9 मई को मेवाड़ के महान हिंदू शासक महाराणा प्रताप की जयंती है. ये एक ऐसे शासक थे जिनके नाम से अकबर भी कांप जाते थे. 18 जून 1576 में मेवाड़ के राजा महाराणा प्रताप और मुगल सम्राट अकबर के बीच भीषण युद्ध हुआ था. इस लड़ाई में न अकबर जीता और न महाराणा प्रताप हारे. कई दौर में यह युद्ध चला. कहा जाता है कि इस युद्ध में महाराणा प्रताप की वीरता और युद्ध-कौशल को देखकर अकबर दंग रह गया था. यह युद्ध भारतीय इतिहास के प्रमुख युद्धों में गिना जाता है. Also Read - पैसे नहीं होने पर पत्नी ने उठाया नीतीश कुमार का चुनावी खर्च, आज बिहार के राजनीतिक तख्त पर है दबदबा

महाराणा प्रताप को बचपन में कीका के नाम से पुकारा जाता था. प्रताप इनका और राणा उदय सिंह इनके पिता का नाम था. Also Read - Happy Birthday Nitish Kumar: बिजली विभाग में की सरकारी नौकरी, आज चलाते हैं बिहार सरकार

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महाराणा प्रताप ने राज्य की सुरक्षा के लिए प्रण लिया था. राजस्थान के कुंभलगढ़ में प्रताप का जन्म महाराणा उदयसिंह एवं माता रानी जीवंत कंवर के घर हुआ था। उन दिनों दिल्ली में सम्राट अकबर का राज्य था जो भारत के सभी राजा-महाराजाओं को अपना गुलाम बनाकर मुगर ध्वज फहराना चाहता था लेकिन  महाराणा प्रताप ने प्रतिज्ञा की थी कि जब तक मेवाड़ आजाद नहीं होगा, मैं महलों को छोड़ जंगलों में निवास करूंगा, स्वादिष्ट भोजन को त्याग कंदमूल फलों से ही पेट भरूंगा किंतु अकबर का आधिपत्य कभी स्वीकार नहीं करुंगा.

फोटो- विकीपीडिया

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राजपूत राजाओं का अपनी महारानियों के प्रति जरूरत से ज्यादा प्रेम भी राजपूतों के आपस में ही भिड़ जाने का एक कारण बना. महाराणा उदय सिंह की 22 रानियां 56 लड़के और 22 लड़कियां थीं. उनके लड़के प्रताप को गद्दी पाने के लिए अपने भाई जगमल से लड़ना पड़ा था.

महाराणा प्रताप का भाला 81 किलो वजन का था और उनके छाती का कवच 72 किलो का था. उनके भाला, कवच, ढाल और साथ में दो तलवारों का वजन मिलाकर 208 किलो था.

कहते हैं कि अकबर ने महाराणा प्रताप को समझाने के लिए 6 शान्ति दूतों को भेजा था, जिससे युद्ध को शांतिपूर्ण तरीके से खत्म किया जा सके, लेकिन महाराणा प्रताप ने यह कहते हुए हर बार उनका प्रस्ताव ठुकरा दिया कि राजपूत योद्धा यह कभी बर्दाश्त नहीं कर सकता.

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महाराणा प्रताप का सबसे प्रिय घोड़ा चेतक था. महाराणा प्रताप की तरह ही उनका घोड़ा चेतक भी काफी बहादुर था. चेतक की ताकत का पता इस बात से लगाया जा सकता था कि उसके मुंह के आगे हाथी कि सूंड लगाई जाती थी. जब मुगल सेना महाराणा प्रताप के पीछे लगी थी, तब चेतक प्रताप को अपनी पीठ पर लिए 26 फीट के उस नाले को लांघ गया, जिसे मुगल पार न कर सके.

आपको बता दें हल्दी घाटी के युद्ध में महाराणा प्रताप के पास सिर्फ 20000 सैनिक थे और अकबर के पास 85000 सैनिक. इसके बावजूद महाराणा प्रताप ने हार नहीं मानी और स्वतंत्रता के लिए संघर्ष करते रहे.

महाराणा प्रताप की मौत पर अकबर को भी काफी दुख हुआ था. शिकार के दौरान लगी चोटों की वजह से महाराणा प्रताप 29 जनवरी 1597 को चावंड में वीरगति को प्राप्त कर गए.