नई दिल्ली: युवा महिलाओं से जब उसने सैनिटरी पैड के बारे में सवाल पूछना शुरू किया तो कुछ ने उसे पागल सोचा और कुछ ने कहा कि ये समाज को खराब कर देगा. पर, मुरुगनाथम ने यह सब अपनी पत्नी के लिए सस्ते सैनिटरी नैपकिन बनाने की खातिर किया. उनकी इसी पहल से ग्रामीण महिलाओं के माहवारी स्वास्थ्य में क्रांतिकारी परिवर्तन आया.

दुनिया आज Menstrual Hygiene Day मना रही है तो तमिलनाडु के कोयंबटूर के रहने वाले मुरुगनाथम का कहना है कि उन्‍हें अपने मिशन को पूरा करने के लिए अभी और लंबा सफर तय करना बाकी है ताकि माहवारी स्वच्छता सभी को किफायती और सुलभ रूप में हासिल हो सके.

मुरुगनाथम ने ई-मेल के माध्यम से आईएएनएस को दिए साक्षात्कार में कहा, ‘यह सब मेरी पत्नी शांति के साथ शुरू हुआ और विश्व भर में फैल गया, जिसने एक क्रांति को जन्म दिया. मुझे खुशी है कि मेरा मिशन लोगों तक पहुंचा’.

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उन्होंने कहा, ‘लोग वास्तव में बदल गए हैं. सैनेटरी स्वच्छता के बारे में अब अधिक लोग खुलकर बातें करते हैं. 20 साल पहले लोग इसके बारे में बात करने से भी डरते थे. आज वह भ्रम टूट गया है. लेकिन भारत केवल मेट्रो शहरों से नहीं बना है. हमारे देश में छह लाख गांव हैं और जागरूकता का स्तर बहुत कम है. सभी के लिए माहवारी स्वच्छता किफायती और सुलभ बनाने के हमारे मिशन को अभी बहुत लंबा रास्ता तय करना है’.

मुरुगनाथम का मानना है कि प्रत्येक व्यक्ति पैडमैन बन सकता है. उन्होंने कहा, ‘मुझे लगता है कि ज्यादा से ज्यादा पैडमैन बनाना मेरी जिम्मेदारी है’.

गौरतलब है कि मुरुगनाथम ने प्रसिद्धि और प्रशंसा पाने के लिए इस सफर की शुरुआत नहीं की थी बल्कि वह चाहते थे कि उनकी पत्नी को महीने के उन दिनों के दौरान रूई, राख और कपड़े के टुकड़े जैसे गंदे तरीकों का न अपनाना पड़े.

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वर्तमान में वे कोयंबटूर में महिलाओं को सैनेटरी पैड की आपूर्ति करने के लिए एक कंपनी चला रहे हैं और कई देशों में अपने कम लागत वाले स्वच्छता उत्पादों के लिए प्रौद्योगिकी प्रदान कर रहे हैं. टाइम मैगजीन ने 2014 में उन्हें 100 प्रभावशाली लोगों की सूची में स्थान दिया था. साथ ही 2016 में उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया गया था.
(एजेंसी से इनपुट)