नई दिल्‍ली/वॉशिंगटन/लंदन: भारत में समलैंगिक यौन संबंधों को अपराध की श्रेणी में रखने वाले औपनिवेशिक कानून को खारिज करने के सुप्रीम कोर्ट के फैसले का पूरी दुनिया में स्वागत हो रहा है. विभिन्न देशों से आ रही प्रतिक्रियाओं में कहा गया है कि इससे न केवल सबसे बड़े लोकतंत्र बल्कि विश्व भर में समलैंगिंकों के अधिकारों को बढ़ावा मिलेगा. वहीं, फैसला देने वाली सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने कहा है कि सरकार को इस मामले की गंभीरता का अंदाजा था. मुश्किल स्थिति का भान होते ही सरकार ने समलैंगिकता का मुद्दा अदालत के विवेक पर छोड़ा था. Also Read - LGBTQ को स्वीकार्यता प्रदान करने पर आधारित है 'शुभ मंगल ज्यादा सावधान': आयुष्मान खुराना

सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को भारतीय दंड संहिता की धारा 377 के तहत समलैंगिक सेक्स को अपराध बताने वाले प्रावधान को अपराध की श्रेणी से बाहर करते हुए कहा कि यह मनमाना और अतार्किक त्रुटि है जिसका बचाव नहीं किया जा सकता. न्यायालय ने अपने फैसले में कहा कि लेस्बियन, गे, बाईसेक्सुअल, ट्रांसजेंडर और क्वीर (एलजीबीटीक्यू) समुदाय के लोगों को भी देश के अन्य नागरिकों की भांति ही संवैधानिक अधिकार प्राप्त हैं. Also Read - 2019 Year Ender:गूगल पर सबसे ज्यादा सर्च किया गया Gandii Baat 2 का लेस्बियन सीन, 2 करोड़ बार ढूंढा गया

वॉशिंगटन पोस्ट का कहना है कि भारत की शीर्ष अदालत का फैसला दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में समलैंगिक अधिकारों की जीत है. अखबार ने रेखांकित किया कि भारतीय दंड संहिता के प्रावधानों के तहत सेक्स संबंधों को अप्राकृतिक बताकर उसे अपराध घोषित करने वाली धारा को कार्यकर्ताओं के दशकों के संघर्ष के बाद खत्म कर दिया गया. अमेरिका के इस प्रतिष्ठित अखबार के अनुसार, भारत के शीर्ष न्यायालय के इस फैसले से दुनिया भर में समलैंगिक अधिकारों को बढ़ावा मिलेगा. Also Read - बेटी के लेस्बियन संबंध का चला पता, शर्म से पिता ने खुद को मार ली गोली

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उसने लिखा है, यह फैसला भारत में तेजी से बदलते सामाजिक परिवेश को दिखाता है, क्योंकि पांच साल पहले ही शीर्ष अदालत ने इस कानून को बहाल रखा था. तभी से कार्यकर्ता लोगों को समलैंगिक अधिकारों के प्रति जागरूक बनाने में जुट गये थे.

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वहीं न्यूयॉर्क टाइम्स ने इस फैसले को भारत में समलैंगिक अधिकारों के लिए मील का पत्थर बताया. अखबार का कहना है कि इस फैसले ने वर्षों से चल रही कानूनी लड़ाई को खत्म कर दिया है. ह्यूमन राइ्टस वॉच की दक्षिण एशिया की निदेशक मीनाक्षी गांगुली का कहना है कि इस फैसले के बाद अन्य देशों को भी प्ररणा मिलेगी कि वे समलैंगिकों और ट्रांसजेंडर समुदाय को लेकर अभी तक मौजूद औपनिवेशिक कानून को खत्म करें. सीएनएन और बीबीसी ने भी फैसले का स्वागत किया है.

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संयुक्त राष्ट्र प्रमुख एंतोनियो गुतारेस ने भी समलैंगिकों के बीच सहमति से यौन संबंध को अपराध ठहराने वाले धारा 377 के एक हिस्से को समाप्त करने के सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर खुशी जतायी. गुतारेस ने ट्वीट किया, ‘‘भेदभाव और पूर्वाग्रह हमेशा ही ‘तर्कहीन, अनिश्चित और स्पष्ट रूप से मनमाना’ है जैसा कि प्रधान न्यायाधीश ने कहा है. मैं भारत के शीर्ष अदालत के इस फैसले का स्वागत करता हूं, प्यार की जीत.’’ यूएनएआईडीएस ने भी इस फैसले का स्वागत किया.

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इधर, सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वह धारा 377 पर केंद्र के स्पष्ट बयान का समर्थन करता है लेकिन सरकार को मुश्किल स्थिति का भान हो गया था. इसीलिए उसने मामला “अदालत के विवेक” पर छोड़ दिया. प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा की अगुवाई वाली पांच सदस्यीय पीठ ने यह टिप्पणी की. इसी पीठ ने व्यवस्था दी है कि सहमति से दो वयस्कों के बीच समलैंगिक यौन संबंध अपराध नहीं है. अलग से अपना फैसला लिखने वाले न्यायमूर्ति आर एफ नरीमन ने कहा , ‘‘मुश्किल स्थिति का भान होने के बाद यूनियन ऑफ इंडिया (भारत संघ) ने हलफनामा दाखिल कर याचिकाकर्ताओं का विरोध नहीं किया. उसने इसे अदालत के विवेक पर छोड़ दिया.’’

न्यायमूर्ति डी वाई चंद्रचूड ने भी कहा कि सरकार ने धारा 377 की वैधता पर निर्णय लेने का दायित्व अदालत के विवेक पर छोड़ दिया. भादसं की धारा 377 में ‘अप्राकृतिक अपराध’ का उल्लेख है. यह धारा कहती है कि कोई भी यदि प्रकृति के विरुद्ध किसी पुरुष, महिला या जानवरी से शारीरिक संबंध कायम करता है तो उम्रकैद की सजा होगी. न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ ने कहा, ‘‘केंद्र सरकार ने कहा कि वह धारा 377 की वैधता पर फैसला अदालत के विवेक पर छोड़ती है. इसमें यह बात थी कि सरकार का इस विषय पर अपना कोई रुख नहीं है ……..’’

 

इनपुट: एजेंसी