13 साल पहले लोकसभा में नहीं पारित हो पाया था Women Reservation Bill, क्या इस बार पारित हो पाएगा?

UPA सरकार 2010 में इसे राज्यसभा में पारित कराने में भी कामयाब रही, लेकिन राजनीतिक इच्छाशक्ति और आम सहमति की कमी के कारण ये लोकसभा में पारित नहीं हो पाया.

Published date india.com Updated: September 19, 2023 12:05 PM IST
Women Reservation Bill (Photo File)
Women Reservation Bill (Photo File)

Women Reservation Bill: महिला आरक्षण बिल को कैबिनेट ने मंजूरी दे दी है. ये जानकारी न्यूज एजेंसी ANI ने सूत्रों के हवाले से दी है. अब सबके मन में यही सवाल उठ रहा कि क्या ये बिल संसद (Parliament) में पारित हो जाएगा. इस बिल की वर्तमान स्थिति समझते से पहले इस बिल के 27 साल पुराने इतिहास को समझना होगा. साल 1996 की बात है. एचडी देवेगौड़ा (H D Deve Gowda) की सरकार थी. इस दौरान महिला आरक्षण बिल संसद में पेश किया गया था. तब से लगभग हर सरकार ने इसे आगे बढ़ाने की कोशिश की है. यूपीए सरकार 2010 में इसे राज्यसभा में पारित कराने में भी कामयाब रही, लेकिन राजनीतिक इच्छाशक्ति और आम सहमति की कमी के कारण ये लोकसभा में पारित नहीं हो पाया. एक बार फिर असफलता हाथ लगी. आइए एक-एक प्रयास के बारे में जानते हैं.

पहला प्रयास: संयुक्त मोर्चा सरकार संविधान (21वां संशोधन) विधेयक, 1996 (नए अनुच्छेद 330ए और 332ए का सम्मिलन) पहली बार 12 सितंबर, 1996 को संयुक्त मोर्चा सरकार में तत्कालीन कानून राज्य मंत्री रमाकांत डी खलप द्वारा लोकसभा में पेश किया गया था. जनता दल के कई नेता और सत्तारूढ़ गठबंधन के अन्य घटक इसके पक्ष में नहीं थे. अगले दिन विधेयक को सीपीआई की गीता मुखर्जी की अध्यक्षता वाली एक संयुक्त समिति को भेजा गया. संसदीय पैनल के 31 सदस्यों में (तत्कालीन सांसद) ममता बनर्जी, मीरा कुमार, सुमित्रा महाजन, नीतीश कुमार, शरद पवार, विजय भास्कर रेड्डी, सुषमा स्वराज, उमा भारती, गिरिजा व्यास, राम गोपाल यादव, सुशील कुमार शिंदे और हन्नान मोल्ला थे. पैनल ने महिलाओं के आरक्षण को लेकर अपने सुझाव दिए. समिति ने दिसंबर 1996 में अपनी रिपोर्ट दी, लेकिन इसका काफी विरोध हुआ. विधेयक को 16 मई, 1997 को लोकसभा में चर्चा के लिए लाया गया लेकिन सत्तारूढ़ गठबंधन के भीतर से इसका कड़ा विरोध हुआ. यूएफ सरकार विधेयक पारित नहीं कर सकी.

दूसरा प्रयास: 1998 और 2004 के बीच, अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली भाजपा नीत एनडीए सरकार ने इस विधेयक को कई बार पारित कराने की कोशिश की. 13 जुलाई 1998 जैसे ही तत्कालीन कानून मंत्री एम थंबी दुरई ने विधेयक पेश करने की कोशिश की, राष्ट्रीय जनता दल (राजद) और समाजवादी पार्टी (सपा) के सांसदों ने जमकर इसका विरोध किया. हंगामे के बीच, एक राजद सांसद सुरेंद्र प्रसाद यादव ने अध्यक्ष जी एम सी बालयोगी से विधेयक की प्रतियां छीन लीं और उन्हें फाड़ दिया. विधेयक को अगले दिन भी पेश करने के लिए लिस्ट किया गया था, लेकिन अध्यक्ष ने आम सहमति संभव नहीं होने के कारण इसे टाल दिया.

वाजपेयी सरकार ने फिर कोशिश की. वाजपेयी ने दोबारा एनडीए सरकार बनाने के बाद 23 दिसंबर 1999 को तत्कालीन कानून मंत्री राम जेठमलानी ने ये विधेयक पेश किया. इसका एक बार फिर सपा, बसपा और राजद के सदस्यों ने विरोध किया. वाजपेयी सरकार ने उसके बाद तीन बार – 2000, 2002 और 2003 में विधेयक को आगे बढ़ाने की कोशिश की, लेकिन उस समय मुख्य विपक्षी दलों कांग्रेस और वाम दलों के समर्थन के बावजूद सरकार बिल पारित कराने में सफल नहीं हो पाई. जुलाई 2003 में, तत्कालीन अध्यक्ष मनोहर जोशी ने आम सहमति बनाने की कोशिश के लिए एक सर्वदलीय बैठक बुलाई लेकिन असफल रहे. बाद में विधेयक समाप्त हो गया.

यूपीए ने विधेयक पर दिया जोर 

मई 2004 में सत्ता संभालने वाली प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह की अगुवाई वाली कांग्रेस के नेतृत्व वाली सरकार के सामान्य न्यूनतम कार्यक्रम में घोषणा की गई कि यूपीए विधानसभा और लोकसभा में महिलाओं के लिए एक तिहाई आरक्षण के लिए कानून लाने का बीड़ा उठाएगी. यूपीए सरकार ने अंततः 6 मई, 2008 को विधेयक पेश किया. विधेयक में महिलाओं के लिए लोकसभा और विधानसभा की यथासंभव एक तिहाई सीटें आरक्षित करने और लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित सीटों की एक तिहाई संख्या महिलाओं के लिए प्रदान करने की मांग की गई. समिति ने सिफारिश की कि विधेयक को उसके वर्तमान स्वरूप में बिना किसी देरी के पारित किया जाए. हालांकि कई राजनीति दलों ने गुट बदल लिए तो कई ने विरोध किया.इन सबके बीच दो दिनों की चर्चा के बाद, 9 मार्च, 2010 को राज्यसभा ने विधेयक को दो-तिहाई बहुमत से पारित कर दिया.  भाजपा और वामपंथी, जो विपक्ष में थे, ने इसका समर्थन किया. हालांकि, यूपीए सरकार ने भाजपा और वाम दलों के समर्थन के बावजूद विधेयक को लोकसभा में पारित कराने के लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति नहीं दिखाई.

वर्तमान स्थिति: मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक आज संसद में महिला आरक्षण बिल पेश किया जा सकता है. इस पर कल चर्चा होगी. अब देखना दिलचस्प होगा कि कौन-से दल इसका विरोध करते हैं और कौन समर्थन. हालांकि अब तक जो स्थिति है उसमें कोई भी दल खुलकर इस बिल का विरोध करता नजर नहीं आया है. इस बार बीजेपी सरकार से महिलाओं को बहुत उम्मीदें हैं. महिला आरक्षण बिल पास के पारित होनी की संभावना दिख रही है.

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