तिरुवनंतपुरम: केरल में प्रसिद्ध अयप्पा मंदिर में अगले तीर्थयात्रा सीजन में प्रसाद के रूप, रंग और स्वाद में बदलाव होने वाला है. प्रसिद्ध तिरूमाला तिरूपति मंदिर और पलानी में स्थित भगवान मुरूगन के मंदिर में स्वादिष्ट लड्डू और पंचमरूथम बनाने में मार्गदर्शन करने वाला केंद्रीय खाद्य प्रौद्योगिकी अनुसंधान संस्थान (सीएफटीआरआई) अब सबरीमाला मंदिर के प्रसादम को एक नया रूप देने जा रहा है. Also Read - श्रद्धालुओं के लिए खुला सबरीमला मंदिर, एक दिन में सिर्फ 250 लोगों को दर्शन की इजाजत- COVID निगेटिव सर्टिफिकेट जरूरी

अयप्पा मंदिर का प्रबंध करने वाले त्रावणकोर देवस्वोम बोर्ड (टीडीबी) ने प्रसाद ‘अप्पम’ और ‘अरावण’ की गुणवत्ता, स्वाद को बढ़ाने के लिए सीएफटीआरआई को अपने साथ जोड़ा है. पत्तनमतिट्ठा जिले के सबरीमाला में पहाड़ी पर स्थित भगवान अयप्पा मंदिर में वार्षिक नवम्बर से जनवरी के तीर्थयात्री सीजन के दौरान विदेशियों समेत लाखों श्रद्धालु आते हैं. Also Read - Methi Laddu Recipe: घर पर बनाएं मेथी के लड्डू कई सारी बीमारियों से रहेंगी दूर, जानें इसे बनाने का तरीका

टीडीबी के अध्यक्ष पी पद्माकुमार ने बताया कि मंदिर 15 मई को मासिक पूजा के लिए खुलेगा और अगले दिन बोर्ड और सीएफटीआरआई के बीच एक समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर होने की उम्मीद है. अय्यप्पा स्वामी मंदिर करोड़ों हिंदुओं की आस्था का प्रतीक है. दक्षिण भारत के राज्य केरल में सबरीमाला में अय्यप्पा स्वामी मंदिर है. मान्यताओं के मुताबिक इस मंदिर के पास मकर संक्रांति की रात घने अंधेरे में रह रहकर एक ज्योति दिखती है. Also Read - सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश के लिए कानून बनाना राज्य सरकार के लिए संभव नहीं: विजयन

इस ज्योति के दर्शन के लिए दुनियाभर से करोड़ों श्रद्धालु हर साल आते हैं. बताया जाता है कि जब-जब ये रोशनी दिखती है इसके साथ शोर भी सुनाई देता है. इस खास घटना को देखने के लिए हर साल अयप्पा मंदिर आने वाले भक्त मानते हैं कि ये देव ज्योति है और भगवान इसे जलाते हैं.

कई बरसों से सबरीमाला तीर्थस्थल पूरे भारत खासतौर से दक्षिण भारत के राज्यों के लाखों लोगों को आकर्षित करता रहा है. यहां सबसे पहले भगवान अयप्पा के दर्शन होते हैं, जिन्हें धर्म सृष्टा के रूप में भी जाना जाता है. इन्हें वैष्ण्वों और शैवों के बीच एकता के प्रतीक के रूप में देखा जाता है. ऐसा माना जाता है कि इन्होंने अपने लक्ष्य को पूरा किया था और सबरीमाला में इन्हें दिव्य ज्ञान की प्राप्ति हुई थी.