नई दिल्ली: प्रेग्नेंसी से बचने-बचाने को महिला-पुरुष अक्सर परेशान रहते हैं. कई तरह से उपाय करते हैं, लेकिन अब वैज्ञानिकों ने पुरुषों के लिए ऐसा तरीका खोजा है, जिससे पुरुष सिर्फ एक इंजेक्शन से 13 साल तक बिना कंडोम और बिना नसबंदी के सम्बन्ध बनाने के बाद भी महिला पार्टनर प्रेग्नेंट नहीं होगी. और तो और इसका ट्रायल भी पूरा हो चुका है. सिर्फ स्वास्थ्य मंत्रालय से हरी झंडी का इंतजार है.

… तो जल्द ही मार्केट में कराया जाएगा उपलब्ध

जी हां, भारतीय वैज्ञानिकों ने एक ऐसा कॉन्ट्रासेप्टिव (गर्भनिरोधक) ईजाद किया है, जिससे पुरुषों को नसबंदी की आवश्यकता नहीं होगी. भारतीय वैज्ञानिकों ने मेल कॉन्ट्रासेप्टिव यानी गर्भनिरोधक इंजेक्शन को विकसित किया है. इस इंजेक्शन को लगाने के बाद किसी भी पुरुष को अब नसबंदी ऑपरेशन करवाने की जरुरत नहीं पड़ेगी. इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (ICMR) की अगुवाई में बने इस इंजेक्शन का ट्रायल भी पूरा हो चुका है. रिपोर्ट्स की मानें तो इस इंजेक्शन के ट्रायल की रिपोर्ट को स्वास्थ्य मंत्रालय को सौंप दिया गया है. अगर स्वास्थ्य मंत्रालय इसको हरी झंडी दे दी जाती है, तो इसे जल्द ही मार्केट में उपलब्ध कराया जाएगा.

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13 साल तक करेगा काम इंजेक्शन
ICMR के साइंटिस्ट डॉक्टरों की मानें तो यह रिवर्सिबल इनबिशन ऑफ स्पर्म अंडर गाइडेंस (RISUG) है, जो एक तरह का गर्भनिरोधक इंजेक्शन है. उन्होंने बताया कि अब तक पुरुषों को स्पर्म का ट्रांजेक्शन रोकने के लिए गर्भनिरोधक ऑपरेशन की आवश्यकता पड़ती थी, लेकिन इस इंजेक्शन के आने के बाद पुरुषों को किसी भी तरह की सर्जरी की आवश्यकता नहीं होगी. डॉक्टरों की मानें तो इस इंजेक्शन की सफलता की दर 95 से ज्यादा है. इसकी ख़ास बात ये है कि ये इंजेक्शन एक बार लगवाने के बाद 13 साल तक काम करेगा.

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ऐसे काम करेगा इंजेक्शन, चूहों पर किया गया ट्रायल
डॉक्टर शर्मा ने बताया कि आईआईटी खड़गपुर के वैज्ञानिक डॉक्टर एसके गुहा ने इस इंजेक्शन में इस्तेमाल होने वाले ड्रग्स की खोज की थी. यह एक तरह का सिंथेटिक पॉलिमर है. सर्जरी में जिन दो नसों को काट कर इसका इलाज किया जाता था, इस प्रोसीजर में उसी दोनों नसों में यह इंजेक्शन दिया जाता है, जिसमें स्पर्म ट्रैवल करता है. इसलिए इस प्रोसीजर में दोनों नसों में एक एक इंजेक्शन दिया जाता है. डॉक्टर ने कहा कि 60 एमएल का एक डोज होगा. उन्होंने कहा कि इंजेक्शन के बाद निगेटिव चार्ज होने लगता है और स्पर्म टूट जाता है, जिससे फर्टिलाइजेशन यानी गर्भ नहीं ठहरता. पहले चूहे, फिर खरगोश और अन्य जानवारों पर इसका ट्रायल पूरा होने के बाद इंसानों पर इसका क्लिनिकल ट्रायल किया गया. 303 लोगों पर इसका क्लिनिकल ट्रायल फेज वन और फेज टू पूरा हो चुका है.