आचार्य रजनीश यानी ओशो दुनिया के महान विचारकों में से एक माने जाते हैं. 11 जनवरी को ओशो का जन्मदिन है. उनका असली नाम चंद्र मोहन जैन था लेकिन लोगों ने उन्हें ‘ओशो’ बना दिया. ये शब्द लैटिन भाषा के ‘ओशनिक’ शब्द से लिया गया है जिसका अर्थ है सागर में विलीन हो जाना. ओशो जब तक जिंदा रहे विवादित रहे. कुछ लोगों ने उनके दर्शन को पसंद किया कुछ ने नापसंद. ओशो ही पहले ऐसे गुरु थे जिन्होंने प्रेम के साथ विरोध की बात की. मृत्यु को उत्सव कहा. संभोग को समाधि. आस्तिकता-नास्तिकता की बात की. ओशो ने अपने दर्शन में मृत्यु सीखाने की बात की. जिस शब्द को सुनकर ही रोंगटे खड़े हो जाए उस पर जश्न मनाने की बात की. प्रेम. परमात्मा. संभोग की बात की. नदिया की तरह बह जाने की बात की. धर्म की बात की. सेक्स की बात की. समाधि की बात की. अच्छे शब्दों को सुनना और उसे आत्मसात करना, दोनों में अंतर होता है. खुद को सहज स्वीकार करना इतना आसान कहां? शायद यही वजह है कि लोग ओशो के दर्शन को सुनना पसंद करते हैं फॉलो करना नहीं. वैसे भी खुद को खुरेदना इतना आसान कहां होता है. अगर खबर हो जाए तो एक पल, नहीं तो ज़माना लग जाता है.

Was Osho murdered by his followers?

कहते थे ओशो, ‘उत्सव हमारी जाति, आनंद हमारा गोत्र.’ अब ऐसी बात कोई कहे तो उसे कैसे कोई फॉलो करेगा. जाति तो आधार है लड़ाई का, हम उसे उत्सव कैसे मान सकते हैं. वैसे भी सत्य को स्वीकारना मुश्किल होता है. हलक में अटक जाता है. नीचे नहीं उतरता. बहुत कष्ट होता है. बिल्ली को देखकर कबूतर की तरह आंख बंद कर लेना आसान होता है. हम सबकुछ आसान ही तो चाहते हैं. इसलिए ये दर्शन हज़म नहीं होता. बखिया उधेड़ने वाले अब इस शख्स को हम क्या कह कर बुलाएं. आध्यात्मिक गुरु, दार्शनिक, पाखंडी या आलोचक. इन्हीं शब्दों से उन्हें कितनी ही बार बुलाया गया है. हमें सीधी बात सुनने की आदत है और ओशो ने हमेशा उल्टी ही बात कही. फिर कोई कैसे उनका दर्शन फॉलो कर सकता है.

Image result for osho, india.com

ओशो किसी संगठित धर्म में विश्वास नहीं रखते थे. उनका कहना था अगर कोई धर्म जीवन को व्यर्थ बताए वो खुद ही व्यर्थ है. जीवन को आनंद हैं. उनकी इस बात से पुरी के शंकराचार्य नाराज हो गए थे. कई बार उन्होंने उनका भाषण रुकवाने की कोशिश की. लेकिन आवाज में एक आकर्षण था लोग बड़ी तादात में खुद-ब-खुध खींचे चले आते थे.

Image result for osho, india.com

11 दिसंबर 1931 को मध्य प्रदेश में जन्मे ओशो. महात्मा गांधी के विचारों से हमेशा असहमत रहे. उनका कहना थआ की गांधी की विचारधारा इंसान को पीछे ले जाती है. वही गांधी जिन्हें हम राष्ट्रपिता कहते हैं ओशो को उनके विचार कभी पसंद नहीं आए. ओशो के मुताबिक, मेरी दृष्टि में कृष्ण अहिंसक हैं और गांधी हिंसक. दो तरह के लोग होते हैं, एक वो जो दूसरों के साथ हिंसा करें और दूसरे वो जो खुद के साथ हिंसा करें. गांधी दूसरी किस्म के व्यक्ति थे. ओशो की एक किताब है: ‘अस्वीकृति में उठा हाथ’. यह किताब पूरी तरह से गांधी पर केंद्रित है. ओशो ने एक बार फिर उल्टी बात कह दी थी. इंसान लीक का फकीर है कुछ भी अलग उनके लिए स्वीकार करना मुश्किल होता है.

ओशो की नज़र में सन्यासी वो नहीं जो भगवा पहनकर. अपना घर बार छोड़कर. बीवी बच्चे छोड़कर धर्म की शरण में चला जाए. संन्यासी तो वो है जो अपने घर-संसार, पत्नी और बच्चों के साथ रहकर पारिवारिक, सामाजिक जिम्मेदारियों को निभाते हुए ध्यान और सत्संग का जीवन जिए. बताइए अब इस परिभाषा को आप इतनी आसानी से कैसे मान लेंगे. बात फिर धारा के विपरीत है. एक दम उल्ट. शायद इसलिए उनकी कब्र पर भी लिखा है – ओशो, जो न पैदा हुए न मरे. इस धरती पर 11 दिसम्बर 1931 से 19 जनवरी 1990 के बीच भ्रमण के लिए आए.

कई किस्से कहानियां है. जितनी कही जाए उतनी कम. समुद्र की तरह गहरे ओशो. जितना नापा जाए उतने धंसे चले जाते हैं. फिर एक दिन शब्द थम जाते हैं. सांस रुक जाती है. ओशो की विवादित मौत कई कहानियों को जन्म देती है. लेकिन एक संगीत है जो बहता रहता है. उनकी मौत से पहले का. बाद तक. अभी तक. हमेशा. बस हमें भी उसमें बहने की जरूरत है.