नई दिल्ली/रांची: प्रवासी मजदूर घर पहुँचने के लिए 1350 किलोमीटर रिक्शा चला चुका है और अभी घर नहीं पहुंचा है. रिक्शे पर पत्नी और बेटे को बैठाकर चल रहा है. श्रमिक का नाम गोविंद मंडल है. दिल्ली से चला शख्स पश्चिम बंगाल पहुँचने के लिए अभी रास्ते में है. वह 15 दिन से परिवार के साथ सफ़र कर रहा है. और अभी झारखंड पहुंचा है. Also Read - Coronavirus से भारत चला गया है 15 साल पीछे, भज्‍जी ने फनी वीडियो शेयर कर उड़ाया मजाक

पश्चिम बंगाल के मालदा जिले के निवासी मंडल नाम का ये शख्स नई दिल्ली के एक गैरेज में मैकेनिक का काम करता था. हालांकि लॉकडाउन लागू होते ही उनके मालिक ने उन्हें मोटर मैकेनिक की नौकरी से निकालते हुए 16,000 रुपये थमा दिए. कई दिनों तक राजधानी में किसी न किसी तरह गुजर बसर करने के बाद जब उनके पास सिर्फ 5000 रुपये बचे, तो उन्होंने घर लौट जाने का फैसला किया. Also Read - अनुष्‍का शर्मा की सनशाइन वाली पिक्‍चर पर फ्लैट हुए विराट कोहली, इंस्‍टाग्राम पर इस अंदाज में दिया जवाब

मंडल ने 4800 रुपये में एक सेकेंड हैंड रिक्शा खरीदा और पत्नी और बच्चे के साथ निकल पड़े. वह मंगलवार को झारखंड के देवघर पहुंचे. बस दो सौ रुपये के साथ यात्रा शुरू करना मूर्खतापूर्ण था. देवघर पहुंचने तक उनके परिवार के पास कुछ नहीं बचा, उनका एकमात्र रिक्शा पंचर हो गया और वे खुद भी अधमरे हो चुके थे. उन्होंने सरकार द्वारा संचालित सामुदायिक रसोईघर देखकर रुकने का फैसला किया, जहां उन्होंने अपनी और अपने परिवार की भूख मिटाई. Also Read - इस दिन खुलेगा प्रसिद्ध बालाजी मंदिर, हर दिन 6,000 भक्त कर पाएंगे दर्शन

अपने खतरनाक सफर को याद करते हुए मंडल ने कहा, “कुछ किलोमीटर की यात्रा करने के बाद ही मेरा रिक्शा पंक्चर हो गया. मैंने 140 रुपये में पंक्चर ठीक कराया, जिसके बाद मेरे पास सिर्फ 60 रुपये बचे. मुझे बाद में उत्तर प्रदेश पुलिस ने पकड़ लिया. मैंने अपनी कहानी उप्र पुलिस को सुनाई, जिन्होंने दया दिखाते हुए मुझे चूल्हे के साथ एक गैस सिलेंडर दिया.” उन्होंने कहा, “मैंने बीते 15 दिनों में करीब 1350 किलोमीटर लंबा सफर तय किया है. यह बहुत मुश्किल था. हम सभी को भूख लगी थी. जब हम देवघर पहुंचे तो हमें सामुदायिक रसोई की जानकारी मिली. मैं वहां पहुंचा और पत्नी और अपने साढ़े तीन साल के बेटे के साथ खाना खाया.” वह आगामी दिनों में अपना बाकी का सफर पूरी करेंगे. सिर्फ यही नहीं कई और मजदूर भी इसी तरह घर पहुँचने को सड़कों पर हैं. इटावा के सौरभ शर्मा कहते हैं कि मजदूरों को उनके हाल पर छोड़ दिया गया. कानपुर में हाईवे पर उन्हें कई ऐसे मजदूर मिले जिनका दर्द भावुक कर देने वाला था.