नई दिल्ली: हर साल वैशाख महीने के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को सीता नवमी या जानकी नवमी मनाई जाती है. मान्यता है कि मां सीता का इसी दिन जन्म हुआ था. मां सीता के जन्म और उत्पत्ति से जुड़ी कई कहानियां प्रचलित हैं. यह मान्यता है कि सीता का जन्म पुश्य नक्षत्र में हुआ था. उस दिन मंगलवार था. इसलिए इस बार सीता नवमी और भी ज्यादा शुभ है, क्योंकि यह मंगलवार के दिन ही आई है.

जानें कैसे हुआ था जन्म
मां सीता को जानकी पुत्री के नाम से जाना गया. मिथिला के राजा जनक की कोई संतान नहीं थी. इस बात से वह बहुत दुखी थे. तभी मिथिला में अकाल पड़ गया. राजा जनक इससे और भी ज्यादा परेशान हो गए और ऋषि मुनियों की सलाह से यज्ञ करने लगे. इस यज्ञ के साथ ही राजा जनक को खेत भी जोतना था. मुनियों ने कहा कि इसके बाद ही यज्ञ पूरा माना जाएगा.

जनक खेत जोतने के लिए हल चलाने लगे. तभी हल की नोक से धातु की कोई वस्तु टकराई. जनक ने उसे नजरअंदाज कर दिया और आगे बढ़ने की कोशिश करने लगे. काफी प्रयास करने के बावजूद जनक वहां से हल हटा नहीं पा रहे थे.

जनक ने उस जगह की खुदाई कराई. खुदाई करने के बाद वहां से एक कलश निकला. जनक ने जैसे ही कलश का ढक्कन हटाया, उन्हें उसके अंदर एक सुंदर सी नवजात बालिका नजर आई. राजा जनक हैरान हो गए और बच्ची को अपने गोद में ले लिया. तभी आसमान में काले बादल घिर गए और बारिश होने लगी. मिथिला का अकाल समाप्त हो गया.

मिथिला नरेश जनक की कोई संतान नहीं थी, इसलिए उन्होंने उस नवजात कन्या को ही भगवान का वरदान मानकर संतान के रूप में स्वीकार कर लिया.

सीता का कैसे पड़ा नाम
हल की नोक को सीत कहते हैं. हल की नोक यानी सीत से टकराने के कारण ही राजा जनक को वह कलश प्राप्त हुआ था, जिसमें नवजात बच्ची थी. इसलिए राजा जनक ने उनका नाम सीता रख दिया. सीत से जन्म लेने वाली सीता.

सीता नवमी का महत्व
सीता जयंति या सीता नवमी का महत्व खासतौर से उन महिलाओं के लिए है, जो शादीशुदा हैं. मान्यता है कि इस दिन व्रत और पूजन करने वाली महिलाओं के पति की उम्र लंबी होती है. मां सीता को देवी लक्ष्मी का अवतार माना जाता है, जिनका जन्म त्रेता युग में मिथिला में हुआ था. इसलिए यह माना जाता है कि इस दिन व्रत रखने वाली महिलाओं का सुहाग अमर होता है और उनकी आर्थिक स्थिति भी सुधरती है. साथ ही मां सीता, सेहत और खुशहाली का वरदान भी देती हैं और ऐसे लोगों को संतान सुख भी प्राप्त होता है.