उन्हें गंभीर सिर की चोटें आईं, जिससे वह 100 प्रतिशत विकलांग हो गए. तब से लेकर आज तक हरीश स्थायी वेजिटेटिव अवस्था में हैं और सांस व पोषण के लिए पूरी तरह मेडिकल सपोर्ट पर निर्भर हैं.

गुरुवार (15 जनवरी) को सुप्रीम कोर्ट ने हरीश के माता-पिता की तरफ से दायर पैसिव यूथेनेशिया की याचिका पर सुनवाई के बाद अपना आदेश सुरक्षित रख लिया. जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस केवी विश्वनाथन की पीठ ने इस मामले को ‘बेहद नाजुक और संवेदनशील’ बताते हुए कहा कि यह फैसला किसी एक जीवन तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे जुड़े नैतिक और कानूनी प्रश्न व्यापक हैं. पीठ ने कहा, “हम भी नश्वर हैं. कौन जीए और कौन मरे, यह तय करना आसान नहीं है.’

हरीश के माता-पिता की दलील

हरीश के माता-पिता की ओर से पेश एमिकस क्यूरी ने दलील दी कि मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट्स के अनुसार हरीश के ठीक होने की संभावना लगभग शून्य है. ऐसे में जीवन रक्षक उपचार जारी रखना ‘सम्मान के साथ जीने के अधिकार’ का उल्लंघन है. उन्होंने इसे प्राकृतिक मृत्यु को तेज करने की प्रक्रिया बताते हुए पैसिव यूथेनेशिया की अनुमति मांगी.

क्या है पैसिव यूथेनेशिया की प्रक्रिया

पैसिव यूथेनेशिया की प्रक्रिया को समझाते हुए एमिकस ने बताया कि इसमें किसी तरह का सक्रिय हस्तक्षेप नहीं किया जाएगा. हरीश को पेलिएटिव केयर में रखा जाएगा, जहां उनके फीडिंग ट्यूब हटाए जाएंगे और उन्हें दर्द से बचाने के लिए सेडेटिव दिए जाएंगे, ताकि उनकी मृत्यु शांतिपूर्ण और गरिमामय हो.

केंद्र सरकार की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने भी याचिका का समर्थन किया. उन्होंने कहा कि मृत्यु किसी चूक के कारण नहीं, बल्कि मूल बीमारी के कारण होनी चाहिए. उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि यह पहला मामला हो सकता है, जहां सुप्रीम कोर्ट की तरफ से तय पैसिव यूथेनेशिया के दिशा-निर्देशों को व्यावहारिक रूप से लागू किया जाएगा.

गौरतलब है कि भारत में सक्रिय यूथेनेशिया अवैध है, लेकिन 2011 के अरुणा शानबाग मामले और 2018 के फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया को वैध ठहराया था. अब हरीश राणा का मामला न सिर्फ उनके परिवार के लिए, बल्कि देश की मेडिकल और कानूनी व्यवस्था के लिए भी एक अहम मिसाल बन सकता है.

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