नई दिल्‍ली: चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से चैत्र नवरात्र‍ि की शुरुआत होती है. इस बार 18 मार्च से चैत्र नवरात्र‍ि शुरू हो रही है जो 25 मार्च तक चलेगी. नवरात्र‍ि में मां दुर्गा के नौ रूपों शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चन्द्रघंटा, कूष्माण्डा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी, सिद्धिदात्री की पूजा की जाती है. ऐसी मान्‍यता है कि इन नौ दिनों के दौरान मां दुर्गा धरती पर ही रहती हैं. ऐसे में बिना सोचे-समझे भी यदि किसी शुभ कार्य की शुरुआत की जाए तो उस पर मां की कृपा जरूर बरसती है और वह कार्य सफल होता है.

ऐसी मान्‍यता है कि चैत्र नवरात्र‍ि के पहले दिन मां दुर्गा का जन्‍म हुआ था और मां दुर्गा के कहने पर ही ब्रह्मा जी ने सृष्‍ट‍ि का निर्माण किया था. इसीलिए चैत्र शुक्‍ल प्रतिपदा से हिन्‍दू वर्ष शुरू होता है. नवरात्र‍ि के तीसरे दिन भगवान विष्‍णु ने मत्‍स्‍य रूप में जन्‍म लिया था और पृथ्‍वी की स्‍थापना की थी.

ऐसी भी मान्‍यता है कि भगवान विष्‍णु का 7वां अवतार भगवान राम का जन्‍म भी चैत्र नवरात्र‍ि में ही हुआ था. इसलिए धार्मिक दृष्‍ट‍ि से भी चैत्र नवरात्र का बहुत महत्‍व है. ऐसा माना जाता है कि नवदुर्गा पूजन के ये नौ दिन बहुत शुभ होते हैं. इसलिए इन नौ दिनों के दौरान कोई भी शुभ कार्य बिना सोच-विचार के कर लेना चाहिए. क्‍योंकि पूरी सृष्टि को अपनी माया से ढ़कने वाली आदिशक्ति इस समय पृथ्वी पर होती है.

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जानिये क्‍योंकि मनाई जाती है चैत्र नवरात्र‍ि…

चैत्र नवरात्र‍ि के पीछे एक पौराणिक कथा है. दस सिर वाले और शि‍व का आर्शीवाद हासिल करने वाले शि‍व भक्‍त रावण की ताकत के बारे में सभी देवी-देवताओं को ज्ञात था. इसलिए सीता को लंका से वापस लाने के लिए जब श्रीराम रावण से युद्ध करने चले तो उन्‍हें देवताओं ने शक्‍त‍ि की पूजा करने और उनसे विजयश्री का आर्शीवाद लेने की सलाह दी.

भगवान राम ने ऐसा ही किया. भगवान राम ने मां को चढ़ाने के लिए 108 नीलकमल की व्‍यवस्‍था की और पूजा शुरू कर दी. उधर रावण को जब यह ज्ञात हुआ कि श्री राम जीत के लिए मां चंडी की पूजा कर रहे हैं तो उसने भी मां की पूजा शुरू कर दी. रावण किसी भी हाल में अपनी हार नहीं चाहता था, इसलिए उसने राम के 108 पुष्‍पों में से एक चुरा लिया और अपने राज्‍य में चंडी पाठ करने लगा.

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राम को इस बात का पता चला और उन्‍होंने कम पड़ रहे एक नीलकमल की जगह अपनी एक आंख मां को समर्पित करने की सोच ली. क्‍योंकि राम को कमल-नयन नवकंज लोचन भी कहा जाता है. इसलिए श्री राम ने तूणीर से अपनी आंख निकलने लगे. तभी मां प्रकट हुईं और उन्‍होंने भगवान राम की पूजा से खुश होकर उन्‍हें विजयश्री का वरदान दे दिया.

दूसरी ओर रावण भी जोर लगाकर चंडी पाठ कर रहा था. तभी हनुमान जी ब्राह्मण का बालक रूप लेकर पूजा स्‍थान पर पहुंच गए. ब्राह्मण जयादेवी भूर्तिहरिणी श्‍लोक का पाठ कर रहे थे. लेकिन हनुमान जी ने उसका उच्‍चारण हरिणी की जगह करिणी करवा दिया. इससे मां चंडी कूपित हो गईं. उन्‍होंने रावण को श्राप दे दिया. दरअसल, हरिणी का अर्थ होता है हरने वाली, और करिणी का अर्थ होता है पीड़ा देने वाली.

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इसके बाद राम ने रावण को परास्‍त कर दिया. इसलिए इस त्‍योहार को बुराई पर अच्‍छाई की जीत के रूप में भी मनाते हैं और नवरात्र‍ि के आखिरी दिन रामनवमी के रूप में मनाते हैं.