Diwali 2019 का त्‍योहार खुशियां साथ ले आता है. पूरे देश में इस त्‍योहार की धमक होती है.

कई दिन पहले से इस त्‍योहार की तैयारी शुरू हो जाती है. लोग सामान की खरीदारी करते हैं. घर की साफ-सफाई करते हैं, दिवाली पूजा के लिए उसे सजाते हैं.

ऐसी ही तैयारियों में लगे होते हैं कुम्‍हार भी. उत्तर प्रदेश के कुम्हार भी इनसे अलग नहीं. वे दिवाली के हफ्तों पहले से ‘दीयों’ को बनाने के लिए दिन-रात जुटे होते हैं. हालांकि चाइनीज लैंप और झालरों के बीच कम होती इनकी बिक्री से ये परेशान भी रहते हैं.

लखनऊ के पास स्थित चिनहट में रहने वाले कुम्हार रघु प्रजापति कहते हैं, “चूंकि लोग मिट्टी से निर्मित दीयों को खरीदने में रूचि दिखा रहे हैं, ऐसे में हम भी नए-नए डिजाइन और आकार के दिए बना रहे हैं. हम कई दीयों को एक साथ रखने वाले स्टैंड भी बना रहे हैं, जिन्हें आप दिवाली के बाद भी घर की सजावट के लिए इस्तेमाल कर सकते हैं.”

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चिनहट कभी मिट्टी से निर्मित चीजों का गढ़ हुआ करता था, लेकिन बाद में मांग में कमी के चलते धीरे-धीरे कारखानें और दुकानें बंद होती गईं, हालांकि अब यहां इस उद्योग को नए सिरे से शुरू करने के संकेत मिल रहे हैं.

सदर लखनऊ में बिजली के सामान बेचने वाले राकेश अग्रवाल ने भी कहा कि इस साल चीनी लाइटों की मांग में भारी कमी आई है.

उन्होंने कहा, “ग्राहक सस्ते चाइनीज एलईडी झालरों की जगह भारतीय एलईडी झालरों को ज्यादा तरजीह दे रहे हैं. हमारे पास भारतीय झालरों की काफी विविधता है जिनमें स्टिक ऑन लाईट ट्रेल्स भी शामिल है.”

वॉटरप्रूफ पाइप्ड लाइट्स की भी काफी मांग है चूंकि ये ज्यादा समय तक चलते हैं.

मजे की बात तो यह है कि इस हफ्ते के अंत तक अयोध्या में आयोजित होने वाले आगामी ‘दीपोत्सव’ कार्यक्रम में लोगों को इलेक्ट्रिक लाइट्स के बजाय दीयों का इस्तेमाल करने को प्रेरित किया गया है.

गृहिणी रुक्मिणी सिंहा ने कहा, “हमने ‘दीपोत्सव’ की तस्वीरें देखी हैं और महसूस किया है कि इलेक्ट्रिक लाइट्स के बजाय दिए काफी खूबसूरत दिखते हैं. हमने दीयों को चुना है क्योंकि हमें लगता है कि हमें त्यौहारों को मनाने के पारंपरिक तरीकों से जुड़े रहना चाहिए.”
(एजेंसी से इनपुट)

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