नई दिल्‍ली: शीतला अष्‍टमी को बसोड़ाा पूजा भी कहते हैं, जो गुरुवार 9 मार्च को है. चैत्र से लेकर आषाढ़ तक कृष्‍ण पक्ष के हर अष्‍टमी को शीतला अष्‍टमी मनाया जाता है. होली के बाद आठ दिनों तक शीतला मां की पूजा की जाती है. ऐसी मान्‍यता है कि मां शीतला दुर्गा का ही एक रूप हैं. शीतला अष्‍टमी के दिन मां की पूजा करने वाले भक्‍तों को सेहत और शक्‍त‍ि का वरदान मिलता है. उत्‍तर प्रदेश, मध्‍य प्रदेश और गुजरात में शीतला अष्‍टमी बड़े स्‍तर पर मनाया जाता है. Also Read - scientific reason for celebrating shitala ashtami 2018| शीतलाष्‍टमी मनाने की यह है वैज्ञानिक वजह, जानें

महत्‍व
ऐसी मान्‍यता है कि शीतला मां की पूजा करने से शरीर निरोग रहता है और चेचक, खसरा, चिकन पॉक्स आदि का खतरा नहीं होता. इस दिन जातक मां से अपने स्‍वास्‍थ्‍य की कामना करता है और इन बीमारियों से बचाने की प्रार्थना करता है. शीतला अष्‍टमी के दिन मां को चांदी का चौकोर टुकड़ा जिस पर उनका चित्र उकेरा हो, अर्पित करते हैं.
अधिकांशतः इनकी उपासना बसंत तथा ग्रीष्म में होती है जब रोगों के संक्रमण की सर्वाधिक संभावनाएं होती हैं. चैत्र, वैशाख, ज्येष्ठ तथा आसाढ़ की कृष्ण पक्ष की अष्टमी को शीतलाष्टमी के रूप में मनाया जाता है. माता शीतला की पूजा वास्तव में आध्यात्मिक और शारीरिक उन्नति की पूजा है. Also Read - sheetala ashtami 2018 puja ki taiyari significance| शीतला अष्‍टमी 2018: आज ही कर लें यह 5 तैयारी

गुजरात में कृष्‍ण जन्‍माष्‍टमी से एक दिन पहले शीतला सतम मनाई जाती है. स्‍कंद पुराण में भी मां शीतला को पूजने के महत्‍व के बारे में बताया गया है. स्‍कंद पुराण में शीतला माता स्‍त्रोत्र के बारे में भी उल्‍लेख है, जिसे शीतलास्‍टक भी कहा जाता है. ऐसी मान्‍यता है कि शीतलास्‍टक को भगवान शंकर ने अपने हाथों से लिखा था. माना जाता है कि शीतला मां का का उल्लेख सर्वप्रथम स्कन्दपुराण में ही मिलता है. इनका स्वरुप अत्यंत शीतल है और रोगों को हरने वाला है. Also Read - sheetala ashtami 2018 pujan vidhi offer stale food to goddess shitala| शीतला अष्‍टमी: जानें क्‍यों चढ़ाया जाता है मां को बासी प्रसाद

हिन्दू समाज स्वच्छता को लेकर अत्यंत जागरूक था, इसलिए प्रतीक स्वरुप माता की पूजा अर्चना का विधान बना. शीतला मां का वाहन गधा है और इनके हाथों में कलश, सूप, झाड़ू और नीम के पत्ते हैं. इसलिए शीतला मां की पूजा में साफ सफाई का खास ख्‍याल रखा जाता है. मां की पूजा विशेष रूप से साफ सफाई और समृद्धि का ही सूचक है.

बासी खाना प्रसाद
शीतला अष्‍टमी के दिन घर का चूल्‍हा नहीं जलाया जाता. इसलिए शीतला अष्‍टमी से एक दिन पहले ही लोग आमतौर पर खाना बनाकर रख लेते हैं और शीतला अष्‍टमी के दिन वही खाते हैं. मां शीतला को भी शीतल और बासी खाद्य पदार्थ चढ़ाया जाता है, जिसको बसौड़ा भी कहते हैं. इस दिन सूर्य उगने से पहले ही स्‍नान कर मां शीतला की पूजा की जाती है. भक्‍त मां शीतला की मूर्ति को चंदन, हल्‍दी, सिंदूर लगाया जाता है और फल-फूल चढ़ाया जाता है. इसके अलावा मां को 16 तरह का चढ़ावा चढ़ता है.

पूजा के अंत में चावल में घी मिलाकर मां को चढ़ाया जाता है और यही प्रसाद के रूप में वितरित किया जाता है. चावल एक दिन पहले बनाया गया होता है. इस दिन मां शीतला के भक्‍त उनके मंदिर भी जाते हैं और हल्‍दी व बाजरा से उनकी पूजा करते हैं. पूजा के बाद लोग बसोड़ा व्रत कथा सुनते हैं. राजस्‍थान में इस व्रत को बड़े स्‍तर पर मनाया जाता है. इस मौके पर मेला भी लगाया जाता है और गायन वादन के कई कार्यक्रम भी आयोजित होते हैं.