नई दिल्ली: मध्य प्रदेश (Madhya Pradesh) में जारी सियासी घमासान के बीच मुख्यमंत्री कमलनाथ (Kamal Nath) बार-बार विपक्षी पार्टी भाजपा (BJP) को अपनी सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव (No Confidance Motion) लाने की चुनौती दे रहे हैं. दूसरी तरफ कांग्रेस (Congress) के 22 विधायकों के बगावत करने बावजूद भाजपा कमलनाथ सरकार से इस्तीफा मांग रही है. वह राज्यपाल के जरिए राज्य सरकार से बारबार सदन में विश्वास मत हासिल करने को कह रही है. Also Read - तीन साल के बेटे और बीबी को छोड़कर आठ दिन से कार में रह रहा यह डॉक्टर , सीएम शिवराज ने भी जज्बे को किया सलाम

सबसे बड़ा सवाल यही उठता है कि भाजपा को कमलनाथ सरकार के अल्पमत में होने का इतना ही भरोसा है तो वह विधानसभा में अविश्वास प्रस्ताव लाने को तैयार क्यों नहीं है इस मामले पर सुप्रीम कोर्ट में भी सुनवाई चल रही है. देश का शीर्ष अदालत भी बुधवार को करीब 4 घंटे की सुनवाई के बाद कोई फैसला नहीं सुना पाया. ऐसे में समझा जा सकता है कि यह मामला कितना जटिल हो गया है. Also Read - मध्य प्रदेश में शराब की लत के शिकार 30 वर्षीय पुरुष समेत दो मरीजों की मौत, कोरोना के 22 नये मामले

इस बारे में अंग्रेजी अखबार इकोनॉमिक टाइम्स के संपादक टीके अरुण ने अपने अखबार में एक विस्तृत रिपोर्ट लिखी है. इस रिपोर्ट में उन्होंने यही सवाल किया है कि आखिर भाजपा क्यों नहीं अविश्वास प्रस्ताव ला रही है. टीके अरुण लिखते हैं एक बार जब सरकार बन जाती है और वह सदन में बहुमत साबित कर देती है तो उसे केवल एक ही स्थिति में हटाया जा सकता है और वो स्थिति होती है विपक्ष की ओर से उसके खिलाफ लाए गए अविश्वास प्रस्ताव को सदन की मंजूरी. Also Read - डॉक्टर ने कार को बनाया घर, कुछ यूं कर रहे मरीज़ों का इलाज, लोग बोले- ऐसे कोरोना फाइटर्स को सलाम

वह इस लाइन के माध्यम से साफ-साफ कहते हैं कि कमलनाथ की सरकार को विपक्ष के अविश्वास प्रस्ताव के जरिए ही हटाना चाहिए. वह आगे लिखते हैं अगर राज्यपाल को लगता है कि सरकार के पास बहुमत नहीं है और ऐसे में सरकार के मुखिया यानी मुख्यमंत्री को विश्वास प्रस्ताव पेश कर अपना बहुमत साबित करना चाहिए. यह बात अनुचित और अतार्किक है.

टीके अरुण आगे लिखते हैं कि भारत का संविधान एक अल्पमत की सरकार की मौजूदगी को खारिज नहीं करता. उनके मुताबिक संविधान में इसकी व्यवस्था है. ऐसी आपात स्थिति हो सकती है कि जिसमें एक सरकार के पास सदन में स्पष्ट बहुमत न होने के बावजूद वह बनी रहे. ऐसी स्थिति तब हो सकती है जब विपक्ष के पास भी सरकार बनाने के लिए बहुमत न हो.

टीके अरुण ने इस संदर्भ में पूर्व प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव की सरकार का उदाहरण दिया है. देश के इतिहास में शायद वह पहली सरकार थी जिसके पास सदन में स्पष्ट बहुमत नहीं था. उनकी सरकार के खिलाफ विपक्ष ने अविश्वास प्रस्ताव लाया था और नरसिम्हा राव ने कथित तौर पर झारखंड मुक्ति मोर्चा के सांसदों को खरीदकर सदन में बहुमत हासिल कर लिया था.

वह आगे खिलते हैं कि संसदीय इतिहास कई ऐसी घटनाएं हुई हैं जिससे यह स्पष्ट होता है कि एक अल्पमत की सरकार न तो असंवैधानिक है और न ही अस्थिर है. वह तभी अस्थिर सरकार कहलाएगी जब विपक्ष उसे मतदान के जरिए गिरा दे. उन्होंने लिखा है कि इसी सिद्धांत पर मध्य प्रदेश में कमलनाथ सरकार का भविष्य तय होना चाहिए. अगर विपक्ष को लगता है कि कमलनाथ सरकार के पास बहुमत नहीं है तो उसे उनके खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाना चाहिए और सदन में इस पर मतदान होना चाहिए. सदन ही तय करेगा कि वह कमलनाथ का समर्थन करता है या नहीं.