नई दिल्‍ली: सर्दियों में बथुआ का साग औषधीय गुणों से भरपूर होता है. हालांकि ज्‍यादातर लोग इसके गुणों से अंजान हैं. लेकिन ये छोटा-सा दिखने वाला हराभरा पौधा काफी फायदेमंद है, सर्दियों में इसका सेवन कई बीमारियों को दूर रखने में मदद करता है. बथुए में आयरन प्रचुर मात्रा में होता है, बथुआ न सिर्फ पाचनशक्ति बढ़ाता बल्कि अन्य कई बीमारियों से भी छुटकारा दिलाता है. गुजरात में इसे चील भी कहते हैं.

बथुआ एक ऐसी सब्जी या साग है, जो गुणों की खान होने पर भी बिना किसी विशेष परिश्रम और देखभाल के खेतों में स्वत: ही उग जाता है. एक डेढ़ फुट का यह हराभरा पौधा कितने ही गुणों से भरपूर है. बथुआ के परांठे और रायता तो लोग चटकारे लगाकर खाते हैं, लेकिन वे इसके औषधीय गुणों से ज्यादा परिचित नहीं है, बता रहे हैं. इसकी पत्तियों में सुगंधित तैल, पोटाश और अलवयुमिनॉयड पाये जाते हैं. दोष कर्म की दृष्टि से यह त्रिदोष (वात, पित, कफ) को शांत करने वाला है. आयुर्वेदिक विद्वानों ने बथुआ को भूख बढ़ाने वाला पित्तशामक मलमूत्र को साफ और शुद्ध करने वाला माना है.

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बथुआ के फायदे
यह आंखों के लिए उपयोगी और पेट के कीड़ों का नाश करने वाला है. यह पाचनशक्ति बढ़ाने वाला, भोजन में रुचि बढ़ाने वाला पेट की कब्ज मिटाने वाला और स्वर (गले) को मधुर बनाने वाला है. गुणों में हरे से ज्यादा लाल बथुआ अधिक उपयोगी होता है. इसके सेवन से वात, पित्त, कफ के प्रकोप का नाश होता है और बल-बुद्धि बढ़ती है. लाल बथुआ के सेवन से बूंद-बूंद पेशाब आने की तकलीफ में लाभ होता है. टीबी की खांसी में इसको बादाम के तेल में पकाकर खाने से लाभ होता है. नियमित कब्ज वालों को इसके पत्ते पानी में उबाल कर शक्कर (चीनी नहीं) मिला कर पीने से बहुत लाभ होता है. यही पानी गुर्दे और मसाने के लिए भी लाभकारी है. इस पानी से तिल्ली की सूजन में लाभ होता है. सूजन अधिक हो तो उबले पत्तों को पीसकर तिल्ली पर लेप लगाएं.

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लाल बथुआ भी रामबाण
लाल बथुआ हृदय को बल देने वाला, फोड़े-फुंसी, मिटाकर खून साफ करने में भी मददगार है. बथुआ लीवर के विकारों को मिटाकर पाचन शक्ति बढ़ाकर रक्त बढ़ाता है. शरीर की शिथिलता मिटाता है. लिवर के आसपास की जगह सख्त हो, उसके कारण पीलिया हो गया हो तो छह ग्राम बथुआ के बीज सवेरे शाम पानी से देने से लाभ होता है. बीजों को सिल पर पीस कर उबटन की तरह लगाने से शरीर का मैल साफ होता है, चेहरे के दाग धब्बे दूर होते हैं.

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हर दर्द की दवा है बथुआ का साग
तिल्ली की बीमारी और पित्त के प्रकोप में इसका साग खाना उपयोगी है. इसका रस जरा-सा नमक मिलाकर दो-दो चम्मच दिन में दो बार पिलाने से पेट के कीड़ों से छुटकारा मिलता है. पत्तों के रस में मिश्री मिलाकर पिलाने से पेशाब खुल कर आता है. इसका साग खाने से बवासीर में लाभ होता है. पखाना खुलकर आता है. दर्द में आराम मिलता है. इसके काढ़े से रंगीन और रेशमी कपड़े धोने से दाग धब्बे छूट जाते हैं और रंग सुरक्षित रहते हैं. अरुचि, अर्जीण, भूख की कमी, कब्ज, लिवर की बीमारी पीलिया में इसका साग खाना बहुत लाभकारी है. सामान्य दुर्बलता बुखार के बाद की अरुचि और कमजोरी में इसका साग खाना हितकारी है. धातु दुर्बलता में भी बथुए का साग खाना लाभकारी है.

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