तनाव कई बीमारियों की वजह बन चुका है. ये बात आपने सुनी होगी पर शायद ये नहीं जानते होंगे, कैसे ये होता है.

दरअसल हमारे शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली हमें कई बीमारियों से बचाती है. यह प्रणाली कभी-कभी शरीर के खिलाफ हो सकती है और स्वस्थ कोशिकाओं पर हमला करके टिश्यू को नष्ट करके अपक्षयी रोगों का कारण बन सकती है. इस स्थिति के चलते ऑटोइम्यून विकार (एआईडी) उत्पन्न हो सकता है. तनाव और अस्वास्थ्यकर भोजन इसके मुख्य कारण हैं.

चूहों पर किए गए एक हालिया शोध में पता चला है कि वीजीएलएल-3 नामक एक अत्यधिक आणविक स्विच, जो त्वचा कोशिकाओं में प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया जीन को नियंत्रित करता है, ऑटोइम्यून बीमारियों का कारण बनता है.

जेसीआई इनसाइट में प्रकाशित अध्ययन के अनुसार, वीजीएलएल3 की भूमिका महत्वपूर्ण होती है. तीन साल पहले, यूनिवर्सिटी ऑफ मिशिगन के शोधकर्ताओं की एक टीम ने दिखाया कि महिलाओं में पुरुषों की तुलना में उनकी त्वचा की कोशिकाओं में वीजीएलएल3 अधिक होता है.

हार्ट केयर फाउंडेशन ऑफ इंडिया (एचसीएफआई) के अध्यक्ष पद्मश्री डॉ. के.के. अग्रवाल का कहना है कि ऑटोइम्यून विकार अक्सर कई अन्य स्वास्थ्य स्थितियों की नकल करते हैं और इसलिए, इनके लिए सटीक निदान खोजना कठिन होता है. वे शरीर के विभिन्न हिस्सों को प्रभावित कर सकते हैं. हालांकि, लंबे लक्षणों को देखना जरूरी है, खासकर जब वे लंबे समय तक रहें तो जांच करवानी चाहिए.

उन्होंने कहा कि इनमें से कुछ में नई एलर्जी, रसायनों, खाद्य पदार्थों या गंध के प्रति संवेदनशीलता में वृद्धि, शक्ति की कमी, क्योंकि किसी भी बीमारी की अनुपस्थिति से प्रतिरक्षा प्रणाली खुद पर हमला करने में व्यस्त है, ब्रेन फॉग, और यहां तक कि चिंता और अवसाद शामिल हैं. कुछ जोखिम वाले कारकों वाले लोग दूसरों की तुलना में एआईडी के लिए अधिक संवेदनशील होते हैं.

डॉ.अग्रवाल ने कहा, ‘जेनेटिक प्रीडिस्पोजिशन की स्थिति एक महत्वपूर्ण पहलू है. इसके अलावा, महिलाओं में उनका प्रसार अमानवीय परिवर्तनों के कारण अधिक है. कुछ में, यह बच्चे के जन्म के वर्षों के दौरान हो सकता है. कुछ अन्य कारकों में उम्र, जातीयता, कुछ बैक्टीरिया या वायरल संक्रमण और आहार व रसायनों के पर्यावरणीय विषाक्त पदार्थों के संपके में आना प्रमुख है’.

उन्होंने बताया कि एआईडी के कुछ उदाहरणों में मल्टिप्लेस्क्लेरोसिस, टाइप 1 डायबिटीज, रियूमेटाइड आर्थराइटिस और क्रोनिक थायरॉयडिटिस शामिल हैं. एआईडी के 80 मिलियन से अधिक प्रकार दुनिया भर में लगभग 100 मिलियन लोगों को प्रभावित करते हैं. भारत में, कम से कम 10 प्रतिशत आबादी ऐसी विभिन्न परिस्थितियों से पीड़ित है.

डॉ. अग्रवाल ने कहा, ‘एआईडी का पूर्ण रक्त गणना परीक्षण के साथ निदान किया जा सकता है. सफेद और लाल रक्त कोशिकाओं के सामान्य स्तर से विचलन कुछ अंतर्निहित मुद्दे को इंगित कर सकता है. कुछ अन्य परीक्षण जो एआईडी को डिटेक्ट कर सकते हैं, वे हैं सी-रिएक्टिव प्रोटीन और एरिथ्रोसाइट अवसादन परीक्षण. प्रत्येक एआईडी में अलग-अलग लक्षण होते हैं, इसलिए इनके उपचार भी अलग-अलग हो सकते हैं. उदाहरण के लिए, सीलिएक रोग को एक लस मुक्त आहार के साथ प्रबंधित करने की आवश्यकता है. अन्य स्थितियों में चिकित्सा या दवा की आवश्यकता हो सकती है’.

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कुछ सुझाव :

* एआईडी की रोकथाम में हमारे खाने के पैटर्न की प्रमुख भूमिका है. यह अस्वास्थ्यकर आहार से बचने के लिए आवश्यक है, क्योंकि प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थ न केवल सूजन पैदा कर सकते हैं, बल्कि इम्यून प्रतिक्रिया को भी बंद कर सकते हैं.

* एक स्वस्थ और संतुलित आहार पेट के स्वास्थ्य और आगे, एक मजबूत प्रतिरक्षा प्रणाली के लिए चमत्कार कर सकता है. विटामिन ए और डी, सेलेनियम, जिंक, ओमेगा-3 फैटी एसिड, प्रो-बायोटिक्स, ग्लूटामाइन और फ्लैवोनोल जैसे आवश्यक पोषक तत्वों से भरपूर आहार से ऑटोइम्यून रोगों की शुरूआत हो सकती है.

* एक दिन में कम से कम 30 मिनट की शारीरिक गतिविधि में संलग्न होना आवश्यक है, जो शरीर के प्राकृतिक सूजनरोधी तंत्र को मजबूत करने में मदद करता है.

* तनाव सूजन का प्रमुख कारक है, और इसलिए, योग और ध्यान के रूप में विश्राम तकनीक का अभ्यास करना एक अच्छा विचार है.
(एजेंसी से इनपुट)

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