कोलकाता: क्या दार्जिलिंग (Darjeeling) को पश्चिम बंगाल (West Bengal) से अलग कर दिया जाएगा? क्या दार्जिलिंग को पश्चिम बंगाल से अलग होना चाहिए? इसी को लेकर बड़ी बहस छिड़ गई है. बीजेपी (BJP) नेताओं ने मांग की है कि पश्चिम बंगाल को दार्जिलिंग से अलग कर देना चाहिए. इसके लिए बीजेपी अध्यक्ष जेपी नड्डा (JP Nadda) को पत्र भी लिखा गया है. बीजेपी नेता पहले भी ये मांग उठाते रहे हैं. इस मांग पर अब टीएमसी (TMC) ने कहा है कि इस बात का सवाल ही नहीं उठता है. पश्चिम बंगाल को विभाजित नहीं किया जा सकता है.Also Read - BSF के बेड़े में शामिल हुए 3 नए फ्लोटिंग बार्डर आउट-पोस्ट स्वदेशी जहाजों का बेड़ा, देखें फोटो

कोलकाता के कुर्सियांग से भाजपा विधायक बिष्णु प्रसाद शर्मा ने पार्टी अध्यक्ष जेपी नड्डा को पत्र लिखकर दार्जिलिंग को पश्चिम बंगाल से अलग करने की मांग की है. कुछ महीने पहले अलीपुरद्वार से भाजपा सांसद जॉन बारला ने भी इस मुद्दे को उठाया था. विधायक बिष्णु प्रसाद शर्मा ने अपने पत्र में नड्डा को पर्वतीय क्षेत्र के लिए एक स्थायी राजनीतिक समाधान खोजने के शीर्ष नेतृत्व के वादे को याद दिलाने का प्रयास किया. जॉन बारला ने वर्ष की शुरुआत में उत्तर बंगाल के जिलों के लिए एक केंद्र शासित प्रदेश की मांग की थी, जिससे राज्य में एक बहस छिड़ गई थी. इसके बाद पश्चिम बंगाल में सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस (TMC) ने भाजपा पर अलगाववाद को बढ़ावा देने का आरोप लगाया था. Also Read - UP में BJP अध्‍यक्ष जेपी नड्डा ने किया डोर-टू-डोर प्रचार, अखिलेश यादव पर आतंकियों के केस हटाने के आरोप लगाए

बीजेपी विधायक ने दावा किया कि राज्य के लोग पश्चिम बंगाल का हिस्सा नहीं रहना चाहते और पर्वतीय क्षेत्र में राज्य दर्जे को लेकर कई हिंसक आंदोलन हुए हैं. शर्मा ने कहा, ‘‘हां, मैंने अपनी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष को पत्र लिखकर उनसे 2019 के लोकसभा चुनावों और 2021 के विधानसभा चुनावों के दौरान किए गए एक स्थायी राजनीतिक समाधान के वादे का सम्मान करने का अनुरोध किया है. यह उस वादे के कारण है कि पर्वतीय क्षेत्र के लोगों ने 2009 के लोकसभा चुनाव के बाद से भाजपा को वोट दिया है. उन्होंने कहा, ‘‘उनके लिए स्थायी राजनीतिक समाधान का मतलब पश्चिम बंगाल के चंगुल से मुक्ति है-चाहे वह अलग राज्य के तौर पर हो या केंद्र शासित प्रदेश.’’ Also Read - एयरपोर्ट अफसरों ने हेलीकॉप्‍टर की उड़ान में देरी की वजह बताई तो अखिलेश बोले- मुझे कैसे पता होगा कि क्या कारण था

यह पूछे जाने पर कि क्या राज्य के भाजपा नेताओं की सोच भी उनके जैसी ही है, तो इस पर शर्मा ने कहा कि इस मांग का पार्टी की बंगाल इकाई से कोई लेना-देना नहीं है. उन्होंने कहा, ‘‘राज्य सरकार, केंद्र और पर्वतीय क्षेत्र के हितधारकों को बैठकर तय करना है कि क्या किया जा सकता है. मैंने इस संदर्भ में अपने राष्ट्रीय अध्यक्ष को पत्र लिखा है.’’ सत्तारूढ़ टीएमसी ने हालांकि दार्जिलिंग को बंगाल से अलग करने की संभावना से इनकार किया और विधायक के बयान को ‘‘अवास्तविक’’ बताया. राज्य के संसदीय कार्य मंत्री पार्थ चटर्जी ने कहा, ‘‘बंगाल को विभाजित करने का कोई सवाल ही नहीं है. भाजपा अलगाववाद को बढ़ावा देने और राजनीतिक कारणों से बंगाल के विभाजन की साजिश रच रही है, लेकिन हम ऐसा कभी नहीं होने देंगे.’’

वहीं, टीएमसी नेता कृष्ण मित्रा ने जानना चाहा कि क्या भाजपा की पश्चिम बंगाल इकाई शर्मा के विचारों का समर्थन करती है. कृष्ण मित्रा ने ट्वीट किया, ‘‘क्या भाजपा की बंगाल इकाई का नेतृत्व कुर्सियांग से अपने विधायक बिष्णु प्रसाद शर्मा की पश्चिम बंगाल के विघटन और एक अलग राज्य के निर्माण की मांग का समर्थन करता है? यदि नहीं, तो क्या भाजपा उन्हें निष्कासित करेगी?’’ पश्चिम बंगाल भाजपा नेतृत्व ने इस मामले पर टिप्पणी करने से इनकार कर दिया, लेकिन कहा कि यह राज्य के किसी भी विभाजन के खिलाफ है. भाजपा के एक नेता ने कहा, ‘‘हमें किसी पत्र की जानकारी नहीं है, लेकिन हम राज्य के किसी भी बंटवारे के खिलाफ हैं.’’ गोरखालैंड की मांग पहली बार 1980 के दशक में की गई थी, जब सुभाष घीसिंग के नेतृत्व वाले जीएनएलएफ ने 1986 में एक हिंसक आंदोलन शुरू किया था, जो 43 दिनों तक चला था. इसके चलते सैकड़ों लोगों की मौत हो गई थी. इस आंदोलन के कारण 1988 में दार्जिलिंग गोरखा हिल काउंसिल का गठन हुआ था.